गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026

अजमेर नगर निगम में कौन होगा नेता प्रतिपक्ष?

अजमेर नगर निगम के चुनाव संपन्न हो चुके हैं। अब सियासी गलियारों में एक नया सवाल तैरने लगा है कि निगम में कांग्रेस का नेता प्रतिपक्ष कौन होगा? कयास लगाए जा रहे हैं कि यह जिम्मेदारी चंद्रशेखर बालोटिया उर्फ काकू या सुनील केन में से किसी एक को सौंपी जा सकती है। हालांकि कांग्रेस के भीतर इसके लिए और भी दावेदार हो सकते हैं, लेकिन फिलहाल चर्चा इन्हीं नामों के इर्द-गिर्द घूम रही है। यह भी गौरतलब है कि शहर जिला कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. राजकुमार जयपाल ने पिछले निगम बोर्ड का कार्यकाल समाप्त होने से चंद दिन पहले ही काकू की धर्मपत्नी को सचेतक घोषित कर दिया था। हालांकि प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व से इसकी अनुमति नहीं मिली, लेकिन इस घटनाक्रम से इतना संकेत जरूर मिला कि संगठन में काकू को लेकर एक विशेष भरोसा मौजूद था। दूसरी ओर, उपमहापौर चुनाव में पराजित नौरत गुर्जर जिस तरह से सक्रिय दिखाई दे रहे हैं, उससे भी यह आभास मिल रहा है कि वे निगम में कांग्रेस की आवाज बनने की भूमिका निभा सकते हैं। आखिर उपमहापौर के चुनाव में उन्हें भाजपा प्रत्याशी के बराबर 40 वोट मिले थे। यह आंकड़ा अपने आप में उनकी राजनीतिक स्थिति का संकेत देता है। इतना ही नहीं, महापौर के चुनाव में पराजित किरण गढ़वाल को लेकर नौरत गुर्जर का यह कहना कि “कांग्रेस के लिए तो वे ही मेयर हैं”, इस बात की ओर भी संकेत करता है कि निगम की राजनीति में किरण गढ़वाल का प्रभाव आगे भी बना रह सकता है। ऐसे में कांग्रेस के सामने असली चुनौती केवल नेता प्रतिपक्ष का नाम तय करने की नहीं होगी, बल्कि निगम में अलग-अलग प्रभाव रखने वाले नेताओं और समूहों के बीच तालमेल बनाए रखने की भी होगी। एक तरफ नेता प्रतिपक्ष का औपचारिक पद होगा, दूसरी तरफ काकू, नौरत गुर्जर और किरण गढ़वाल जैसे अलग-अलग राजनीतिक प्रभाव वाले चेहरे भी सक्रिय रह सकते हैं। ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि कांग्रेस किसे अपना आधिकारिक चेहरा बनाएगी और बाकी शक्ति केन्द्रों को किस तरह साथ लेकर चलेगी? कुल जमा बात यह कि निगम में नेता प्रतिपक्ष कोई भी बने, कांग्रेस की राजनीति शायद केवल एक शक्ति केन्द्र तक सीमित नहीं रहने वाली। आने वाले दिनों में निगम की सियासत में एक से अधिक शक्ति केन्द्र दिखाई दे सकते हैं।

 

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शनिवार, 26 सितंबर 2026

क्या दरगाह में मिला था कांग्रेस को हाथ?

हालांकि वर्तमान में इस तथ्य के पुख्ता प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, अथवा पुश्टि करना कठिन है, मगर दरगाह से जुडे लोगों में यह किस्सा प्रचलित है कि कांग्रेस को चुनाव चिन्ह हाथ का आइडिया अजमेर स्थित दरगाह ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिष्ती में मिला था। प्रसंग इस प्रकार बताया जाता है। कोई 43 साल पहले भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीया श्रीमती इंदिरा गांधी दरगाह जियारत को आई थीं। उनके खादिम थे यूसुफ महाराज व इलियास महाराज। उन दिनों पार्टी का चुनाव बदलना जाना था। दरगाह जियारत कर गुंबद षरीफ से बाहर आने पर इंदिरा जी ने बताया कि उन्हें मजार षरीफ में हाथ का पंजा दिखाई दिया। इस पर खादिम यूसुफ महाराज ने कहा कि आप इसे कांग्रेस का चुनाव चिन्ह बना सकती हैं। उन्होंने सहमति जता दी। बाद में इसी चुनाव चिह्न पर कांग्रेस जीती। इंदिरा जी फिर जियारत को आईं तो उन्होंने चांदी का एक पंजा दरगाह षरीफ में भेंट किया। प्रसंगवष बता दें कि उनके ही भाई यूनुस महाराज को इंदिरा जी ने मसूदा से टिकट दिया था। वे जीते भी। कदाचित ऐसा भी हो सकता है कि हाथ को चुनाव चिन्ह बनाने की प्रेरणा उन्हें कहीं और से भी मिली हो, और दरगाह में भी ख्याल आ गया हो। कुछ लोगों का मानना है कि हाथ चिन्ह दरगाह षरीफ में मिलने का प्रसंग प्रोजेक्टेड भी हो सकता है। जानकारी के अनुसार इंदिरा जी जियारत के बाद मुख्य द्वार पर दुपट्टा बिछा कर माथा टेकती थीं। वे कई बार दरगाह आईं। एक बार वे संजय गांधी को पुत्र-रत्न (वरुण) होने पर संजय, मेनका व वरुण के साथ आईं और इतनी ध्यान मग्न हो गईं कि चांदी का जलता हुआ दीपक हाथ में लिए हुए काफी देर तक आस्ताना शरीफ में खड़ी रहीं। वह दीपक उन्होंने यहीं नजर कर दिया।

शनिवार, 12 सितंबर 2026

क्या पार्षद पशु हैं, जिन्हें बाड़े में बंद किया गया है?

 क्या पार्षद पशु हैं, जिन्हें बाड़े में बंद किया गया है? 

“बाड़ाबंदी” शब्द वास्तव में पार्षदों जैसे निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के संदर्भ में कुछ हद तक अपमानजनक और अमानवीय बिंब पैदा करता है। “बाड़ा” सामान्यतः उस स्थान को कहा जाता है जहां पशुओं को घेरकर रखा जाता है। राजनीति में “बाड़ाबंदी” का अर्थ हो गया है, चुनाव के दौरान पार्षदों को किसी होटल, रिसॉर्ट या अन्य स्थान पर एक साथ रखकर उनकी आवाजाही और संपर्क पर निगरानी रखना। इसलिए सवाल स्वाभाविक है कि जनता द्वारा चुने गए पार्षदों को पशुओं की तरह ‘बाड़े’ में बंद करने की स्थिति को हम सामान्य राजनीतिक शब्दावली क्यों मानें? यह शब्द इस पूरी प्रक्रिया की विडंबना को तो उजागर करता है, लेकिन जनप्रतिनिधियों की गरिमा को देखते हुए इसका इस्तेमाल सहज नहीं होना चाहिए। तो क्या “लामबंदी” बेहतर शब्द है? बिलकुल, “लामबंदी” कहीं अधिक गरिमापूर्ण और राजनीतिक रूप से उपयुक्त शब्द है। “लामबंदी” का अर्थ है, किसी उद्देश्य या पक्ष में लोगों को संगठित करना, एकजुट करना अथवा समर्थन के लिए तैयार करना। इसलिए कहा जा सकता है, 

पार्षदों की लामबंदी, समर्थन के लिए पार्षदों को एकजुट करना, मेयर चुनाव में पार्षदों का शक्ति-संगठन, पार्षदों को अपने पक्ष में लामबंद करने की कोशिश। हां, इतना जरूर है कि “बाड़ाबंदी” में व्यंग्य और विडंबना है, जबकि “लामबंदी” में राजनीतिक गरिमा है।

कैसा रहा अब तक के अजमेर नगर निकाय प्रमुखों का मिजाज?

आज जब अजमेर नगर निगम चुनाव की प्रक्रिया जारी है, ऐसे में यह प्रासंगिक होगा कि पूर्व के अध्यक्षों की कार्यशैली व मिजाज पर भी नजर डाली जाए।

1990 से 95 तक नगर परिषद के सभापति रहे स्वर्गीय श्री रतनलाल यादव का कार्यकाल ठीक ठाक रहा। जब भी आमसभा होती थी तो पार्षद खूब हंगामा करते थे, हावी रहते थे। रोचक बात है कि यादव चुपचाप सुनते रहते थे। कुछ नहीं बोलते थे। यहां तक कि हंगामा होते देख कर मुस्कराते रहते थे। उनके बाद 1995 से 2000्र तक सभापति रहे स्वर्गीय श्री वीरकुमार का कार्यकाल जीवंत रहा। उन्होंने नगर परिषद की ओर से कई नवाचार किए। पहली बार लगा कि नगर परिषद भी कोई संस्था है, जो नगर की धडकन से सीधे जुडी हुई है। दुर्भाग्य से वे कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए और हृदयाघात से उनका निधन हो गया। उसके बाद 24 जनवरी 2000 से 9 अप्रैल 2000 श्रीमती विद्या कमलाकर जोशी कार्यवाहक सभापति रहीं। 10 अप्रैल से 28 अगस्त 2000 तक सभापति का दायित्व श्री सुरेन्द्र सिंह शेखावत ने निभाया और वे वीरकुमार के नक्शेकदम पर चले। 28 अगस्त 2000 से 22 दिसम्बर 2003 सभापति श्रीमती अनिता भदेल बनीं। चूंकि अध्यापिका से सीधे पार्षद बन कर राजनीति में प्रवेश करने वाली श्रीमती अनिता भदेल को राजनीतिक अनुभव नहीं था, इस कारण ऐसे मौके आए, जब आम सभा में हंगामा होने पर रूआंसी हो जाती थीं और सभा स्थागित कर देती थीं। अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले ही वे विधायक बन गईं और उनके स्थान पर 22 दिसम्बर 2003 से 31 दिसम्बर 2005ः श्रीमती सरोज देवी जाटव को सभापति बनने की मौका मिला। वे कुछ खास उपलब्धि अपने खाते में दर्ज नहीं करवा पाई। फिर स्वर्गीय श्री वीरकुमार के शिष्य धर्मेन्द्र गहलोत ने 2005 से 2010 तक कुर्सी पर काबिज हुए। सन् 2008 में भाजपा शासनकाल में तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे की पहल पर नगर परिषद को नगर निगम का दर्जा दे दिया गया। इसकी घोषणा उन्होंने अजमेर में ही की। वे यहां राज्य स्तरीय गणतंत्र समारोह में शिरकत करने आई थीं। इस लिहाज से श्री धर्मेन्द्र गहलोत को पहला मेयर बनने का गौरव हासिल हुआ। हालांकि जनसंख्या संबंधी औपचारिकता बाद में कुछ गांव मिला कर की गई। उनका यह कार्यकाल जांबाजी से भरा रहा। उन्हें कई बार अतिक्रमण हटाओ दस्ते का नेतृत्व करते देखा गया। उन्होंने स्वर्गीय श्री वीर कुमार के कदमों पर चलते हुए निगम में कामकाज में सुधार किया। अगस्त 2010 में करीब बीस साल भाजपा का कब्जा रहने के बाद पहली बार कांग्रेस के नए चेहरे वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी व पूर्व पार्षद स्वर्गीय श्री हरिशचंद जटिया के पुत्र श्री कमल बाकोलिया अजमेर नगर निगम के पहले निर्वाचित मेयर बने। उन्होंने भाजपा के डॉ. प्रियशील हाड़ा को पराजित किया। आरंभ के चंद साल तो ठीक ठाक काम किया, मगर कार्यकाल का बाकी हिस्सा सरकार पलटने के कारण यूं ही बीत गया। 2015 में नई व्यवस्था के तहत मेयर का चुनाव पार्षदों में से किया गया और एक बार फिर धर्मेन्द्र गहलोत मेयर बने। दूसरी बार वे कुछ संयत नजर आए और उनमें मैच्योरिटी नजर आई। उनके कार्यकाल में भी निगम ने सामाजिक सरोकार के बहुत काम किए।

2020 में भाजपा की श्रीमती ब्रजलता हाडा मेयर चुनी गई। उनके कार्यकाल में आनासागर में जलकुंभी और भारी बारिश के दौरान सडकों पर पानी फैलने की विकट समस्याएं आईं, जिनसे उन्होंने बखूबी निपटा। वे कूल माइंड रहीं, इस कारण विवादों में नहीं उलझीं। जाहिर तौर पर उनके पति डॉ प्रियशील हाडा, जो शहर जिला भाजपा के अध्यक्ष रहे, उनका भरपूर सहयोग किया। एक बार फिर अजमेर को महिला मेयर मिलने जा रही है।

गुरुवार, 20 अगस्त 2026

डॉ. शामिका रवि ने किया बिहार के प्रथम सेंटर फॉर अर्बन पॉलिसी एंड गवर्नेस का विधिवत शुभारंभ

 आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय, पटना में बिहार के प्रथम सेंटर फॉर अर्बन पॉलिसी एंड गवर्नेस का विधिवत शुभारंभ आज प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य डॉ. शामिका रवि ने किया। इस दौरान कार्यक्रम में केंद्रीय राज्य मंत्री, जल शक्ति मंत्रालय, भारत सरकार डॉ. राजभूषण चौधरी, सांसद शांभवी चौधरी तथा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. (डॉ.) शरद कुमार यादव समेत विश्वविद्यालय के पदाधिकारी, शिक्षक, शोधार्थी और बड़ी संख्या में विद्यार्थी मौजूद रहे। इस केंद्र की स्थापना,  बिहार में तेजी से बढ़ते शहरीकरण की चुनौतियों को समझने और उनके समाधान के लिए प्रमाण आधारित शोध की दिशा में महत्वपूर्ण है।


उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए डॉ. शामिका रवि ने आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. शरद कुमार यादव की पहल, दूरदृष्टि और नेतृत्व की विशेष सराहना की। उन्होंने कहा कि शहरी नीति और शासन जैसे समसामयिक विषय पर केंद्र की स्थापना समय की आवश्यकता है। देश तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ रहा है, ऐसे में विश्वविद्यालयों की भूमिका केवल कक्षाओं और पाठ्यक्रमों तक सीमित नहीं रह सकती। उच्च शिक्षण संस्थानों को समाज और शासन के सामने मौजूद वास्तविक समस्याओं पर शोध करना होगा और उनके व्यावहारिक समाधान के लिए नीति संवाद को मजबूत करना होगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह केंद्र शहरी विकास से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर गुणवत्तापूर्ण शोध को बढ़ावा देगा और नीति-निर्माताओं तथा अकादमिक जगत के बीच प्रभावी संवाद का मंच बनेगा।

कुलपति प्रो. (डॉ.) शरद कुमार यादव ने कहा कि सेंटर फॉर अर्बन पॉलिसी एंड गवर्नेस केवल एक नए अकादमिक केंद्र की शुरुआत नहीं, बल्कि शहरी भारत की बदलती जरूरतों पर शोध, संवाद और नीति-विमर्श के लिए समर्पित मंच का निर्माण है। उन्होंने कहा कि बिहार के शहर तेजी से बदल रहे हैं। शहरीकरण से आर्थिक गतिविधियों, रोजगार और विकास के अवसर बढ़ रहे हैं, लेकिन इसके साथ आवास, यातायात, जलापूर्ति, स्वच्छता, पर्यावरण, सार्वजनिक स्वास्थ्य और आधारभूत संरचना जैसी चुनौतियां भी बढ़ रही हैं। इन समस्याओं का समाधान स्थानीय परिस्थितियों, उपलब्ध आंकड़ों और नागरिकों की वास्तविक जरूरतों को ध्यान में रखकर ही संभव है।

प्रो. शरद कुमार यादव ने कहा कि शहरी समस्याओं को समझने के लिए केवल एक विषय का दृष्टिकोण पर्याप्त नहीं है। अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, पर्यावरण अध्ययन, इंजीनियरिंग, प्रशासन, सार्वजनिक नीति और डेटा विज्ञान जैसे विभिन्न क्षेत्रों को साथ लेकर बहुविषयक शोध की आवश्यकता है। केंद्र का उद्देश्य इसी समन्वित दृष्टिकोण को संस्थागत रूप देना है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का प्रयास रहेगा कि केंद्र शोध, नीति और व्यावहारिक शासन के बीच प्रभावी सेतु के रूप में कार्य करे। विद्यार्थियों और शोधार्थियों को वास्तविक शहरी समस्याओं, स्थानीय निकायों और समुदायों के साथ काम करने का अवसर भी उपलब्ध कराया जाएगा।

वहीं, मौके पर केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. राजभूषण चौधरी ने कहा कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण के दौर में बेहतर आधारभूत संरचना और प्रभावी प्रशासन बेहद जरूरी है। शहरों के विकास के लिए स्वच्छता, पेयजल, परिवहन, पर्यावरण संरक्षण और नागरिक सुविधाओं की मजबूत व्यवस्था के साथ शहरी प्रशासन को अधिक जवाबदेह, सक्षम और नागरिक केंद्रित बनाना होगा। उन्होंने कुलपति की पहल की सराहना करते हुए कहा कि यह केंद्र बिहार में शहरी नीति और प्रशासन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। उन्होंने सरकार, विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और स्थानीय निकायों के बीच बेहतर समन्वय को समय की आवश्यकता बताया।

सांसद शांभवी चौधरी ने कहा कि शहरी विकास को केवल सड़कों, भवनों और भौतिक आधारभूत संरचना तक सीमित नहीं किया जा सकता। बेहतर शहर के लिए पारदर्शी प्रशासन, नागरिक सहभागिता, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समावेशन और समान अवसर भी जरूरी हैं। उन्होंने कहा कि परिवहन, स्वच्छता, हरित क्षेत्र और सार्वजनिक सुविधाएं सीधे तौर पर नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं। उन्होंने केंद्र की स्थापना को विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए नई संभावनाओं का द्वार बताया।

केंद्र के माध्यम से सरकार, शहरी स्थानीय निकायों, विकास एजेंसियों, विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और विशेषज्ञों के बीच सहयोग बढ़ाने की योजना है। यहां विशेषज्ञ व्याख्यान, नीति संवाद, शोध परियोजनाएं, कार्यशालाएं, क्षेत्रीय अध्ययन, अंतर्विषयक शोध और व्यावहारिक प्रशिक्षण जैसी गतिविधियां संचालित की जाएंगी। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों और शोधार्थियों को शहरी विकास की जमीनी चुनौतियों से परिचित कराने के साथ उन्हें शोध और नीति-विश्लेषण की व्यावहारिक समझ देना है।

कार्यक्रम में शहरी विकास, सुशासन, स्थानीय शासन, नागरिक सहभागिता और भविष्य की शहरी चुनौतियों पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि बिहार के सतत और समावेशी शहरी विकास के लिए प्रमाण आधारित नीति, सक्षम स्थानीय संस्थाएं और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। विश्वविद्यालय के विभिन्न स्कूलों के शिक्षक, विद्यार्थी और शोधार्थियों के साथ पटना स्थित अन्य शोध संस्थानों के शिक्षकों एवं शोधार्थियों की भी सक्रिय भागीदारी रही।

कुलपति प्रो. शरद कुमार यादव ने विश्वास जताया कि आने वाले वर्षों में यह केंद्र शहरी नीति, शासन और विकास के क्षेत्र में शोध, प्रशिक्षण और नीति संवाद का महत्वपूर्ण केंद्र बनेगा। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का लक्ष्य ज्ञान को समाज और शासन की वास्तविक जरूरतों से जोड़ना है। बिहार के तेजी से बदलते शहरी परिदृश्य में स्थानीय अनुभवों और प्रमाणों पर आधारित ज्ञान का निर्माण ही बेहतर नीति और बेहतर शहरों की आधारशिला बनेगा।