बुधवार, 18 अक्तूबर 2017

सचिन पायलट का तोड़ नहीं है भाजपा के पास

हालांकि अभी पक्के तौर कहना कठिन है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट अजमेर लोकसभा सीट का उपचुनाव लड़ेंगे ही, मगर इसकी प्रबल संभावना के मद्देनजर भाजपा तनिक चिंतित नजर आ रही है। उसके पास उनका तोड़ नहीं है। स्थानीय स्तर पर कोई विकल्प न अब है और न ही उनके पहले चुनाव के समय था। तब भी भाजपा को किरण माहेश्वरी को अजमेर से लड़ाना पड़ा था और वे हार गई थीं। हालांकि दूसरे चुनाव में राज्य किसान आयोग के पूर्व अध्यक्ष व अजमेर के भूतपूर्व सांसद प्रो. सांवरलाल जाट ने जरूर उन्हें हराया था, मगर उसकी एक मात्र वजह थी देशव्यापी मोदी लहर।
वस्तुत: सचिन पायलट इस कारण मजबूत प्रत्याशी नहीं हैं कि प्रदेश  कांग्रेस के अध्यक्ष हैं, अपितु इस वजह से हैं क्योंकि जब वे अजमेर के सांसद और केन्द्र में मंत्री थे, तब उन्होंने अनेक उल्लेखनीय काम कराए थे। अजमेर के वे पहले जनप्रतिनिधि थे, जिन्हें केन्द्रीय मंत्रीमंडल में मौका मिला था। कांग्रेस हाईकमान से नजदीकी के चलते कई महत्वपूर्ण विकास कार्य उन्होंने आसानी से करवा लिए। जनता यह बखूबी जानती है कि जितने काम उन्होंने पांच साल में करवाए, उनका एक प्रतिशत भी यहां से पांच बार सांसद रहे भाजपा के प्रो. रासासिंह रावत नहीं करवा पाए। असल में वे पांच बार जीतने के बाद भी कभी महत्वपूर्ण स्थिति में नहीं रहे।
बहरहाल, आज जब फिर सचिन पायलट के अजमेर से लडऩे की संभावना है, भाजपा उनको टक्कर देने के लिए उपयुक्त प्रत्याशी की तलाश कर रही है। एक तो सचिन पायलट के प्रति जनता का विश्वास है, दूसरा केन्द्र व राज्य सरकार के प्रति एंटीइंकंबेसी फैक्टर भी काम कर रहा है। ऐसे में स्थानीय कोई भी भाजपा नेता उनको टक्कर देने की स्थिति में नहीं है। स्वर्गीय प्रो. सांवरलाल जाट के पुत्र रामस्वरूप लांबा टिकट हासिल करने के लिए पूरा दबाव बनाए हुए हैं, मगर भाजपा हाईकमान उन पर दाव खेलने से पहले दस बार सोचने को मजबूर है। भाजपा की सबसे बड़ी मजबूरी ये है कि उसे किसी भी सूरत में किसी जाट को ही टिकट देना है। अगर किसी गैर जाट को टिकट देती है तो पूरा जाट समुदाय खिलाफ जा सकता है। लांबा के अतिरिक्त भाजपा के पास अजमेर डेयरी के अध्यक्ष रामचंद्र चौधरी व पूर्व जिला प्रमुख श्रीमती सरिता गेना के श्वसुर सी बी गेना हैं, मगर वे भी सचिन पायलट का मुकाबला कर पाएंगे या नहीं, इस पर भाजपा में गंभीर मंथन चल रहा है। एक संभावना ये भी बताई जा रही है कि भाजपा प्रमुख जाट नेता सतीश पूनिया पर दाव खेल ले। यूं गैर जाटों में देहात जिला भाजपा अध्यक्ष डॉ. बी पी सारस्वत, पूर्व जिला प्रमुख पुखराज पहाडिय़ा, नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष धर्मेश जैन आदि के नाम चर्चा में हैं।
भाजपा को अगर भरोसा है तो केवल इस पर कि वह सत्ता में हैं और सरकारी मशीनरी का आसानी से दुरुपयोग कर सकती है। संभव है कि सत्ता के दम पर वह कांग्रेस में तोडफ़ोड़ करे, हालांकि इसकी संभावना कुछ कम इस कारण है कि आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा का परफोरमेंस बेहतर होने में संदेह है। अगर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कमान संभाली तो यह तय है कि यहां धनबल का भी खूब इस्तेमाल होगा, लेकिन उससे सचिन पायलट को फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि वे भी सक्षम हैं। सचिन पायलट के अजमेर से लडऩे की संभावना के मद्देनजर ही मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अजमेर का तीन दिन का दौरा करने वाली हैं। उनके निर्देश पर अनेक मंत्री यहां दौरा कर प्रशासन को चुस्त कर चुके हैं, मगर पिछले साढ़े तीन साल से विकास को तरस रही जनता का मूड बदलेगा, इसको लेकर संदेह है।
कुल मिला कर सचिन पायलट के यहां से लडऩे के आसार होने के कारण भाजपा तनिक परेशान हैं। इसकी बड़ी वजह ये है कि अगर भाजपा हारती है तो यह संकेत जाएगा कि मोदी का जादू व वसुंधरा का आकर्षण खत्म हो गया है, जिसका आगामी विधानसभा चुनाव में नुकसान उठाना पड़ेगा। सचिन पायलट या कोई अन्य कांग्रेसी प्रत्याशी जीतता है तो कांग्रेस कार्यकर्ता का इकबाल ऊंचा होगा, जो विधानसभा चुनाव में जोश प्रदान करेगा। खैर, देखते हैं, आगे होता है क्या?

तेजवानी गिरधर
7742067000

किशनगढ़ एयरपोर्ट का श्रेय किसके खाते में?

यह एक अत्यंत सुखद बात है कि अजमेर जिले के वासियों की वर्षों पुरानी एयरपोर्ट की मांग आखिरकार पूरी हो गई, मगर इसके श्रेय को लेकर जो राजनीतिक विवाद हुआ, उसने मानो रंग में भंग सा कर दिया।
इसमें कोई दोराय नहीं है कि किशनगढ़ में एयरपोर्ट के लिए आरंभिक कवायद के साथ समस्त बाधाओं को दूर करने में कांग्रेस की तत्कालीन केन्द्र व राज्य सरकारों के साथ विशेष रूप से अजमेर के पूर्व सांसद व तत्कालीन केन्द्रीय राज्य मंत्री सचिन पायलट की अहम भूमिका है। इसे कोई झुठला नहीं सकता। बेशक पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के चलते पायलट हार गए, मगर अजमेर जिले की आम जनता के जेहन में यह तथ्य बैठ चुका है कि पायलट की बदोलत ही जिले में एयरपोर्ट का मार्ग प्रशस्त हुआ है। जनता के मन यह बात भी स्थापित है कि जो काम पांच बार सांसद रहने पर प्रो. रासासिंह रावत ने नहीं किया, वह मात्र पांच साल में ही सचिन ने कर दिखाया। जानकार लोगों को पता है कि एयरपोर्ट को लेकर आ रही तकनीकी व कानूनी बाधाओं को दूर करने में पायलट ने अपने प्रभाव का किस प्रकार इस्तेमाल किया। केवल कांग्रेसी ही नहीं, बल्कि भाजपाई भी इस बात को स्वीकार करते रहे हैं कि एयरपोर्ट पायलट की देन है। अगर कोई सिर्फ दावे पर यकीन करता है तो उसके लिए यह तनिक विचारणीय है कि क्या बिना नक्शा पास हुए व वित्तीय स्वीकृतियों के बगैर कोई निर्माण हवा में करना संभव है?
बहरहाल, साथ ही यह धरातलीय सच्चाई भी नहीं नकारी जा सकती कि एयरपोर्ट की योजना भाजपा के शासनकाल में पूरी हुई है, मगर जब इसका पूरा का पूरा श्रेय मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने लेने की कोशिश की तो विवाद होना ही था। मुख्यमंत्री जैसे गरिमापूर्ण पद पर होने के बावजूद उदारतापूर्वक पायलट के योगदान को स्वीकार करने की बजाय कांग्रेस पर हमला बोला कि वह तो केवल शिलान्यास के पत्थर ही रखती है, विकास तो भाजपा कराती है। ऐसे में कांग्रेस नेताओं का पलटवार करना स्वाभाविक था। वे चाहतीं तो एयरपोर्ट का काम पूरा करवाने में अपनी सरकार की उपलब्धि का हवाला देते हुए पायटल की भूमिका का भी जिक्र कर सकती थीं, जिससे उनका बड़प्पन झलकता, मगर वह अवसर उन्होंने खो दिया। राजनीति में वह सदाशयता अब बची भी कहां है।
वस्तुत: यह सपाट सत्य है कि विकास की योजनाएं बनती हैं और पूरी होती हैं, इस दरम्यान सरकारें बदल जाती हैं। ऐसे में जिस सरकार के कार्यकाल में वे पूरी होती हैं, वह इसका श्रेय लेने की कोशिश करती है, मगर जनता सब जानती है। दावा चाहे कोई भी करे, मगर जन-जन में जो तथ्य बैठ चुका है, उसे कोई दावा साफ नहीं कर सकता। किशनगढ़ एयरपोर्ट के मामले में भी यही हुआ। जनता तो समझ ही रही थी कि यह पायलट की ही देन है, यहां तक कि वसुंधरा राजे भी जानती थी कि जनमानस में यह बैठा हुआ है कि एयरपोर्ट पायलट की मेहनत का परिणाम है, बावजूद इसके उन्होंने पूरा श्रेय लेने की कोशिश की। श्रेय लेने की इच्छा का सबसे बड़ा सूबत ये है कि नियमित उड़ानें शुरू होने में अभी भी समय है, मगर आचार संहिता लागू हो जाने के डर से जल्दबाजी में इसका उद्घाटन कर दिया गया। समझा जा सकता है कि लोकसभा उपचुनाव में वे इसका लाभ लेना चाहती हैं।
जाहिर सी बात है कि जैसे ही दावे-प्रतिदावे हुए तो मीडिया भी उसमें कूद पड़ा। अमूमन कांग्रेस के खिलाफ लिखने वाले कलमकारों भी स्वीकार किया कि वसुंधरा ने राजनीतिक चतुराई का इस्तेमाल किया है। वे भी इस तथ्य को सहज भाव से स्वीकार कर रहे हैं कि पायलट की महत्वपूर्ण भूमिका है। एक वरिष्ठ एवं स्वतंत्र लेखक ने तो लिखा है कि सबसे पहले पायलट ने ही किशनगढ़ के पास हवाई अड्डा होने का सपना देखा था।
खैर, राजनीति में दावेबाजी चलती रहती है, उसे रोका भी नहीं जा सकता, मगर किसका दावा स्वीकार करना है, यह तो जनता ही तय करेगी।
-तेजवानी गिरधर

मंगलवार, 10 अक्तूबर 2017

क्या प्रो. सारस्वत आरपीएससी के चेयरमेन बनाए जा रहे हैं?

अजमेर भाजपा के देहात जिला अध्यक्ष बी.पी.सारस्वत ने एमडीएस यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर के पद की नौकरी छोडऩे का जैसे ही विधिवत नोटिस दिया है, वैसे ही एक तो ये कयास लगाया जा रहा है कि उन्हें लोकसभा उपचुनाव में टिकट का संकेत दे दिया गया है, वहीं एक अंदाजा ये भी लगाया जा रहा है कि उन्हें आरपीएससी का चेयरमेन बनाया जा सकता है। हालांकि प्रत्यक्षत: इस आशय की फेसबुक पोस्ट राजनीतिक पंडित एडवोकेट राजेश टंडन ने शाया की है, मगर इससे भी इतर शहर में इस प्रकार की चर्चा है। यदि ऐसा होना ही है तो सवाल ये उठता है कि इतनी टॉप सीक्रेट बात वायरल कैसे हो गई? कहीं खुद सारस्वत के मुंह से कहीं ये रहस्य उद्घाटित तो नहीं हो गया? या फिर जिस स्तर पर इस बाबत मंत्रणा हुई है, वहां से किसी ने लीक किया है? टंडन साहब के तो चलो किसी सोर्स ने बताया हो सकता है, मगर यदि राजनीति में रुचि रखने वालों तक भी इस प्रकार की सूचना है तो उनके पास यह बात कैसे पहुंची? क्या उस स्तर पर ये केवल कयास मात्र है? जो कुछ भी हो, जब तक उनकी नियुक्ति नहीं हो जाती, ये अफवाह ही कहलाएगी, क्योंकि इसकी पुष्टि तो कोई करने वाला है नहीं।
हां, इतना जरूर है कि अगर उनके उपचुनाव लडऩे की संभावना है,  तो केवल उसके लिए उनको मौजूदा पोस्ट से इस्तीफा देने की जरूरत ही नहीं है। यूनिवर्सिटी की नौकरी रहते हुए भी वे चुनाव लडऩे को स्वतंत्र हैं। इस कारण चुनाव लडऩे वाली बात में दम कम नजर आता है। हालांकि यह सही है कि स्थानीय स्तर पर उन्होंने जरूर ऐसा माहौल बना लिया है कि वे सबसे प्रबल दावेदार हैं, मगर राजनीतिक समीकरणों में उनकी दावेदारी मजबूत नजर नहीं आती। उसकी वजह ये है कि भाजपा किसी भी सूरत में गैर जाट को टिकट देने का दुस्साहस नहीं करेगी। जैसे ही किसी गैर जाट को टिकट दिया गया तो जाट भाजपा के खिलाफ लामबंद हो जाएंगे। ऐसे में एक कयास ये भी लगाया जा रहा है कि स्वर्गीय प्रो. सांवरलाल जाट के पुत्र रामस्वरूप लांबा को किसान आयोग का अध्यक्ष बना दिया जाएगा और नसीराबाद विधानसभा सीट देने का वादा किया जाएगा। क्या इस सौदेबाजी से जाट समुदाय राजी हो जाएगा, इस बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। राजी होने का एक सूरत ये ही है कि लांबा के अतिरिक्त कोई दूसरा जाट नेता ऐसा नहीं है, जिसकी वाकई दावेदारी बनती हो। अगर लांबा ने सौदेबाजी कर भी ली तो भाजपा को यह खतरा तो बना ही रहेगा कि कोई छोटा-मोटा जाट नेता निर्दलीय रूप से मैदान में उतर सकता है।
जो कुछ भी हो, मगर इतना जरूर है कि सारस्वत के नए कदम से राजनीतिक हलकों हलचल मच गई है। वे मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के करीबी भी हैं, ये सब जानते हैं। ऐसे में अचानक नौकरी छोडऩे का नोटिस यह साफ जाहिर करता है कि जरूर कुछ न कुछ महत्वपूर्ण होने जा रहा है। एक संभावना ये भी है कि चूंकि वरिष्ठ भाजपा नेता घनश्याम तिवाड़ी ने वसुंधरा राजे के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी की वजह से ब्राह्मण समुदाय के कुछ लोग नाराज हैं, उन पर ठंडे छींटे डालने के लिए सारस्वत को कोई दमदार ओहदा दिया जा रहा हो।
हालांकि खुद सारस्वत ने यह कह कर दिग्भ्रमित करने की कोशिश की है कि उनके इस्तीफे के नोटिस को उपचुनाव से नहीं जोड़ा जाए, मगर दूसरी ओर यह कह कर यह संभावना भी बरकरार रखी है कि अगर वसुंधरा राजे ने  कहा तो वे चुनाव लडऩे को तैयार हैं। वैसे इतना जरूर तय है कि अगर उन्हें आरपीएससी का चेयरमेन बनाया जा रहा है तो वह जल्द ही होगा, क्योंकि निकट भविष्य में कभी भी चुनाव की तारीख का ऐलान होने वाला है, जिसके साथ आचार संहिता लग जाएगी।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

सोमवार, 9 अक्तूबर 2017

संघी तो नहीं लेने देंगे चौधरी को टिकट

हाल ही मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अजमेर आईं तो उन्होंने अजमेर लोकसभा सीट के उपचुनाव के लिए उपयुक्त प्रत्याशी के लिए स्थानीय नेताओं से सलाह-मश्विरा किया। अगर खबरची व राजनीतिक पंडित एडवोकेट राजेश टंडन की फेसबुक पोस्ट को सही मानें तो चर्चा में अजमेर डेयरी के अध्यक्ष रामचंद्र चौधरी का नाम आया, हालांकि उन्होंने नाम का खुलासा करने से बचते हुए उन्हें दूध वाले भैया व दूधनाथ के नाम से संबोधित किया है। खोज-खबर के अनुसार चौधरी के प्लस-माइनस पर विचारों का आदान-प्रदान भी हुआ। उससे तो यही प्रतीत होता है कि कम से कम संघियों को तो चौधरी फूटी आंख नहीं सुहाते। उन्होंने एक संघनिष्ठ और संस्कारित पुराने बैंडमास्टर नेता जी का हवाला दिया है, निश्चित ही वे अजमेर भाजपा के भीष्म पितामह रह चुके नेताजी का जिक्र कर रहे हैं। जैसे ही ये बात आई कि चौधरी के पक्ष में खूब नारे लगते हैं और मीडिया भी उन पर मेहरबान है, तो तथाकथित बैंड मास्टर से नहीं रहा गया और तपाक से बोले कि उनको खाना-वाना खिला कर भीड़ जुटाने में हैडमास्टरी है और अखबार वालों को समय-समय पर देसी घी की थैली देते हैं। इस पर मैडम ने इसे तो चौधरी की खूबी करार दिया। जब उन्हें ये बताया गया कि वे जब कांग्रेसी थे तो उनके खिलाफ अखबार वाले हड़ताल कर चुके हैं, इस पर भी मैडम ने यही प्रतिक्रिया दी कि ये तो अच्छी बात है कि हमारे यहां आ कर वे कितने सुधर गए हैं, जो मीडिया वाले हड़ताल कर चुके हैं, वे ही तारीफों के पुल बांध रहे हैं।
खैर, कुल जमा इस संक्षिप्त वार्तालाप से अंदाजा लगाया जा सकता है कि चौधरी संघ को तो हजम नहीं हैं, जबकि वसुंधरा की नजर में वे जंच रहे प्रतीत होते हैं। समझा जा सकता है कि वसुंधरा आरंभ से गैर संघियों को साथ लेकर चल रही हैं। जैसे अजमेर सीट के सांसद रहे प्रो. सांवरलाल जाट। वे भी संघ पृष्ठभूमि के नहीं थे, इस कारण संघ को कभी रास नहीं आए। वसुंधरा ही उन्हें आगे ले कर आईं और अस्वस्थता के चलते केन्द्रीय मंत्रीमंडल से हटाए जाने के बाद राज्य किसान आयोग का अध्यक्ष बनाया। हालांकि अकेली वसुंधरा ही प्रत्याशी तय नहीं करेंगी, भाजपा हाईकमान का भी अहम रोल होगा, मगर उनकी चली तो चौधरी गंभीर दावेदार हो सकते हैं। अगर वे टिकट लेने में कामयाब नहीं होते तो यह तय मान कर चलिए कि उसमें संघ वालों का ही हाथ होगा। भला कांग्रेसी कल्चर वाले को संघ क्यों आगे आने देगा?
असल में भाजपा की दिक्कत ये है कि उसे प्रो. जाट के निधन से खाली हुई सीट पर किसी जाट को ही टिकट देना मजबूरी है। सबसे पहले दावेदार प्रो. जाट के पुत्र रामस्वरूप लांबा हैं, मगर लगता यही है कि भाजपा उन्हें अपेक्षित मजबूत नहीं मान रही, इसी कारण रामचंद्र चौधरी पर विचार हो रहा है। चर्चा सी बी गेना की भी है, मगर सबसे उपयुक्त चौधरी को माना जा रहा है। टिकट हासिल करने के लिए उन्होंने एडी से चोटी का जोर भी लगा रखा है। उनकी सबसे बड़ी बाधा है प्रो. जाट के परिवार को राजी करना। अगर लांबा नसीराबाद विधानसभा सीट के लिए राजी हो भी गए तो संघ वाले आड़े आ जाएंगे।
जहां तक स्थानीय नेताओं का सवाल है तो उनकी चौधरी से कभी ट्यूनिंग नहीं रही। होती भी कैसे? वे शुरू से कांग्रेसी रहे। समझा जाता है कि स्थानीय लॉबिंग देहात जिला भाजपा अध्यक्ष प्रो. बी पी सारस्वत के पक्ष में हो रही है। वे वसुंधरा की पसंद भी हैं, मगर उन्हें टिकट दिए जाने पर जाट समाज भाजपा को पटखनी खिला सकता है। दावा अजमेर से पांच बार सांसद रहे प्रो. रासासिंह रावत भी ठोक चुके हैं, मगर उन्हें तो अजमेर से रुखसत किया ही इसलिए गया था कि रावत बहुल मगरा इलाका अजमेर संसदीय क्षेत्र से बाहर हो गया था। बताते हैं कि अजमेर नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष धर्मेश जैन ने तो यह कह कर टिकट मांगा है कि वे जीतने पर सांसद के नाते मिलने वाले वेतन-भत्ते नहीं लेंगे, मगर भाजपा गैर जाट के रूप में किसी जैन पर दाव खेलेगी, इसमें तनिक संदेह है।
वैसे अपना मानना है कि ये जितने भी नाम हैं, इन पर विराम तभी लग जाएगा, जब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट का नाम फाइनल होगा। उनसे भिड़ाने के लिए भाजपा को बाहर से दावेदार लाना होगा, जैसे पहले किरण माहेश्वरी को लाया गया था। बाहर से आने वालों में सतीश पूनिया व रामपाल जाट का नाम चर्चा में है।
जैसे ईश्वर के बारे व्याख्या करते करते वेद भी आखिर में नेति नेति कह मौन हो जाते हैं, ठीक वैसे ही राजनीति के बारे में भी चर्चा करते हुए आखिर में नेति नेति ही कहना उपयुक्त होगा, क्यों कि राजनीति के ऊंट किस करवट बैठेगा है, इसकी भविष्यवाणी दुनिया का बड़ा से बड़ा ज्योतिषी नहीं कर सकता।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

रविवार, 8 अक्तूबर 2017

राजनीतिक मकसद साधने को बढ़ाया हेड़ा का कद

अब जब कि लोकसभा उपचुनाव की सरगरमी शुरू हो गई है, ऐन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के अजमेर दौरे के साथ अजमेर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष शिव शंकर हेड़ा को राज्य मंत्री का दर्जा देने से साफ है कि इसका मकसद मात्र राजनीतिक लक्ष्य साधना ही है।
हो सकता है कि अजमेर विकास प्राधिकरण व जोधुपर विकास प्राधिकरण के अध्यक्षों के अधिकार बढ़ाने पर काफी समय से विचार चल रहा हो, मगर जिस प्रकार प्राधिकरणों को संचालित करने वाले अधिनियम में संशोधन किए बगैर राज्य मंत्री का दर्जा दिया गया है, वह साबित करता है कि यह आनन फानन में किया गया है। अधिनियम में अध्यक्ष की हैसियत से अहम फैसले लेने का क्षेत्राधिकार अब भी इन्हें नहीं मिला है। अर्थात राज्य मंत्री का दर्जा एक तमगे से अधिक कुछ नहीं है। उसके लिए अधिनियम में बाकायदा संशोधन करना होगा। चूंकि सरकार इस बाबत ठीक से विचार नहीं कर पाई थी, इस कारण फिलहाल राज्य मंत्री का दर्जा देने की घोषणा कर दी गई, ताकि उपचुनाव में लाभ हासिल किया जा सके।
असल में सरकार ने लोकसभा चुनाव में वैश्य समाज को और अधिक संतुष्ट करने के लिए ही हेड़ा का कद बढ़ाया है। सरकार जानती है कि जीएसटी लागू होने के बाद वैश्य समुदाय, जो कि आम तौर पर व्यापार से जुड़ा हुआ है, उसमें काफी नाराजगी है। आपको ख्याल होगा कि पिछले साल 21 जनवरी को जब हेड़ा को अध्यक्ष बनाया गया था तो यह पूरी तरह से साफ था कि उनकी ताजपोशी केवल इस कारण संभव हो पाई, क्योंकि भाजपा अपने वोट बैंक वैश्य समाज को तुष्ट करना चाहती थी, जबकि राजनीतिक रूप से हेड़ा भूली बिसरी चीज हो चुके थे। राजनीतिक हलकों में उनकी नियुक्ति को लेकर आश्चर्य भी जताया गया था। ज्ञातव्य है कि जिले की एक भी विधानसभा सीट पर वैश्य समुदाय का व्यक्ति काबिज नहीं है, इस कारण इस समुदाय में नाराजगी रहती है। वे यह शिकायत करते रहे हैं कि वे भाजपा को तन-मन-धन से पूरा सहयोग करते हैं, मगर उसके अनुरूप राजनीतिक लाभ नहीं मिला है।
खैर, हेड़ा को एडीए का अध्यक्ष बनाए जाने से शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी व महिला व बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल के बाद सत्ता का एक और केन्द्र विकसित हो गया। जैसे ही हेड़ा अध्यक्ष बने, उन्होंने इस पद के दम पर धरातलीय राजनीतिक ताकत बढ़ाना शुरू कर दिया। यहां तक कि वे गैर सिंधीवाद के नाम पर अजमेर उत्तर विधानसभा सीट के दावेदार भी बन गए हैं। सच बात तो ये है कि उन्होंने दोवदारी मजबूत करने की दिशा में काम भी करना शुरू कर दिया है। अब उनके इर्द गिर्द भी समर्थकों को हुजूम रहता है। इसका नतीजा ये है कि देवनानी व हेड़ा के बीच टकराव आरंभ हो गया है। ये टकराव बाकायदा स्वायत्त शासन मंत्री श्रीचंद कृपलानी तक भी पहुंचा है। देवनानी ने तो कृपलानी से शिकायत भी की कि हेड़ा उनके अनुशंषित कामों में रोड़ा अटकाते हैं। एलीवेटेड रोड को लेकर दोनों के बीच मतभेद खुल कर सामने आ चुके हैं। हेड़ा का दबाव रहता है कि विधायक कोटे के तहत एडीए के माध्यम से कराए जाने वाले कामों के उद्घाटन समारोहों में उन्हें भी अतिथि के तौर पर बुलाया जाए।
बहरहाल, भले ही अधिनियम में संशोधन के बिना हेड़ा का कद बढ़ाया गया है, वे और अधिक मजबूत हो गए हैं। इससे भले ही टिकट को लेकर खींचतान बढ़े, मगर भाजपा को वैश्य समुदाय का लाभ तो मिल ही सकता है। हेड़ा को राज्य मंत्री का दर्जा देते ही जिस प्रकार अजमेर जिला वैश्य सम्मेलन और श्री माहेश्वरी प्रगति संस्थान के कार्यकर्ताओं ने उनका बढ़ चढ़ कर स्वागत किया, वह यह समझने के लिए काफी है कि सरकार का निशाना ठीक लक्ष्य पर पड़ा है।
हालांकि भाजपा की ओर से गैर सिंधी प्रत्याशी का प्रयोग लगभग असंभव प्रतीत होता है, मगर हेड़ा का कद बढ़ाने से वह यह कहने की स्थिति में तो होगी कि उसने सिंधियों के साथ वैश्यों के राजनीतिक हितों का भी ध्यान रखा है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000