बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

बेअसर रही शांति. शांति. शांति की अपील

शांति... शांति... शांति! मगर अफसोस, महापौर श्रीमती अनामिका शर्मा की इस अपील का नगर निगम की बैठक में कोई असर होता दिखाई नहीं दिया। पार्षद आपस में भिड़ते रहे और महापौर हाथ बांधे बेबस-सी खड़ी देखती रहीं। दृश्य कुछ ऐसा था, मानो सदन में उनकी मौजूदगी का कोई वजूद ही न हो। मन ही मन शायद सोच रही होंगी कि जब अपनी ही पार्टी के पार्षद काबू में नहीं हैं, तो विपक्ष से अनुशासन की उम्मीद आखिर कैसे की जाए!

विडंबना देखिए कि जिस सदन की सर्वोच्च कुर्सी पर बैठी महिला से शहर की समस्याओं के समाधान और सदन के संचालन की उम्मीद की जाती है, उसी सदन में उनकी गरिमा का ख्याल रखने की जहमत पक्ष लॉबी के पार्षद भी उठाते नजर नहीं आए। सवाल केवल हंगामे का नहीं, बल्कि उस कुर्सी के सम्मान का भी है, जिस पर बैठकर शहर की सरकार चलाई जाती है।

यह नजारा देखकर अचानक एक पुराना दृश्य आंखों के सामने घूम गया। नगर परिषद की सभा में तत्कालीन सभापति श्रीमती अनिता भदेल शुरुआती दिनों में हंगामे देखकर हक्का-बक्का रह जाती थीं। एक बार तो नौबत यहां तक आ गई कि वे रूआंसी हो गईं। स्वाभाविक भी था। पहली बार पार्षद बनी थीं और सौभाग्य से सीधे सभापति की कुर्सी तक पहुंच गई थीं। संभवतः सदन की ऐसी तीखी और अप्रत्याशित राजनीतिक परिस्थितियों से उनका पहली बार सामना हुआ था।

आज कुछ-कुछ वैसी ही स्थिति श्रीमती अनामिका शर्मा के सामने दिखाई दी। एक गृहिणी से सीधे पार्षद और फिर महापौर की कुर्सी तक पहुंचने का उनका सफर निस्संदेह उल्लेखनीय है। मगर घर-परिवार की सहज दुनिया और सियासत के शोरगुल भरे अखाड़े में जमीन-आसमान का अंतर है। यहां केवल विनम्रता, सरलता और सद्भाव से काम नहीं चलता, कभी-कभी दृढ़ता, निर्णय क्षमता और अनुशासन लागू करने का साहस भी दिखाना पड़ता है।

बैठक में उनकी ओर से बार-बार की गई ‘शांति... शांति... शांति!’ की अपील ऐसी साबित हुई, मानो नक्कारखाने में तूती की आवाज। पार्षदों पर उसका कोई खास असर नहीं पड़ा। श्रीमती अनामिका शर्मा के व्यक्तित्व में नारी सुलभ सहजता, सरलता के साथ बालसुलभ मासूमियत की झलक दिखाई देती है। लेकिन सियासत की विडंबना यही है कि यहां कई बार इन गुणों को कमजोरी समझ लिया जाता है। जो जितना सरल है, उसे उतना ही आसानी से नजरअंदाज कर देने की प्रवृत्ति भी राजनीति में कम नहीं। ऐसे में अनामिका शर्मा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी सहजता को बनाए रखते हुए अपने पद की गरिमा और अधिकारों का अहसास कराना है।

हालांकि, किसी एक बैठक के दृश्य को उनके पूरे कार्यकाल का पैमाना मान लेना जल्दबाजी होगी। यह भी संभव है कि सदन के शुरुआती कटु अनुभव उन्हें आगे के लिए अधिक सजग और मजबूत बनाएं। सियासत का अनुभव किताबों या भाषणों से नहीं, बल्कि ऐसे ही कठिन प्रसंगों से हासिल होता है। देखने वाली बात यह होगी कि वे इन अनुभवों से कितना सीखती हैं और आने वाली बैठकों में अपनी नेतृत्व क्षमता का कैसा परिचय देती हैं।

वैसे, उनके भाषणों की शुरुआत और समापन ‘भारत माता की जय’ के उद्घोष के साथ होता है। स्कूल में सीखे इस संस्कार की झलक उनके आत्मविश्वास में भी दिखाई देती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यही आत्मविश्वास सदन के भीतर भी नजर आएगा। क्योंकि महापौर की कुर्सी केवल सम्मान का प्रतीक नहीं, जिम्मेदारी निभाने और जरूरत पड़ने पर सख्त फैसले लेने का अधिकार भी देती है।

और अंत में, उम्मीद तो यही है कि भगवान परशुराम के वंश से जुड़ी अनामिका शर्मा की रगों में दौड़ रहा लहू केवल परिचय और गौरव का विषय बनकर न रह जाए। उसमें अन्याय, अनुशासनहीनता और अपनी ही कुर्सी की अवमानना के खिलाफ खड़े होने का उबाल भी दिखाई दे।

आखिरकार, सदन में शांति बनाए रखना अच्छी बात है, मगर हर बार केवल शांति की अपील करना काफी नहीं। कभी-कभी शांति स्थापित करने के लिए सख्ती भी जरूरी होती है। अब देखना यह है कि महापौर मैडम कब कब सदन को यह अहसास कराती हैं कि उनकी विनम्रता को कमजोरी समझने की भूल न की जाए।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें