बुधवार, 7 जनवरी 2026

दैदीप्यमान नक्षत्र प्रो. राम जैसवाल का अवसान

अजमेर। शब्द, रेखा और रंग की साधना में जीवन अर्पित करने वाले प्रो. राम जैसवाल आज अनंत की यात्रा पर प्रस्थान कर गए। राजस्थान के साहित्य और कला आकाश का यह दैदीप्यमान नक्षत्र भौतिक रूप से भले ही ओझल हो गया हो, किंतु उसकी उजास आने वाली पीढ़ियों के रचनात्मक पथ को सदैव आलोकित करती रहेगी।

लगभग नब्बे वर्षों तक उन्होंने कहानी और कविता में संवेदना के रंग भरे और चित्रकला में मौन को बोलता बनाया। यदि उन्हें राजस्थान में कला शिक्षा का भीष्म पितामह कहा जाए, तो यह श्रद्धा का अलंकार मात्र नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक सत्य है। दयानंद महाविद्यालय के ड्राइंग एंड पेंटिंग विभाग में उन्होंने दशकों तक न केवल कलाकार गढ़े, बल्कि मनुष्यता, अनुशासन और सौंदर्यबोध की परंपरा भी सौंप दी।

सरलता उनका स्वभाव थी और सहजता उनकी पहचान। बड़े कद के बावजूद वे सदैव विनम्र रहे—शायद इसीलिए इतने अपने थे। उनके शब्दों में गुरु की करुणा थी और उनकी रेखाओं में साधक का मौन।

आज कला-जगत ने एक प्रकाशस्तंभ खो दिया है, पर उनकी सृजन-यात्रा विरासत बनकर हमारे बीच जीवित रहेगी।

अजमेरनामा न्यूज पोर्टल इस महान सर्जक को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

मंगलवार, 6 जनवरी 2026

बहुत साल पहले मेरे पिताजी ने आरंभ किया था ऑनेस्टी स्टोर

 हाल ही दैनिक भास्कर में एक खबर छपी है, जिसका षीर्शक है- स्कूल चला रहा है बिना दुकानदार के दुकान ताकि बच्चे ईमानदार बनें। इसमें बताया गया है कि पष्चिम बंगाल के बनगांव में एक ऐसी दुकान जहां सामान तो बिकते हैं, मगर दुकानदार नहीं होता। मुझे यह जानकारी आपसे साझा करते हुए गर्व होता है कि बहुत वर्श पहले मेरे पिताजी स्वर्गीय श्री टी सी तेजवानी ने डूंगरपुर जिले के पुनाली गांव में स्थित सेंकडरी स्कूल में इसी प्रकार की दुकान खोली थी। तब वे स्कूल में प्रधानाचार्य थे। मैं कक्षा छह में पढता था। पिताजी ने स्कूल के एक कमरे में स्टेषनरी की एक दुकान खोली थी। दीवार पर स्टेषनरी की हर वस्तु की रेटलिस्ट चस्पा थी। साथ में एक बॉक्स रखा था। दुकान की देखरेख कोर्इ्र नहीं करता था। बच्चों को जो भी वस्तु चाहिए होती थी, वे उसे ले लेते थे और रेट लिस्ट में लिखी राष्ज्ञि बॉक्स में डाल देते थे। हर सप्ताह बिकी हुई वस्तुओं और बॉक्स में जमा राष्ज्ञि का मिलान किया जाता था। कभी कोई गडबडी नहीं हुई। यानि बच्चे सामान लेते समय पूरी ईमानदारी बरतते थे। इससे एक तो उन्हें स्टेषनरी उचित दर पर मिलती थी, दूसरा उनमें ईमानदारी का गुण विकसित होता था। आज जब भास्कर में छपी खबर पढी तो यकायक ख्याल आ गया कि मेरे पिताजी ने कितने साल पहले इस प्रकार का सफल प्रयोग किया था।


मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

कई नामों से जाना जाता है ख्वाजा साहब को

दुनिया के मशहूर चिश्ती संतों में ख्वाजा गरीब नवाज का नाम से सबसे ऊंचा है। अनेक नामों से उनकी इबादत कर अकीदतमंद सुकून पाते हैं।

ख्वाजा गरीब नवाज का मूल नाम मोइनुद्दीन हसन चिश्ती था। उन्हें यूं तो अनेक नामों से जाना चाहता है, मगर गरीब नवाज एक ऐसा नाम है, जिससे सभी आम-ओ-खास वाकिफ हैं। इस नाम के मायने हैं गरीबों पर रहम करने वाला। यूं तो अनेक नवाबों, राजाओं-महाराजाओं ने यहां झोली फैला कर बहुत कुछ हासिल किया है, मगर गरीबों पर उनका कुछ खास ही करम है। उनके दरबार में तकसीम होने वाले लंगर के लिए अमीर और गरीब एक ही लाइन में खड़े होते हैं, यही वजह है कि उन्हें गरीब नवाज के नाम से जाना जाता है। उन्होंने अपना पूरा जीवन गरीबों और आम लोगों के बीच ही बिताया। जो लोग आध्यात्मिक ज्ञान की दृष्टि से गरीब थे, जिन्हें इबादत करना नहीं आता था, जिन्हें भक्ति व सच्चाई का ज्ञान नहीं था, उन्हें उन्होंने सूफी मत का ज्ञान दिया। उन्होंने किसी भी राजा या सुल्तान का आश्रय नहीं लिया और न ही उनके दरबारों में गए। उन्होंने स्वयं भी गरीबों की तरह सादा जीवन बिताया। इन्हीं गुणों के कारण उन्हें गरीब नवाज कहा जाता है, जो कि उनका सबसे प्रिय नाम है।

बुजुर्गवार बताते हैं कि उनके व्यक्तिगत सामान में दो जोड़ी कपड़े, एक लाठी, एक तीर-कमान, एक नमकदानी, एक कंछी और एक दातून थी। हर वक्त वे इतना ही सामान अपने पास रखते थे। उन्होंने कभी तीसरी जोड़ी अपने पास नहीं रखी। यदि कपड़े फटने लगते तो उसी पर पैबंद लगा कर साफ करके उसे पहन लेते थे। यह काम भी वे खुद ही किया करते थे।  पैबंद लग-लग कर उनके कपड़े इतने वजनी हो गए थे कि आखिरी वक्त में उनके कपड़ों का वजन साढ़े बारह किलो हो गया था।

ख्वाजा साहब को अता-ए-रसूल के नाम से भी जाना जाता है, जिसका मतलब होता है खुदा के पैगंबर मोहम्मद साहब का उपहार। अपने जीवन का अधिकांश समय अजमेर से ही सूफीवाद का प्रचार-प्रसार करने और यहीं पर इबादत करने की वजह से उन्हें ख्वाजा-ए-अजमेर के नाम से भी पुकारा जाता है। वे हिंदल वली के नाम से भी जाने जाते हैं, जिसका मतलब होता हिंदुस्तान के संत और रक्षक। इसी प्रकार उन्हें सुल्तान-उल-हिंद भी कहा जाता है, जिसका मतलब आध्यात्मिक संदर्भ में हिंदुस्तान की अध्यात्मिक शक्तियों  का राजा होता है। इसी संदर्भ में उन्हें नायाब-ए-रसूल हिंद भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त उन्हें ताजुल मुकर ए बिन बल मुश्हक कीन भी कहते हैं, जिसके मायने है नैसर्गिक तेज व ज्ञान का आलोक, जिसके चारों ओर हमेशा खुशी ही खुशी और आशीर्वाद व रहमत बरसती रहती है। उन्हें सैयद उल आबेदीन भी कहते हैं, अर्थात पवित्र तजुल आशिकीन प्रेमियों के सम्राट। उन्हें ताज बुरहन उल वासेलीन यानि एकता के प्रतीक, इसके अतिरिक्त उन्हें आफताब ए जहान यानि संसार का सूरज व संसार को रोषन करने वाला कहा जाता है

-तेजवाणी गिरधर

7742067000


 https://youtu.be/peCdxvzXj8Q

रविवार, 28 दिसंबर 2025

आरन पायलट: धमाकेदार एंट्री ने चौंकाया

राजनीतिक आकाश में कभी-कभी ऐसे चेहरे उभरते हैं, जो अपनी मौजूदगी भर से चर्चा का विषय बन जाते हैं। आरन पायलट भी कुछ ऐसे ही नए नक्षत्र के रूप में सामने आए हैं। निहायत नवीन नाम। कई संभावनाओं को जन्म देता चेहरा। चेहरा मात्र, क्योंकि फिलहाल वह चेहरा ही है। भीतर कितना पोटेंशियल है, वह भविष्य के गर्भ में छिपा है। फिलहाल वे राजनीति में सक्रिय भूमिका में नहीं हैं, इसलिए कहना होगा कि आज की तारीख में वे संभावना हैं, उपलब्धि नहीं।

आरन के व्यक्तित्व के साथ उनकी पृष्ठभूमि स्वतः जुड़ी हुई है। सचिन पायलट के पुत्र और स्वर्गीय राजेश पायलट के पौत्र होने का प्रभाव उनके चेहरे से अलग नहीं किया जा सकता। फिर भी उनकी देहयष्टि, आत्मविश्वास से भरी चाल, संयत मुस्कान और युवा आभा उन्हें केवल वंशज नहीं रहने देती। उनकी आंखों में नाना फारूक अब्दुल्ला की झलक और मुस्कान में सचिन पायलट की मृदुता देखी जा रही है। यह संयोग हो सकता है, पर राजनीति में संयोग भी संकेत बन जाते हैं। यह बात अतिशयोक्तिपूर्ण लग सकती है, मगर सचिन पायलट के कानों के पास झलकती सफेदी की तुलना में अंग्रेजीदां भूरे बाल अपेक्षाकृत अधिक चुंबकीय प्रतीत होते हैं। जाहिर सी बात है, पायलट के दीवाने उन्हें अपनी हथेलियों पर उठा लेंगे।

कहावत है, पूत के पग पालने में ही दिख जाते हैं। कदाचित यह चरितार्थ हो जाए। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो अल्हड़ जवानी की दहलीज पर खड़ा ऐसा चेहरा युवाओं को सहज ही आकर्षित कर सकता है। सोशल मीडिया ने इस आकर्षण को कई गुना बढ़ा दिया है। आरन का अवतार वायरल है, उनके व्यक्तित्व पर चर्चाएँ और आकलन इंटरनेट पर लगातार तैर रहे हैं। यह दौर पहली छवि का है, और आरन इस कसौटी पर फिलहाल खरे उतरते दिखते हैं।

राजनीति सौंदर्य, आभा या विरासत से आगे चलती है। किसी भी पौधे का भविष्य केवल बीज से नहीं, बल्कि उसे मिलने वाली धूप, हवा, पानी और खाद से तय होता है। ठीक वैसे ही आरन पायलट का भविष्य भी उनकी क्षमता, संगठन में सक्रियता, जनसंपर्क और संघर्ष पर निर्भर करेगा। वंशवाद उन्हें प्रवेश दिला सकता है, पर टिके रहना स्वयं अर्जित करना होगा।

यदि आरन पायलट सक्रिय राजनीति में आते हैं, तो उनका जुड़ाव डिजिटल राजनीति व सोशल मीडिया से होगा। यह कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है क्योंकि पार्टी लगातारयुवा चेहरों की कमी से जूझ रही है। उनका प्रवेश सचिन पायलट गुट को संस्थागत मजबूती देगा और यह संकेत देगा कि पायलट परिवार राजनीति में दीर्घकालिक निवेश कर रहा है। यह उन नेताओं को असहज करेगा, जो सचिन पायलट की उपस्थिति से पहले से परेशान हैं। हालांकि एंट्री धमाकेदार है, नया मगर दमदार नाम है, पर आज का मतदाता भावनात्मक नहीं, परिणामोन्मुख होता जा रहा है। यदि आरन जमीन पर काम करेंगे, संगठन में समय देंगे और सिर्फ विरासत नहीं, विजन पेश करेंगे तो वे स्वीकार किए जाएंगे। अन्यथा वे भी लॉन्च किए गए उन कई चेहरों की सूची में जुड़ सकते हैं, जो चमक कर बुझ गए।

आरन पायलट के मामले में सवाल यह नहीं है कि वे राजनीति में आएंगे या नहीं, सवाल यह है कि आने के बाद वे क्या साबित करेंगे। राजनीति में चेहरा प्रवेश दिलाता है, लेकिन पहचान केवल कर्म से बनती है।

एक बात और। एनएसयूआई के जिस प्रदर्शन में वे अवतरित हुए, उसमें उनके पीछे निरंजन साये की तरह दिखाई दिए। ज्ञातव्य है कि वे पायलट के निजी सहायक हैं। यानि आरन को उनका भी मानसिक संरक्षण हासिल है।

प्रसंगवश उल्लेखनीय है कि 2008 में जन्मे आरन पायलट, वर्तमान में अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिलवेनिया में राजनीति विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की पढ़ाई कर रहे हैं। वे फुटबॉल के अच्छे खिलाड़ी रहे हैं और किशोरावस्था में उभरते खेल प्रतिभा के रूप में चर्चा में आए थे। सोशल मीडिया पर वे अपने पिता और दादा की स्मृतियों से जुड़ी तस्वीरें साझा करते रहते हैं, जो उनकी पहचान को अतीत से जोड़ती हैं।

शनिवार, 27 दिसंबर 2025

अनेक शंहशाहों ने दी ख्वाजा साहब के दरबार में हाजिरी

दुनिया में कितने ही राजा, महाराजा, बादशाहों के दरबार लगे और उजड़ गए, मगर ख्वाजा साहब का दरबार आज भी शान-ओ-शोकत के साथ जगमगा रहा है। उनकी दरगाह में मत्था टेकने वालों की तादात दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है। गरीब नवाज के दर पर न कोई अमीर है न गरीब। न यहां जात-पात है, न मजहब की दीवारें। हर आम-ओ-खास यहां आता है। हिंदुस्तान के अनेक शहंशाहों ने बार-बार यहां आ कर हाजिरी दी है।

बादशाह अकबर शहजादा सलीम के जन्म के बाद सन् 1570 में यहां आए थे। अपने शासनकाल में 25 साल के दरम्यान उन्होंने लगभग हर साल यहां आ कर हाजिरी दी। बादशाह जहांगीर अजमेर में सन् 1613 से 1616 तक यहां रहे और उन्होंने यहां नौ बार हाजिरी दी। गरीब नवाज की चौखट पर 11 सितंबर 1911 को  विक्टोरिया मेरी क्वीन ने भी हाजिरी दी। इसी प्रकार देश के अनेक राष्ट्रपति और प्रधानमंत्रियों ने यहां जियारत कर साबित कर दिया है कि ख्वाजा गरीब नवाज शहंशहों के शहंशाह हैं। 

ख्वाजा साहब के दरगार में मुस्लिम शासकों ने सजदा किया तो हिंदू राजाओं ने भी सिर झुकाया है।

हैदराबाद रियासत के महाराजा किशनप्रसाद पुत्र की मुराद लेकर यहां आए और आम आदमी की तरह सुबकते रहे। ख्वाजा साहब की रहमत से उन्हें औलाद हुई और उसके बाद पूरे परिवार के साथ यहां आए। उन्होंने चांदी के चंवर भेंट किए, सोने-चांदी के तारों से बनी चादर पेश की और बेटे का नाम रखा ख्वाजा प्रसाद।

जयपुर के मानसिंह कच्छावा तो ख्वाजा साहब की नगरी में आते ही घोड़े से उतर जाते थे। वे पैदल चल कर यहां आ कर जियारत करते, गरीबों को लंगर बंटवाते और तब जा कर खुद भोजन करते थे। राजा नवल किशोर ख्वाजा साहब के मुरीद थे और यहां अनेक बार आए। मजार शरीफ का दालान वे खुद साफ करते थे। एक ही वस्त्र पहनते और फकीरों की सेवा करते। रात में फर्श पर बिना कुछ बिछाए सोते थे। उन्होंने ही भारत में कुरआन का पहला मुद्रित संस्करण छपवाया। जयपुर के राजा बिहारीमल से लेकर जयसिंह तक कई राजाओं ने यहां मत्था टेका, चांदी के कटहरे का विस्तार करवाया। मजार के गुंबद पर कलश चढ़ाया और खर्चे के लिए जागीरें भेंट कीं। महादजी सिंधिया जब अजमेर में शिवालय बनवा रहे थे तो रोजाना दरगाह में हाजिरी देते थे। अमृतसर गुरुद्वारा का एक जत्था यहां जियारत करने आया तो यहां बिजली का झाड़ दरगाह में पेश किया। इस झाड़ को सिख श्रद्धालु हाथीभाटा से नंगे पांव लेकर आए। जोधपुर के महाराज मालदेव, मानसिंह व अजीत सिंह, कोटा के राजा भीम सिंह, मेवाड़ के महाराणा पृथ्वीराज आदि का जियारत का सिलसिला इतिहास की धरोहर है। बादशाह जहांगीर के समय राजस्थानी के विख्यात कवि दुरसा आढ़ा भी ख्वाजा साहब के दर पर आए। जहांगीर ने उनके एक दोहे पर एक लाख पसाव का नकद पुरस्कार दिया, जो उन्होंने दरगाह के खादिमों और फकीरों में बांट दिया।

गुरु नानकदेव सन् 1509 में ख्वाजा के दर आए। मजार शरीफ के दर्शन किए, दालान में कुछ देर बैठ कर ध्यान किया और पुष्कर चले गए।

अंग्रेजों की खिलाफत का आंदोलन चलाते हुए महात्मा गांधी सन् 1920 में अजमर आए। उनके साथ लखनऊ के फिरंगी महल के मौलाना अब्दुल बारी भी आए थे। मजार शरीफ पर मत्था टेकने के बाद गांधीजी ने दरगाह परिसर में ही अकबरी मस्जिद में आमसभा को संबोधित किया था। उनके भाषण एक अंश था- हम सब भारतीय हैं, हमें अंग्रेजों की गुलामी से देश को आजाद कराना है, लेकिन शांति से, अहिंसा से। आप संकल्प करें... दरगाह की पवित्र भूमि पर आजादी के लिए प्रतिज्ञा करें... ख्वाजा साहब का आशीर्वाद लें। इसके बाद वे खादिम मोहल्ले में भी गए। स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने भी दरगाह की जियारत की और यहां दालान में सभा को संबोधित किया। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू व उनकी बहिन विजय लक्ष्मी पंडित और संत विनोबा भावे भी यहां आए थे।

देश की पहली महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी भी कई बार दरगाह आईं। उनके साथ राजीव गांधी व संजय भी आए, मगर बाद में राजीव गांधी अकेले भी आए। इसी प्रकार सोनिया गांधी भी दरगाह जियारत कर चुकी हैं। देश के अन्य प्रधानमंत्री, राज्यपाल व मुख्यमंत्री आदि भी यहां आते रहते हैं। पाकिस्तान व बांग्लादेश के प्रधानमंत्री भी यहां आ कर दुआ मांग चुके हैं।