शनिवार, 24 जून 2017

किशनगढ़ एयरपोर्ट की वाहवाही लूटते हैं तो खैर-खबर भी लें

जिस किशनगढ़ एयरपोर्ट को स्थापित करने की आरंभिक सारी कवायद पूर्व केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट ने की, उसका श्रेय स्थानीय भाजपा नेता ले तो रहे हैं, चूंकि आज केन्द्र व राज्य में भाजपा की सरकार है, मगर वे इसके लिए कितने प्रयासरत हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लग रहा है कि जुलाई से ट्रायल उड़ानें और अगस्त में शिड्यूल फ्लाइट्स शुरू होने को लेकर आशंकाएं जताई जा रही हैं।
भास्कर के तेजतर्रार रिपोर्टर अतुल सिंह की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक अब तक न तो गृह मंत्रालय से एनओसी मिला और न ही डायरेक्ट्रेट जनरल सिविल एविएशन (डीजीसीए) से लाइसेंस। ऐसे में एयरपोर्ट का संचालन शुरू होने पर सवाल उठने ही हैं। इसका सीधा सा अर्थ है कि केन्द्र में अजमेर का प्रतिनिधित्व करने वाले इस ओर ध्यान ही नहीं दे रहे। जो कुछ हो रहा है, वह ब्यूरोक्रेट लेवल पर है।
जहां तक इस एयरपोर्ट में राज्य सरकार की भूमिका का सवाल है, बिजली, पानी और हाई-वे से रोड कनेक्टिविटी के काम भी कछुआ चाल से चल रहे हैं। क्या इसका यह अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए कि राज्य सरकार का हिस्सा बने अजमेर के भाजपाई जनप्रतिनिधि इन कामों को समय पर पूरा करवाने के लिए कोई निगरानी नहीं कर रहे। ऐसे में यह कहते हुए अफसोस ही होता है कि मात्र वाहवाही लेने के लिए संसदीय सचिव सुरेश रावत व किशनगढ़ के भाजपा विधायक भागीरथ चौधरी दिल्ली से यहां आए निजी कंपनी के चार्टर प्लेन को बाकायदा हरी झंडी दिखाने पहुंच जाते हैं। कैसी विडंबना है कि जिस एयरपोर्ट का औपचारिक व विधिवत शुभारंभ हुआ नहीं है, वहां एक प्राइवेट कंपनी का ट्रायल चार्टर प्लेन आने पर ऐसा माहौल बना दिया जाता है, मानो हवाई अड्डों की दुनिया में अजमेर भी शुमार हो गया है। जबकि हकीकत ये है कि इससे पहले भी चार्टर प्लेन लैंड कर चुके थे। बेशक, आज जब भाजपा की सरकार है तो शाबाशी भी वे ही लूटेंगे, मगर वहां पर रावत का बड़े अधिकारापूर्वक यह कहना कि किशनगढ़ एयरपोर्ट को जो सपना देखा था, वह आज पूरा हो गया, जल्द ही एयरपोर्ट से नियमित विमान सेवाएं शुरू होगीं, तो ऐसा प्रतीत होता है, मानो वे इसकी मॉनिटरिंग कर रहे हैं। और वाकई कर रहे हैं तो ऐसी स्थिति क्यों बनती है कि जुलाई से ट्रायल उड़ानें और अगस्त में शिड्यूल फ्लाइट्स शुरू होने को लेकर मीडिया सवाल खड़े करता है। मीडिया सवाल खड़े करे न करे, धरातल का सच भी यही है कि निर्धारित शिड्यूल से काम नहीं हो रहा। ऐसे में क्या स्थानीय भाजपाई जनप्रतिनिधियों, जिनमें राज्य किसान आयोग के अध्यक्ष प्रो. सांवरलाल जाट, राजस्थान पुरा धरोहर संरक्षण प्राधिकरण के अध्यक्ष औंकार सिंह लखावत, शिक्षा राज्यमंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी, महिला व बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल, संसदीय सचिव शत्रुघ्न आदि शुमार हैं, का यह दायित्व नहीं बनता कि वे अजमेर की इस महत्वाकांक्षी योजना को गंभीरता से लें। अगर क्रेडिट लेने का हक आपका है तो उसको समय पर पूरा करने की जिम्मेदारी भी आप पर ही आयद होती है।
अजमेर के हितों के लिए वर्षों से संघर्षरत सिटीजंस कौंसिल के अध्यक्ष व दैनिक नवज्योति के प्रधान संपादक दीनबंधु चौधरी ने एक बार व्यक्तिगत चर्चा में बताया था कि अजमेर दर्द यही है कि जनप्रतिनिधि न तो अजमेर से संबंधित योजनाओं की पूरी स्टडी करते हैं और न ही फॉलोअप। इसी वजह से अजमेर का विकास धीमी गति से हो रहा है।
इसी संदर्भ में अगर स्मार्ट सिटी अजमेर की बात करें तो जब पहली बार अजमेर के नाम की घोषणा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने की थी, तब भाजपा नेता वाहवाही लेने तो आगे आ गए, मगर उन्हें यह पता तक न था कि अजमेर का चयन किस प्रक्रिया के तहत हुआ। उन्हें यह जानकारी भी ठीक नहीं थी इसके तहत आखिर होगा क्या? तत्कालीन संभागीय आयुक्त ने भी खूब बेवकूफ बनाया। यदि मौजूदा जिला कलैक्टर गौरव गोयल इसमें व्यक्तिगत रुचि न लेते तो अजमेर का नाम सूची में अब तक भी नहीं आ पाता। इससे समझा जा सकता है कि अजमेर का पानी कैसे लाडलों का जन्म देता है।
-तेजवानी गिरधर
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गुरुवार, 22 जून 2017

देवनानी का अनिता के कार्यक्रम में जाना भी है एक खबर

कहते हैं न कि यदि कुत्ता आदमी को काट खाए तो कोई खबर नहीं बनती, मगर यदि आदमी कुत्ते को काट खाए तो वह खबर हो हो जाती है।  आपने ये भी देखा होगा कि अगर कोई किसी के साथ बेईमानी करे तो उसकी खबर मात्र इस कारण छपती है, क्योंकि एक घटना हुई है, लेकिन उस पर कोई खास गौर नहीं करता क्योंकि बेईमानी आम बात है, मगर यदि कोई किसी के खोए हुए रुपए या वस्तु ला कर उसके मालिक को दे तो ईमानदारी जिंदा है के शीर्षक से बॉक्स में खबर लगती है। कुछ ऐसा ही शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी व महिला व बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल को लेकर है। वे एक दूसरे के कार्यक्रम में नहीं जाएं तो चंद लाइनें छप जाती हैं, क्योंकि यह आम बात है, सब जानते हैं कि दोनों के बीच छत्तीस का आंकड़ा है, मगर यदि एक दूसरे के कार्यक्रम में पहुंच जाए तो वह बड़ी खबर हो जाती है, क्योंकि वह चौंकाने वाली है।
बीते दिन कुछ ऐसा ही हुआ। शिक्षा राज्यमंत्री वासुदेव देवनानी व महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री अनिता भदेल दोनों एक भवन के लोकार्पण समारोह में साथ-साथ दिखाई दिए तो वह खबर मीडिया ने तुरंत हॉट केक की तरह उठा ली। असल में घटना इसलिए भी खास थी क्योंकि कार्यक्रम महिला एवं बाल विकास विभाग का था, जिसकी मंत्री खुद अनिता भदेल हैं। इसे श्रीमती भदेल की उदारता माना जाए या कुछ और, मगर यह कम बात नहीं कि लोकार्पण पट्टिका पर भी अनिता भदेल व वासुदेव देवनानी का नाम बराबर में लिखा था। एक टाइम वो भी था, जब दोनों में इस बात को लेकर खींचतान होती थी कि ऊपर किसका नाम आए और नीचे किस का। अधिकारियों को बड़ी मुश्किल होती थी।
खबर की बारीक बात ये है कि देवनानी कोई अनिता के खुद के आमंत्रण पर नहीं गए थे। अनिता ने तो महिला एवं बाल विकास विभाग की उप निदेशक अनुपमा टेलर को कहा था कि देवनानी को भी बुलावा भेजा जाए। एक अधिकारी मात्र के बुलावे पर उनका अनिता के कार्यक्रम में जाना वाकई चौंकाने वाला है। स्वाभाविक रूप से राजनीतिक हलकों में इस बात पर अचरज जताया जा रहा है कि देवनानी यकायक इतना कैसे बदल गए?  क्या कहीं से इशारा था?
इस कार्यक्रम में देवनानी के करीबी माने जाने वाले मेयर धर्मेंद्र गहलोत का भदेल द्वारा लगाए गए शिविर की जमकर तारीफ करना भी चौंकाने वाला माना गया। वैसे किसी के मुंह पर उसकी तारीफ करना एक सामान्य शिष्टाचार वाली बात है।
बहरहाल, इस वाकये जुड़ा एक दिलचस्प पहलु देखिए। देवनानी खुद भले ही अनिता के जुड़े किसी कार्यक्रम में चले जाएं, मगर देवनानी खेमे के नेता, पार्षद आदि ऐसा करने से पहले दस बार सोचते हैं। सोचते क्या, जाते ही नहीं हैं, क्योंकि देवनानी की नाराजगी का डर रहता है। देवनानी भी क्लास लिए बिना नहीं मानते। ठीक ऐसी ही स्थिति अनिता खेमे के नेताओं की है। ताजा कार्यक्रम में भी ऐसा ही हुआ। उपमहापौर संपत सांखला ने औपचारिकता के नाते देवनानी खेमे के नेताओं से भी कार्यक्रम में आने को कहा था, मगर कई इसी कारण नहीं गए कि बाद में देवनानी को पता लगा तो वे खिंचाई कर देंगे। बाद में उन्हें पता लगा तो यही सोचने लगे समरथ को नहीं दोष गुसाईं।
-तेजवानी गिरधर
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मंगलवार, 20 जून 2017

यातायात विभाग में दलालों का बोलबाला?

न जाने कितनी बार यह तय हुआ है कि यातायात विभाग के दफ्तर में जा कर कर्मचारियों से दलाल सीधे नहीं मिलेंगे, मगर आज भी हालत ये है कि वहां दलालों का ही बोलबाला है। आम आदमी तो निर्धारित खिड़कियों पर लाइन लगा कर धक्के खाता है, जबकि दलाल सीधे अंदर जा कर संबंधित कर्मचारियों से काम करवाते हैं।
असल में जो लोग दलालों की बजाय खुद ही वहां काम करवाने जाते हैं, उन्हें कर्मचारी धक्के खिलवाते हैं। सच बात तो ये है कि उनसे सीधे मुंह बात ही नहीं की जाती। चाहे लाइसेंंस बनवाना हो या रिन्यू करवाना हो, या फिर कोई और काम हो, आम आदमी को दलाल से ही संपर्क करने की राय दी जाती है। अगर कोई कहता है कि वह दलाल के पास नहीं जाएगा तो उसे कम से कम तीन-चार चक्कर लगवाए जाते हैं। शहर से दूर होने के कारण आम लोगों को इतने चक्कर लगाने पर बहुत परेशानी होती है, इस कारण तंग आ कर लोग दलालों के पास ही जाते हैं। दलाल अपने मन मुताबिक कमीशन लेते हैं। ऐसा इस कारण भी होता है कि निर्धारित फार्म भरना आम आदमी के बस की बात नहीं होती। उसे यह भी पता नहीं होता कि किसी काम के लिए कौन कौन से दस्तावेज साथ अटैच करने होते हैं। कर्मचारी उसे बताते नहीं और दलाल के पास ही जाने की सलाह देते हैं। हालत ये है कि निर्धारित फार्म भी महकमा उपलब्ध नहीं करवाता, वे बाहर दलालों के पास ही मन मुताबिक रेट पर मिलते हैं। जबकि होना यह चाहिए कि दफ्तर में ही फार्म आदि मिलें और ऐसे कर्मचारियों को बैठाया जाए, जो वे आम आदमी का मार्गदर्शन करें, ताकि उसे दलाल के पास जाने की जरूरत ही नहीं रहे। मगर ऐसा महकमा क्यों करने वाला है? यदि दलाल नहीं कमाएंगे तो कर्मचारियों का भरण पोषण कैसे होगा?
इस मुद्दे पर न जाने कितनी बार मीडिया में खबरें आ चुकी हैं। कई बार जयपुर के बड़े अधिकारियों की मौजूदगी में तय हो चुका है कि दलाल प्रथा को हतोत्साहित किया जाए और दलालों का दफ्तर में प्रवेश वर्जित हो। कुछ दिन तो इस पर अमल होता है, मगर बाद में फिर वही ढर्ऱा शुरू हो जाता है। ऐसा नहीं है कि यहां बैठे अफसरों का इस सिस्टम के बारे में जानकारी नहीं, मगर वे चुप्पी साधे बैठे हैं।
यातायात महकमे के अफसर कितने लाचार हैं, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट बनाने वाली एजेंसी निर्धारित शुल्क से कई गुना अधिक वसूल रही है। अनेकानेक शिकायतें हो चुकी हैं, शिकायतों की पुष्टि भी हो कर जयपुर प्रेषित की जा चुकी है, कई बार मंत्री महोदय की जानकारी में लाया जा चुका है, मगर आज तक लूट जारी है। जब स्थानीय अधिकारियों से पूछा जाता है तो वे यही कहते हैं कि वे तो रिपोर्ट बना कर ऊपर भेज चुके हैं, वहीं से कार्यवाही होगी, हम कुछ नहीं कर सकते।
कुल मिला कर अजमेर के यातायात महकमे से आम आदमी बेहद त्रस्त है, मगर उसका समाधान न तो आज तक निकल पाया है और न ही कोई उम्मीद लगती है।
-तेजवानी गिरधर
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सोमवार, 19 जून 2017

अब क्यों नौटंकी कर रही है यातायात पुलिस?

अजमेर में यातायात पुलिस का ढर्ऱा अरसे से बिगड़ा हुआ है। न तो किसी पुलिस अधीक्षक ने इस पर ध्यान दिया और न ही जनप्रतिनिधियों ने पुलिस प्रशासन पर दबाव बनाया। जब-जब भी कोई हादसा होता है तो पुलिस यकायक मुस्तैद होने का नाटक करती है, मगर चंद दिन बाद फिर वही पहले वाला ढर्ऱा शुरू हो जाता है।
भाजपा पार्षद अनीश मोयल के पुत्र सर्वज्ञ की ट्रैक्टर से कुचलने से हुई मौत के बाद जिला पुलिस ने ट्रैक्टर चालकों के खिलाफ सख्ती बरतना शुरू कर दिया। एक ही दिन में 9 ट्रैक्टर चालकों के खिलाफ यातायात पुलिस ने कार्रवाई की, इनमें से 6 को जब्त किया गया, शेष 3 के खिलाफ नो पार्किंग का चालान बनाया गया। सख्ती का सिलसिला कुछ दिन और चल सकता है। मगर सवाल ये उठता है कि पुलिस हादसा होने के बाद ही क्यों चेतती है? ऐसा नहीं है कि यातायात पुलिस कोसे जाने लायक है, इस कारण कोसी जाती है, हकीकत भी यही है। पूरे शहर में कहीं भी चले जाइये, हर जगह आपको ओवर लोडेड वाहन मिल जाएंगे। ऑटो रिक्शाओं में निर्धारित संख्या से ज्यादा बच्चे मिलते हैं। सिटी बसों में यात्री भेड़-बकरियों की तरह भरे जाते हैं। सिटी बस व टैम्पो वाले अंटशंट स्पीड से चलते हैं। ट्रैक्टर भी निर्धारित गति से ज्यादा स्पीड से चलाए जाते है, जिसकी वजह से ताजा दर्दनाक हादसा हुआ। हर मुख्य चौराहे पर यातायात पुलिस के कर्मचारी तैनात तो होते हैं, मगर वे कितने मुस्तैद होते हैं, इसको बताने की जरूरत इसलिए नहीं है कि पूरे शहर का यातायात अस्त व्यस्त है। अगर वे वाकई कार्यवाही करते तो ये हालात नहीं होते। अर्थात दाल में कुछ काला है। सबको दिख रहा है कि क्या माजरा है, मगर किसी को कोई लेना-देना नहीं। न पुलिस अधिकारियों को और न ही जनप्रतिनिधियों को। ऐसे में अगर आप उम्मीद करें कि यातायात सुव्यवस्थित रहेगा तो वह बेमानी है।
आपको याद होगा कि पूर्व में भी जब किसी ओवर लोडेड ऑटो रिक्शा के पलटने से स्कूल बच्चे चोटिल हुए हैं तो प्रशासन यकायक मुस्तैद हो जाता है। यातायात समिति की बैठकें होती हैं। नए सिरे से निर्देश जारी होते हैं, मगर नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात वाला नजर आता है।
इस बार भी जब हादसे के बाद प्रिंट, इलैक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया ने पुलिस पर तंज कसे तो पुलिस अधीक्षक राजेन्द्र सिंह ने मुस्तैदी दिखाई। यह स्थिति भी इस कारण आई कि हादसे का शिकार एक भाजपा पार्षद का मासूम पुत्र हुआ था। अगर आम बच्चा होता तो इतनी चर्चा ही नहीं होती।
कितनी अफसोसनाक बात है कि हादसे के बाद पुलिस अधीक्षक कह रहे हैं कि यातायात थाना पुलिस ट्रैक्टरों के बेकाबू रफ्तार पर लगाम लगाने के लिए विशेष अभियान शुरू कर रही है। तेज रफ्तार से ट्रैक्टर दौड़ाने वाले, शराब पीकर ट्रैक्टर चलाने वाले, ओवर लोडिंग के अलावा प्राइवेट लाइसेंस पर ट्रैक्टर का कॉमर्शियल इस्तेमाल करने वाले चालकों के खिलाफ पुलिस सख्ती से पेश आएगी। पुलिस के इंटरसेप्टर वाहन मुस्तैदी से तैनात हैं, तेज रफ्तार से वाहन दौड़ाने वालों पर शिकंजा कसेगा। यह सब हादसे से पहले क्यों नहीं होता?
-तेजवानी गिरधर
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शनिवार, 17 जून 2017

ऐसे शिविरों को रोक क्यों नहीं दिया जाता?

पिछले कितने दिनों से मीडिया में लगातार यह खबर सुर्खी में है कि मुख्यमंत्री शहरी जन कल्याण शिविर नाकामयाब हैं, मगर प्रशासन तो लकीर के फकीर की तरह कवायद किए जा रहा है और सरकार भी है कि ऐसे शिविरों को निरंतर जारी रखे हुए हैं, मानों डाक्टर ने कहा हो या किसी पंडित ने सलाह दी हो।
कितने अफसोस की बात है कि मीडिया यह तथ्य लिख लिख कर नहीं  थक रहा कि मुख्यमंत्री शहरी जन कल्याण शिविर पूरी तरह से फ्लॉप शो साबित हो रहे हैं, आम जनता भी इस खबर को पढ़ पढ़ का ऊब गई है, मगर सरकार व प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही।
असल में इन शिविरों की नामकामयाबी की मुख्य वजह कच्ची बस्ती में पट्टे नहीं दिए जाने और सरकारी भूमि का नियमन नहीं होना है। खुद सरकार ही इस मामले में असमंजस में रही। पहले कच्ची बस्ती पट्टे एवं सरकारी भूमि पर नियमन की बात कही गई, लेकिन जैसे ही शिविर शुरू हुए सरकार ने दोनों अहम मुद्दे हटा लिए। नतीजा ये रहा कि आम आदमी की रुचि इन शिविरों में समाप्त हो गई। असल में ऐसे शिविरों को इंतजार इसीलिए रहता है कि इनमें पट्टे व नियमन इनमें आसानी से हो जाते हैं। सबको पता है कि पट्टे जारी करने व नियमन के मामले इतने कॉम्प्लीकेटेड होते हैं कि फाइलों को एक सीट से दूसरी सीट तक खिसकने में कछुआ चाल की याद आ जाती है। लोगों की जूतियां दफ्तर के चक्कर लगाते लगाते घिस जाती हैं।  बरसों लग जाते हैं। शिविर में चूंकि संबंधित सभी अफसर व कर्मचारी मौजूद होते हैं और उन्हें पता होता है कि उन्हें यही काम करना है, इस कारण वहां ऐसे मामले निपट जाते हैं। बाकी के काम तो रुटीन में चलते ही हैं। उनके लिए शिविर की जरूरत ही नहीं होती। मगर सरकार को ये बात समझ में ही नहीं आई।
हालत ये है दिनभर अधिकारी एवं कर्मचारी लोगों के इंतजार में बैठे नजर आते हैं। जो कार्य आम दिनों में दफ्तरों में संपादित होते हैं, वही कार्य शिविर में हो रहे हैं, जिनमें से प्रमुख रूप से जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, विवाह पंजीयन, भामाशाह कार्ड वितरण, एसबीएम के तहत व्यक्तिगत शौचालयों के लिए राशि का वितरण आदि हैं। शिविरों में आवक न होने की खबरें लगातार आ रही हैं, मगर प्रशासन व सरकार ढर्रे पर ही चल रहे हैं। अनुमान लगाइये कि जिन शिविरों से कोई लाभ नहीं हो रहा, उन पर टेंट, कुर्सियां, कूलर व अन्य इंतजामात पर कितना खर्च हो रहा है। इसके अतिरिक्त जो कर्मचारी दफ्तर में कुछ काम भी कर लेता, वह शिविर में आ कर निठल्ला बैठा है। इसका कितना नुकसान हो रहा है, इसको देखने वाला कोई नहीं है। ऐसा हो सकता है कि शिविर समापन पर प्रशासन व सरकार ऐसे आंकड़े देने की कोशिश करें कि देखो शिविर कितने कामयाब रहे, मगर जब बारीकी से देखा जाएगा तो यही सामने आएगा कि आम जन के वे काम ही हो पाए हैं, जो कि आम दिनों में आसानी से होते हैं। उनके लिए शिविर की जरूरत ही नहीं थी।
सबसे अफसोसनाक बात ये है कि सरकार को यह परवाह भी नहीं कि उसकी भद पिट रही है। उसकी छवि खराब हो रही है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आम जनता का भरोसा सरकार पर रह ही नहीं गया। मगर नीति निर्धारक हैं कि उनकी नींद ही नहीं खुल रही। कदाचित ऐसी स्थिति को ही किसी जमाने में पोपा बाई का राज की उपमा दी गई होगी, जो कि कहावत बन गई।
-तेजवानी गिरधर
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शुक्रवार, 16 जून 2017

भाजपा मानसिकता के व्यापारी अब कोस रहे हैं सरकार को

जीएसटी का विरोध बढ़ता ही जा रहा है। व्यापारी त्रस्त है। अब तो भाजपा मानसिकता के व्यापारी भी सरकार की इस नीति के खिलाफ खुसरफुसर कर रहे हैं। कुछ व्यापारी तो खुल कर विरोध प्रदर्शन भी कर रहे हैं। गत दिवस राजस्थान कपड़ा व्यापार महासंघ जी.एस.टी. संघर्ष समिति के आह्वान पर अजमेर वस्त्र व्यापारिक संघ के सभी कपड़ा व्यापारी सदस्यों ने अपने व्यापारिक प्रतिष्ठानों को बन्द करके कपड़े पर जी.एस.टी 5 प्रतिशत लगाने के विरोध में हड़ताल कर प्रदर्शन किया। इसमें अधिसंख्य भाजपा मानसिकता के व्यापारी थे। उन्होंने चेताया कि आगामी 26 जून तक यदि भारत सरकार ने कपड़े से जी.एस.टी. नहीं हटाया तो कपड़ा व्यवसायी अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले जायेंगे। समझा जा सकता है उनका दर्द कितना गहरा है।
ज्ञातव्य है कि आमतौर पर व्यापारी वर्ग भाजपा मानसिकता का माना जाता है। अब जब कि केन्द्र में भाजपा की सरकार है तो उन्हें इस बात का मलाल है कि आजादी के बाद 70 वर्ष में किसी भी सरकार ने कपड़े पर कोई भी टैक्स नहीं लगाया, जबकि मौजूदा सरकार इस पर आमादा है।
संघ की ओर से जारी विज्ञप्ति से ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इस हड़ताल में किस प्रकार भाजपा मानसिकता के व्यापारियों ने हिस्सा लिया। जरा उन नामों पर गौर कर लीजिए:- मुख्य कार्यकारिणी अध्यक्ष सुरेशचन्द गुप्ता, सचिव प्रवीनचन्द जैन, भगवान चन्दीराम, मुकेश सेठी, राजकुमार गर्ग, अशोक राठी, मुकेश गोयल, कमलेश शर्मा, सुन्दर भाई, किशन गोपाल गुप्ता, कैलाश अग्रवाल, शिवशंकर बाड़मेरा, रमेश शर्मा, मुकेश जैन, सुनिल गदिया, ललित अग्रवाल, किशोर सतरानी, दुर्गेष सन्तूमल, परमानन्द, सन्देश मॉयल साडी। कम से कम व्यापारी वर्ग तो जानता है कि इनमें कितने भाजपा मानसिकता के हैं।
ज्ञातव्य है कि इससे पहले नमकीन व्यापारियों ने विरोध जताया था, जिनमें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अजमेर महानगर प्रमुख सुनील दत्त जैन आगे की पंक्ति में खड़े थे।
इसी प्रकार अन्य वस्तुओं का व्यापार करने वाले भी कसमसा रहे हैं। आपसी बातचीत में वे केन्द्र सरकार को कोस रहे हैं। उन्हें इस बात का ज्यादा अफसोस है कि जब केन्द्र में कांग्रेस सरकार जीएसटी को लाना चाहती थी, तब भाजपा ने उनकी पैरवी करते हुए इसका विरोध किया था और जब भाजपा सत्ता में है तो इसे लागू करने पर अड़ी हुई है।
जाहिर सी बात है कि आज जब भाजपा मानसिकता के व्यापारी परेशान हैं तो कांग्रेसी मानसिकता के लोग इस मुद्दे को हाथोंहाथ लपक रहे हैं। राष्ट्रीय सोनिया गांधी ब्रिगेड कांग्रेस अजमेर के शहर अध्यक्ष राजकुमार गर्ग, राजस्थान प्रदेश यूथ फेडरेशन के प्रदेश संयोजक कमल गंगवाल, सीए प्रकोष्ठ के अध्यक्ष विकास अग्रवाल एवं पूर्व विधि प्रकोष्ठ अध्यक्ष एडवोकेट विवेक पाराशर और वरिष्ठ कांग्रेस नेता शिव बंसल, नीरु दोसाई, असलम खान, सीताराम सांखला, सुनीता सांखला, विभूति जैन, जीनत बानो, विनीता अग्रवाल, शांति लश्कार, आशा कच्छावा, अनुपम शर्मा, अरुणा कच्छावा, राजेश जैसवाल, नीरु गर्ग, अभिलाषा विश्नोई ने तो बाकायदा संयुक्त विज्ञप्ति जारी कर कपड़े पर प्रस्तावित टैक्स से मुक्त किये जाने की मांग को लेकर चल रहे विरोध का समर्थन कर दिया। विरोध के यज्ञ में आहुति देते हुए उन्होंने कहा कि व्यापारी वर्ग नोटबन्दी की वजह से परेशान है, व्यापार ठप्प पड़ा हुआ है, नोटबन्दी के बाद बाजार में अभी तब उठाव आया ही नहीं था कि सरकार जीएसटी जैसा जटिल टैक्स लागू कर रही है, जिसने व्यापारियों की कमर ही तोड़ दी है।
अब देखने वाली बात ये है कि क्या सरकार देशहित का ख्याल रखती है या फिर वोट बैंक खिसकने के डर से पैर पीछे खींचती है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

सोमवार, 12 जून 2017

अब योग के जरिए जमीन पर पकड़ मजबूत करेंगे देवनानी

जैसे महिला व बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल अपने अजमेर दक्षिण विधानसभा क्षेत्र में क्रिकेट प्रतियोगिता करके जमीन पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कवायद कर चुकी हैं, ठीक उसी तरह अब शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी भी अजमेर उत्तर में योग शिविर लगा कर कार्यकर्ताओं को लामबंद करने जा रहे हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जन्मशती समारोह के तहत उत्तर विधानसभा क्षेत्र के प्रत्येक वार्ड में दस दिवसीय योग शिविर आगामी 14 से 23 जून तक आयोजित किए जाएंगे। यह शिविर सुबह 5.30 बजे से 7 बजे तक होंगे।
बकौल देवनानी आज संपूर्ण विश्व योग के महत्व को जानने लगा है तथा इसकी विरासत को आमजन तक पहुंचाने के उद्देश्य से यह शिविर आयोजित होंगे, मगर इसे यदि राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो यह आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारी पूर्वाभ्यास है। इससे जहां कार्यकर्ता मोबलाइज होगा, वहीं आम जनता में भी पकड़ बनेगी। शिविर की कामयाबी सुनिश्चित ही समझी जानी चाहिए, क्योंकि अजमेर नगर निगम मेयर धर्मेन्द्र गहलोत खुद इसके संयोजक हैं। रहा सवाल सह संयोजक सुभाष काबरा व सोमरत्न आर्य का तो स्पष्ट है कि उनका उपयोग मैनेजमेंट के लिए किया जा रहा है।  आम जन तक योग और देवनानी की पहुंच बनाने का गणित भी बनाया गया है, जिसके तहत आयोजन समिति में पार्षदों सहित 31 व्यक्तियों को शामिल गया गया है और योग शिविरों के जरिए लगभग 3000 लोगों को जोड़ा जाएगा।
यहां गौरतलब बात ये है कि इस बार शहर भाजपा अध्यक्ष अरविंद यादव को आपत्ति नहीं होगी, जैसी कि उनको अनिता भदेल के मात्र अजमेर दक्षिण में क्रिकेट प्रतियोगिता करने पर हुई थी। स्वाभाविक भी है, जब अनिता केवल अपने इलाके में क्रिकेट प्रतियोगिता करवाती हैं तो देवनानी ने भी अगर केवल अजमेर उत्तर में योग शिविर का आयोजन किया है तो उस पर आपत्ति क्यों होनी चाहिए? लेकिन इससे एक संदेश जरूर जाता है कि भाजपा अजमेर उत्तर व अजमेर दक्षिण में बंटी हुई थी, है और रहेगी। उनको कोई एक नहीं कर पाएगा। शायद ऊपर वालों की मंशा भी यही है कि वे आपस में लड़ते रहें। इससे एक फायदा ये होगा कि दोनों अपने-अपने इलाके में बिजी रहेंगे तो कम से कम से एक-दूसरे के इलाके में टांग नहीं फंसा पाएंगे। यह बात दीगर है कि इससे कार्यकर्ता जरूर असमंजस में रहता है और अपनी अपनी सीमा रेखा में रहने को मजबूर होता है, जबकि शहर एक ही है, चुनाव के लिहाज से जरूर बंटा हुआ है, मगर कार्यकर्ता व जनता तो गुंथे हुए ही हैं। किसी का मकान अजमेर उत्तर में और दुकान अजमेर दक्षिण में है तो किसी का मकान दक्षिण व दुकान उत्तर में है। वो भला उत्तर दक्षिण को अलग-अलग करके कैसे देख सकता है?
-तेजवानी गिरधर
7742067000

शनिवार, 10 जून 2017

हासानी होंगे अजमेर उत्तर की टिकट के गंभीर दावेदार

हालांकि आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस में इस वक्त लगभग चुप्पी छायी हुई है, मगर गुपचुप तैयारी तो हर कोई दावेदार कर रहा है। अगर अजमेर उत्तर की बात करें तो यूं तो एकाधिक दावेदार गंभीर रूप से सामने आने वाले हैं, मगर जो सर्वाधिक दमदार दावेदारी करेंगे, उनका नाम है दीपक हासानी। आप जान ही गए होंगे कि ये कौन हैं? माया मंदिर वाले। राजनीतिक गलियारों से छन-छन कर जो जानकारी आ रही है, उसके मुताबिक हासानी टिकट हासिल करने के लिए साम दाम दंड भेद, सभी हथियार आजमाने की स्थिति में हैं।
असल में वे एक अच्छे लाइजनर हैं। न केवल कांग्रेस, अपितु भाजपा के भी बड़े-बड़े नेताओं से उनके संपर्क हैं। प्रदेश के कई बड़े अधिकारियों से भी उनके घनिष्ठ संबंध हैं। बड़े व्यवसायी होने के कारण उनके संबंध अजमेर के प्रमुख व्यापारियों से हैं। जयपुर से लेकर दिल्ली तक उनके लिए जैक लगाने वाले अनेक हैं। इसके अतिरिक्त सबसे बड़ी बात ये है कि वे पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत के खासमखास दोस्त हैं। स्थानीय स्तर पर पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती का उन पर वरदहस्त है। समझा जा सकता है कि अगर उन्होंने तय ही कर लिया कि टिकट लाना है, उनके पास कितनी साधन-संपन्नता है। जानकारी के अनुसार उन्होंने ग्राउंड पर भी चुनावी नजरिये से लोगों से संपर्क बनाना शुरू कर दिया है। फिलवक्त जमीनों संबंधी कुछ मसलों को सुलझाने में लगे हैं, मगर समझा जाता है कि जल्द ही जाजम बिछाएंगे।
ऐसा नहीं कि वे पहली बार दावेदारी कर रहे हैं। इससे पूर्व भी उनकी महत्वाकांक्षा रही है। पिछली कांग्रेस सरकार में तो वे नगर सुधार न्यास का अध्यक्ष बनने के बहुत करीब पहुंच चुके थे।
यूं गैर सिंधियों में शहर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष महेन्द्र सिंह रलावता एक मात्र प्रबल दावेदार हैं, मगर चूंकि इस बार ऐसा माना जाता है कि कांग्रेस किसी सिंधी को ही टिकट देगी, इस कारण यहां केवल सिंधी दावेदारों की चर्चा की जा रही है। अगर अन्य दावेदारों की बात करें तो कर्मचारी नेता व सामाजिक कार्यकर्ता हरीश हिंगोरानी, पूर्व पार्षद रश्मि हिंगोरानी, पूर्व पार्षद सुनील मोतियानी सरीखे भी खम ठोक कर टिकट मांगने वाले हैं। पुराने दावेदार राजस्थान सिंधी अकादमी के पूर्व अध्यक्ष डॉ. लाल थदानी व युवा कांग्रेस नेता नरेश राघानी  भी दावेदारी कर सकते हैं, मगर फिलवक्त कुछ पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वे अपने पत्ते नहीं खोल रहे। इसी प्रकार रेलवे कर्मचारी नेता मोहन चेलानी का नाम भी चलाया जा रहा है। एक नाम बंटी जयसिंघानी का भी बताया जाता है। उनके पास भी टिकट लाने की जुगत बताई जाती है। राज दरबार अगरबती वाले राजकुमार लुधानी भी पिछली बार की तरह ऐन वक्त पर भागदौड़ कर सकते हैं। मॅस्काट स्कूल वाले गुलाब मोतियानी का नाम भी तैर रहा है। ऐसे ही कुछ और नाम भी हो सकते हैं। यानि कि इस बार टिकट के दावेदारों की फेहरिश्त काफी लंबी हो सकती है। कई धनपति भी हाथ आजमा सकते हैं। असल में यह सब इस कारण हो रहा है कि सभी को मैदान खाली लग रहा है। पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष नरेन शहाणी भगत कांग्रेस छोड़ चुके हैं और अभी रिश्वत प्रकरण से जूझ रहे हैं, वरना उनके मुकाबले का दावेदार एक भी नहीं है।
-तेजवानी गिरधर
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शुक्रवार, 9 जून 2017

कुछ खास उत्साह नजर नहीं आया मनोनीत पार्षदों के शपथ ग्रहण में

लंबी प्रतीक्षा के बाद अजमेर नगर निगम में मनोनीत छह पार्षदों के शपथ ग्रहण समारोह में कुछ खास उत्साह नजर नहीं आया। हालांकि शपथ ग्रहण संक्षिप्त और सादा सा था, मगर भाजपा पार्टी कार्यकर्ताओं में जैसा उत्साह नजर आना चाहिए था, वैसा कुछ नजर नहीं आया। कुल जमा डेढ़ सौ से ज्यादा की भीड़ नहीं थी। नारेबाजी भी फीकी ही थी। अधिसंख्य पार्टी पदाधिकारी इस मौके पर मौजूद नहीं थे। कुछ एक पार्षदों के अतिरिक्त मनोनीत पार्षदों के व्यक्तिगत समर्थक ही आए। गिनाने लायक नाम शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी, नगर निगम महापौर धर्मेन्द्र गहलोत, उपमहापौर संपत सांखला, पार्षद नीरज जैन, जे. के. शर्मा, भागीरथ जोशी, जिला महामंत्री रमेश सोनी, जयकिशन पारवानी, महेंद्र जादम, अनीश मोयल, चन्द्रेश सांखला, संदीप गोयल, राजू साहू, महेंद्र जैन मित्तल, धर्मेंद्र शर्मा, रचित कच्छावा, अनिल नरवाल, मोहन ललवानी, रंजन शर्मा, दुर्गाप्रसाद शर्मा, प्रकाश बंसल, अमित यादव आदि महेन्द्र जादम इत्यादि थे। चूंकि महिला व बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल बाहर हैं, इस कारण उनकी अनुपस्थिति रही। देवनानी समय पर आ गए, मगर मनोनीत पार्षद एक-एक करके आए। शहर अध्यक्ष यादव को विलंब हो गया। देवनानी ने उनका इंताजार करने को कहा। उनके आने के बाद मनोनीति पार्षदों को शपथ दिलवाई गई।
असल में मनोनीत पार्षदों में भी कुछ खास खुशी इस कारण भी नहीं थी कि लंबे इंतजार के बाद उनके नामों की घोषणा हुई। नामों की सूची छह माह पहले ही सरकार को भेजी जा चुकी थी। नाम भी फाइनल ही थे, मगर किसी न किसी कारण से घोषणा अटकी हुई थी। अब उनके पास काम करने को तकरीबन डेढ़ साल ही बचा है। अगर विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा सरकार रिपीट हुई तो संभव है उन्हें तीन साल का कार्यकाल पूरा करने का मौका मिल जाए। अगर कांग्रेस सरकार आई तो निर्वाचित निगम बोर्ड तो यथावत रह जाएगा, मगर मनोनीत पार्षदों को हटा दिया जाएगा।
ज्ञातव्य है कि मनोनीत पार्षदों में तीन प्रो. देवनानी व तीन श्रीमती अनिता भदेल की सिफारिश पर नियुक्त हुए हैं। देवनानी खेमे के बलराम हरलानी, सुरेश गोयल व धर्मेन्द्र चौहान और श्रीमती अनिता भदेल की अनुशंसा पर सोहनलाल शर्मा, मोहन राजोरिया व राजेश घाटे को मनोनीत पार्षद बनाया गया है।
यहां बता दें कि शहर की प्रतिष्ठित फर्म दुर्गा ऑयल मिल के प्रोपराइटर बलराम हरलानी कृषि उपज मंडी समिति (अनाज) के उपाध्यक्ष रहे हैं और वर्तमान में डायरेक्टर हैं। वे शहर भाजपा पुरुषार्थी प्रकोष्ठ के अध्यक्ष एवं बैंकिंग प्रकोष्ठ के संयोजक भी रहे हैं। हालांकि अजमेर उत्तर में देवनानी की दावेदारी के रहते अथवा उनके इशारे के बिना कभी अजमेर उत्तर से टिकट की दावेदारी नहीं करेंगे, मगर आने वाले समय के लिए तैयार हो रही खेप के चुनिंदा लोगों में जरूर शामिल हो गए हैं। अजमेर विद्युत वितरण निगम से सेवानिवृत्त सुरेश गोयल भाजपा के मीडिया प्रकोष्ठ संयोजक स्वर्गीय शरद गोयल के पिता हैं। धर्मेंद्र चौहान भाजपा खनन प्रकोष्ठ के संयोजक हैं। इसी प्रकार सोहन लाल शर्मा पूर्व पार्षद रहे हैं और वर्तमान में आदर्श मंडल अध्यक्ष हैं। मोहन राजोरिया और राजेश घाटे शहर भाजपा में जिला मंत्री हैं।
जहां तक जातीय समीकरण का सवाल है अजमेर उत्तर विधानसभा क्षेत्र में सिंधी, बनिया और राजपूत समाज को प्रतिनिधित्व मिला है, जबकि दक्षिण विधानसभा क्षेत्र में ब्राह्मण, कोली और महाराष्ट्रियन राजपूत को मौका मिला है।
-तेजवानी गिरधर
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मंगलवार, 6 जून 2017

पुष्कर घाटी में सुरंग के पीछे क्यों पड़ा है एडीए?

जानकारी के अनुसार पुष्कर घाटी में सुरंग बनाने की योजना के सिलसिले में कंसल्टेंट सेवाओं के लिए अजमेर विकास प्राधिकरण ने एक बार फिर मशक्कत शुरू कर दी है। सुरंग के सर्वे के लिए कंसल्टेंट तय करने के लिए निविदा जारी की गई है। इसके लिए प्री बिड मीटिंग 13 जून को रखी गई है। ऑनलाइन बिड सबमिट करने की तारीख 21 जून तय की गई है और 23 जून को टेक्निकल बिड खोली जाएगी।
यह एक अच्छी बात है कि यात्रियों की सुविधा के लिए प्राधिकरण सजग है, मगर सवाल ये उठता है कि जब बहुत पहले ही यह तथ्य सामने आ चुका है कि इस घाटी में सुरंग बनाना खतरे से खाली नहीं है तो आखिर क्यों इसको बनाने की कवायद की जा रही है?
आपको बता दें कि इस सुरंग की बात पहले भी कोई चौदह साल पहले आई थी। सन् 1990 में तत्कालीन पुष्कर विधायक व भेड़ ऊन राज्यमंत्री रमजान खान ने सुरंग की मांग उठाई थी। इसके बाद 1998 से 2003 तक भी यहां के विधायक रहते उन्होंने फिर दबाव बनाया। भाजपा के वरिष्ठ नेता औंकार सिंह लखावत ने भी भरपूर कोशिश की। इस पर वन विभाग, सार्वजनिक निर्माण विभाग और राजस्व विभाग ने सर्वे किया। सर्वे में नौसर स्थित माता मंदिर से पुष्कर रोड स्थित चमत्कारी बालाजी मंदिर तक के मार्ग का सुरंग बनाने के लिए चयन किया गया। इसमें नौसर से बालाजी के मंदिर तक पहाड़ी को काटते हुए सुरंग बनाने का प्रस्ताव तैयार किया गया। इस मार्ग की कुल लंबाई महज आधा किलोमीटर आई, जबकि घाटी से चलने पर यह रास्ता करीब ढाई किलोमीटर का होता है। सर्वे में यह बात स्पष्ट रूप से सामने आई थी कि अजमेर व पुष्कर को अलग करने वाली पहाड़ी इतनी मजबूत व सख्त नहीं है कि वहां सुरंग खोदी जा सके। अगर सुरंग खोदी गई तो वह कभी भी ढ़ह सकती है। सुरंग के व्यावहारिक धरातल पर संभव न होने की वजह से ही अजमेर को पुष्कर से जोडने के लिए रेल लाइन के प्रस्ताव पर काम किया गया, जिसमें औंकार सिंह लखावत ने अहम भूमिका निभाई थी। ऐसे में जाहिर तौर पर सुरंग का प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया।
एडीए में शिवशंकर हेड़ा की अध्यक्ष पद पर नियुक्ति के बाद सुरंग बनाने की योजना पर फिर कार्रवाई शुरू हुई। इस बाबत एडीए की 1 दिसंबर 2016 को हुई बोर्ड बैठक में प्रस्ताव भी पारित हो गया और सर्वे के लिए निविदा आमंत्रित की गई। पहले तो सर्वे के लिए कंसलटेंट फर्म ही नहीं मिली। दूसरी बार एडीए ने दस लाख रुपए की निविदा निकाली तो एक कंपनी ने केवल फिजिबिलिटी और सर्वे पर ही साढ़े चार करोड़ रुपए खर्च बता दिया। इसे निरस्त करने के बाद एडीए प्रशासन फिर से सुरंग के लिए सर्वे रिपोर्ट तैयार करने में जुट गया है।
सवाल ये उठता है कि जब पुष्कर घाटी में सुरंग बनाना उचित नहीं है तो प्राधिकरण क्यों इसके पीछे पड़ा है? पूर्व में इस कवायद पर 15 लाख रुपए पूरे हो चुके हैं, क्या प्राधिकरण कुछ और राशि बर्बाद करके ही मानेगा?
एक सवाल ये भी है कि सुरंग की बात तब आई थी, जब कि वैकल्पिक मार्ग नहीं था, अब तो रेलवे मार्ग के अतिरिक्त बाईपास भी है, फिर क्यों घाटी के सौंदर्य के साथ छेड़छाड़ की जा रही है?
-तेजवानी गिरधर
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अपनी सरकार के निर्णय के विरुद्ध ही आना पड़ा देवनानी व जैन को

केन्द्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल को ज्ञापन देते सुनील दत्त जैन
प्रदेश के शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी व अजमेर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख सुनील दत्त जैन को अपनी ही पार्टी की केन्द्र सरकार के निर्णय के खिलाफ आगे आना पड़ गया। मुद्दा ये है कि सरकार ने हाल ही जीएसटी लागू करने का जो निर्णय किया है, उसकी वजह से नमकीन के सभी प्रकार के उत्पाद पर 5 प्रतिशत वेट की बजाय 12 प्रतिशत टैक्स लगा दिया गया है। यह निर्णय आगामी 1 जुलाई से लागू होगा।
असल में इस सिलसिले में राजस्थान के प्रमुख नमकीन कारोबारियों की एक बैठक हुई। इसमें राजस्थान नमकीन महासंघ बनाया गया, जिसमें हालांकि जैन ने कोई बड़ा जिम्मेदार पद नहीं लिया, मगर समझा जा सकता है कि उनका जो कद है, उसके मद्देनजर महासंघ में उनकी भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होगी। यह कम बात नहीं कि नमकीन कारोबारियों की बैठक में राज्य सरकार के राज्य मंत्री प्रो. देवनानी भी मौजूद रहे। समझा जा सकता है कि वे किसके कहने पर बैठक में पहुंचे। यह सर्वविदित ही है कि जैन भी अजमेर के एक प्रमुख नमकीन कारोबारी हैं। इस कारण जीएसटी की वजह से इस कारोबार पर पडऩे वाले असर पर उनकी बारीक पकड़ होगी ही।
जैन सहित सभी नमकीन कारोबारियों का तर्क है कि राजस्थान शुष्क प्रदेश है, इस कारण यहां नमकीन का उपयोग सब्जी के बतौर भी किया जाता है। अर्थात यह आम उपयोग की वस्तु है। अकेले राजस्थान में टैक्स बढ़ाने से 10 लाख लोग प्रभावित होंगे। राज्य में नमकीन का कारोबार कुटीर उद्योग की तरह हैं। हजारों परिवारों की आजीविका इस उद्योग पर निर्भर है। यदि 12 प्रतिशत टैक्स वसूला गया तो टैक्स चोरी की संभावना भी बढ़ जाएगी। उनकी बात में दम है। इस प्रकार का असर अन्य उद्योगों पर भी पड़ रहा होगा, मगर चूंकि खुद जैन नमकीन कारोबारी हैं, इस कारण उन्हें अपनी जमात की खातिर सरकार के निर्णय के विरुद्ध आगे आना पड़ा।
बहरहाल, असल मुद्दा ये भी है कि क्या केन्द्र सरकार ने राजस्थान के हालात का सर्वे किए बिना ही नमकीन पर टैक्स बढ़ाने का निर्णय कर लिया। स्पष्ट है कि इस प्रकार का निर्णय सरकारी कारिंदों ने एसी चैंबर में बैठ कर किया है, जिस पर सरकार ने बिना सोचे मुहर लगा दी। कदाचित इसके पीछे एक सोच ये भी रहती होगी कि एक बार तो निर्णय सुना दो, फिर जिसको जो तकलीफ होगी, वह सामने आएगा, और तब उस पर विचार किया जाएगा। मगर ऐसा भी तो हो सकता था कि निर्णय लागू करने से पहले संबंधितों से भी चर्चा की जाती, ताकि टैक्स घोषित करने और उसके बाद विशेष परिस्थिति के मद्देनजर वापस या कम करने की कवायद नहीं करनी पड़ती।
अव्वल तो अभी ये देखने वाली बात है कि क्या सरकार राजस्थान नमकीन महासंघ के तर्क से सहमत होती भी है या नहीं? अगर इसी प्रकार अन्य उद्योगों के व्यवसायी अथवा अन्य राज्यों के लोग भी किसी अन्य उत्पाद को लेकर टैक्स कम करने की मांग करने लगेंगे तो बात कहां तक जाएगी। खैर, महासंघ ने मांग रखी है। देवनानी मुख्यमंत्री और जीएसटी काउंसिल की सदस्य श्रीमती वसुंधरा राजे से बात करेंगे। अगर वे सहमत हो भी गईं तो उन्हें जीएसटी काउंसिल पर दबाव बनाना होगा। इसमें कितना समय लगेगा, तब तक तो टैक्स लागू करने की तारीख 1 जुलाई आ ही जाएगी। कुल मिला कर यह अच्छी बात है कि नमकीन कारोबारियों ने भले ही अपने हित की खातिर मुद्दा उठाया है, उसका लाभ अंतत: आम आदमी को ही मिलेगा।
-तेजवानी गिरधर
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शनिवार, 3 जून 2017

सात साल पहले की थी ऐसे एलिवेटेड रोड की कल्पना

काफी जद्दोजहद के बाद आज जिस बहुप्रतीक्षित व बहुअपेक्षित एलिवेटेड रोड को बनाए जाने का रास्ता खुला है, उसका सपना बहुत पुराना है। दैनिक नवज्योति के प्रधान संपादक श्री दीनबंधु चौधरी ने सिटीजंस कौंसिल के माध्यम से सबसे पहले इसकी मांग पुरजोर तरीके से उठाई थी। अन्य स्वयं सेवी संगठनों व सामाजिक संस्थाओं ने भी इस पर जोर दिया। करीब सात साल पहले प्रकाशित पुस्तक अजमेर एट ए ग्लांस में स्वामी समूह के सीएमडी श्री कंवल प्रकाश किशनानी ने अपने आलेख में इसकी जरूरत प्रतिपादित की। इतना ही नहीं, उन्होंने एलिवेटेड रोड का एक काल्पनिक चित्र भी आलेख के साथ दिया। दिलचस्प बात है कि उस चित्र में रेलवे स्टेशन परिसर में कुछ बहुमंजिला इमारतें दर्शाईं तो लोगों ने कहा कि ऐसा भले कैसे संभव हो सकता है। मगर आज आप देखिए बिलकुल वैसी की एक बहुमंजिला इमारत इस वक्त निर्माणाधीन है, जो श्री किशनानी के स्वप्र दृष्टा होने का आभास कराती है। आपको ख्याल होगा कि ये वही शख्स है, जिसने अजमेर की महानगरीय दिशा में कदम उठाते हुए शहर को पहला व्यावसायिक कॉम्पलैक्स, स्वामी कॉम्पलैक्स दिया था।

शुक्रवार, 2 जून 2017

स्मार्ट सिटी के साथ स्मार्ट हो रही हैं अनिता भदेल

जैसे जैसे अजमेर स्मार्ट सिटी बनने की ओर बढ़ रहा है, यहां की कई चीजें, बातें, रोड, लुक आदि,  सभी बदल रहे हैं। ऐसे में भला हमारे की यहां की राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल कैसे पीछे रह सकती हैं। उनके फेसबुक अकाउंट से अजमेर वासियों ने जाना वे इन दिनों पेरिस में हैं। चौंकाया उनके पेरिस में होने ने नहीं, बल्कि उनके बदले बदले अंदाज ने। उस अंदाज का वर्णन बेमानी है, खुद आप ही देख लीजिए। सहसा आपको यकीन ही नहीं होगा कि क्या ये भोली भाली, सीधी सादी, सादगीपसंद अनिता भदेल ही हैं। उनके इस लुक की अजमेर वासियों में दिन भर चर्चा रही। यह ठीक है कि वे मंत्री हैं, इस कारण उन्हें अपनी वेशभूषा, अंदाज आदि का पूरा ख्याल रखना होता है। मगर आखिर उनका भी नारी मन है। पेरिस में जाने पर अपनी पर आ गया। बहरहाल, जो कुछ भी हो, वे लग बेहद खूबसूरत रही हैं।

गुरुवार, 1 जून 2017

कलैक्टर साहब, क्या ऐसे लोकतंत्र की हत्या नहीं हो जाएगी?

सम्मानीय कलैक्टर साहब,
आपने हाल ही आदेश जारी किए हैं कि सरकारी कर्मचारियों के साथ अभद्रता होने पर पुलिस तुरंत मुकदमा दर्ज करेगी। आपने ऐसा इसलिए किया ताकि कर्मचारी भयमुक्त हो कर कार्य कर सकें। असल में आपने ऐसा राजकार्यों के निवर्हन के दौरान असामाजिक व्यक्तियों द्वारा व्यवधान किए जाने के संदर्भ में कहा है। बेशक आपका आदेश सराहनीय है। ऐसा होना ही चाहिए।
सच तो ये है कि यह व्यवस्था पहले से ही है। बाकायदा कानून बना हुआ है। आपने कोई नया आदेश जारी नहीं किया है। आपने रिपीट मात्र किया है। मगर जितना जोर देकर कहा है, उसके दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं। कहीं ऐसा न हो कि आपका कर्मचारी निरंकुश हो जाए? अव्वल तो यह कैसे तय मान लिया जाए कि हर कर्मचारी ईमानदार है? एक बारगी मान भी लिया जाए, मगर वह जिस पर कार्यवाही कर रहा है, उसकी भी कोई अपेक्षा हो सकती है। क्या हर बार जनता का व्यक्ति गलत ही होता है और कर्मचारी हर बार सही? मान लो किसी व्यक्ति के साथ कोई कर्मचारी ज्यादती कर रहा है, तो उसे कौन तय करेगा कि वह ठीक कर  रहा है? फिर अभद्रता का पैरामीटर क्या है? बेशक कर्मचारी के साथ हाथापाई करना राजकाज में बाधा है, मगर केवल विरोध दर्ज करने मात्र को भी तो कर्मचारी राजकाज में बाधा मान कर पुलिस को शिकायत कर सकता है। हो सकता है कि आपका तर्क ये हो कि मौके पर कर्मचारी जो कर रहा है, उसे करने दिया जाए, अगर शिकायत है तो उच्च अधिकारी से कहा जाए। मगर जिस तरह का आदेश है, उसे देखते तो यही लगता है कि आम आदमी की सुनवाई उच्च अधिकारी भी करने वाला नहीं है, वह अपने कर्मचारी का ही पक्ष लेगा।
उदाहरण के तौर पर कर्मचारी किसी का कथित अतिक्रमण हटा रहा है। अगर दूसरे पक्ष के पास दस्तावेजी सबूत हैं कि वह अतिक्रमण नहीं है, या फिर कोर्ट का स्थगनादेश है, तो क्या वह इस डर से कि अगर विरोध करूंगा तो मेरे खिलाफ मुकदमा दर्ज हो जाएगा, वह चुपचाप रह जाए? कर्मचारी तो तोडफ़ोड़ करके चला जाएगा, यह बाद की बात है कि कोर्ट की अवमानना साबित होने पर कोर्ट कर्मचारी के खिलाफ फैसला करेगा। मगर तब तक तो जो तोडफ़ोड़ हुई है, उसका नुकसान तो आम आदमी ही भुगतेगा ना? ऐसे अनेक मामले सामने आते रहे हैं, जबकि जबरन कार्यवाही के दौरान गेहूं के साथ घुन भी पिस गया, बाद में जा कर कर्मचारी को कोर्ट की फटकार लगी।
ऐसे अनेक प्रकार के मामले हो सकते हैं। कम से कम आमजन को मौके पर अपना पक्ष रखने का अधिकार तो होना ही चाहिए। विरोध जताने का भी अधिकार होना चाहिए। यदि कोई विरोध स्वरूप अपनी बात कह रहा है और आपके कर्मचारी ने उसे अभद्रता मान लिया तो पुलिस तो आम आदमी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लेगी।
काश, आपने जरा इसका भी ख्याल कर लिया होता कि आखिरकार हम लोकतांत्रिक देश में रह रहे हैं, जिसमें जनता व जनहित ही सर्वोपरि है। राजकाज करने वालों को पूरी निष्पक्षता के साथ काम करने की छूट होनी ही चाहिए, मगर वे निरंकुश न हो जाएं, इसको लेकर आपने एक भी शब्द नहीं कहा, जिससे एक बारगी ऐसा आभास होने लगा मानो हम प्रजातंत्र में नहीं बल्कि राजतंत्र में जी रहे हों। अजमेर के कार्यकाल में आपने जो निष्पक्षता, कर्मठता से जनहित के काम में आ रही बाधाओं को तुरंत हटाया है, उससे आपकी छवि एक सख्त अफसर की भी बनी है। कहीं ऐसा न हो कि आपकी इसी छवि की आड़ में भ्रष्ट व बेईमान कर्मचारी आपके आदेश का दुरुपयोग न करने लगें?
-तेजवानी गिरधर
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बुधवार, 31 मई 2017

अपने सचिव तक को नहीं रोक पाए धर्मेश जैन

एक कहावत है कि जब जहाज डूबने लगता है तो उसमें निवास करने वाले चूहे पहले ही कूद-कूद कर भागने लगते हैं। कुछ इसी तरह की एक मारवाड़ी कहावत मैने अजमेर डेयरी अध्यक्ष रामचंद्र चौधरी से कभी सुनी थी कि भांस मरबा लागे, तो चींचड़ा छोड-छोडर भागै, अर्थात भैंस मरने वाली हो तो उसके शरीर से चिपक कर अपना जीवनयापन पीने वाले जीवाणुओं को पहले ही पता लग जाता है और वे छोड़ कर भाग जाते हैं। ये कहावतें कहने-सुनने में तो ठीक हैं, मगर लिखने की बात हो तो मैं यही कहूंगा कि जैसे ही कोई सत्ता विहीन होने लगता है तो उसके साथी उसे छोड़ कर भाग जाते हैं। यही संभ्रांत तरीका है। बात चूंकि संभ्रांत महानुभावों की है, लिहाजा संभ्रांत ढ़ंग से ही कहा जाए तो ठीक है।
आपको ख्याल होगा कि हाल ही जब महाराणा प्रताप जयंती समारोह का विवाद मीडिया में सुर्खियों में रहा। तत्कालीन नगर सुधार न्यास के सदर धर्मेश जैन को मलाल रहा कि कई साल से वे स्मारक स्थल पर जंयती मनाते रहे, मगर इस बार मौजूदा अजमेर विकास प्राधिकरण अध्यक्ष शिवशंकर हेडा ने कार्यक्रम हथिया लिया। कार्यक्रम क्या, पूर्व में गठित समिति के अधिसंख्य सदस्य भी उन्होंने तोड़ लिए। दिलचस्प बात देखिए कि जैन की समिति के सचिव रहे शिक्षाविद् व इतिहासज्ञ डॉ. नवल किशोर उपाध्याय ने भी पाला बदलने में देर नहीं लगाई। जब हेडा ने अभी सोचा भी नहीं होगा कि जयंती कैसे मनाई जाए, उससे पहले ही जैन व उपाध्याय के हस्ताक्षर से युक्त  पत्र एडीए सचिव को लिख भेजा गया था कि वे हर बार ही तरह इस बार भी जयंती मनाना चाहते हैं, लिहाजा एडीए का सहयोग अपेक्षित है। खैर, उस पत्र पर न कोई कार्यवाही होनी थी, न ही हुई, इस बात का अंदाजा उपाध्याय को हो गया था, लिहाजा जैसे ही हेडा ने एडीए स्तर पर जयंती मनाने कर निर्णय किया तो वे पाला बदल कर उनके पास चले गए। उन्होंने बाकायदा पहले दिन हुए व्याख्यान कार्यक्रम का संयोजन किया। असल में वे ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर वाले शख्स हैं। विद्वान हैं, अच्छे धाराप्रवाह वक्ता हैं, इतिहास के जानकार हैं। जैन ने साथ बुलाया तो उनके साथ हो लिए और हेडा ने बुलाया तो जैन को छोड़ कर उनके साथ हो लिए। उन्हें तो उचित मंच चाहिए होता है। उन्हें इससे क्या मतलब कि इससे जैन नाराज होंगे। नाराज हो भी गए तो क्या, अब सत्ता में तो हेडा जी हैं। खैर, उनकी सदाशयता उनके साथ है, मगर उनके इस पाला बदल से ऊपर लिखी संभ्रांत कहावत तो चरितार्थ होती ही है।

मंगलवार, 30 मई 2017

महाराणा प्रताप जयंती पर एक नहीं, तीन कार्यक्रम हुए

कहां तो पुष्कर घाटी पर नौसर माता मंदिर के पास स्थित महाराणा प्रताप स्मारक पर शिलान्यास से लेकर पिछले साल तक अकेले यूआईटी के पूर्व अध्यक्ष धर्मेश जैन जैसे-तैसे साधन-संसाधन जुटा कर जयंती कार्यक्रम करते थे, मगर अब मूर्ति स्थापना के बाद एक नहीं तीन-तीन कार्यक्रम हुए। मुख्य कार्यक्रम तो अजमेर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष शिव शंकर हेडा ने जैन से छीन ही लिया और उसे तीन दिन का कर दिया। साथ ही दो अन्य कार्यक्रम भी हुए। दिलचस्प बात ये है कि अन्य दो कार्यक्रमों में से एक सीधे तौर पर संघ विचारधारा के संगठन हिंदू जागरण मंच, चित्तौड़ प्रांत की ओर से किया गया। समझा जा सकता है कि वह संघ की उस मुहिम की पूर्ति कर रहा है, जिसके तहत अकबर की बजाय महाराणा प्रताप को हीरो बनाने की कोशिश की जा रही है। इसी प्रकार तीसरा कार्यक्रम अखिल भारतीय घुमंतू गाडिय़ा लुहार समाज का था, जिसके विशिष्ट अतिथि शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी थे। अगर प्रयास किए जाते तो अन्य दो संस्थाओं को भी मुख्य कार्यक्रम में समाहित किया जा सकता था, मगर ऐसा हो नहीं पाया। यहां गौरतलब है कि हेडा से जब पूछा गया था कि जैन को नजरअंदाज क्यों किया जा रहा है तो हेड़ा ने गोलमोल जवाब देते हुए कहा था कि उनके कार्यक्रम में पूरे शहर व कई संस्थाओं को जोड़ा गया है तो सवाल उठता है कि इन दो संस्थाओं को अलग से कार्यक्रम करने की जरूरत क्यों पड़ी?
ज्ञातव्य है प्राधिकरण की ओर से 28 मई को शाम 4.30 बजे सम्राट पृथ्वीराज महाविद्यालय से महाराणा प्रताप स्मारक तक चैतक वाहन रैली निकाली गई। ये रैली महाविद्यालय से होते हुए महाराणा प्रताप स्मारक पर सम्पन्न हुई।
इसी प्रकार हिन्दू जागरण मंच, चित्तौड़ प्रांत द्वारा 27 मई को वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप जयंती पर राष्ट्र गौरव वाहन रैली का आयोजन किया गया। रैली राजकीय महाविद्यालय से प्रारंभ होकर महाराणा प्रताप स्मारक नौसर घाटी पर समाप्त हुई।
इसी प्रकार अखिल भारतीय घुमंतू गाडिय़ा लुहार समाज के तत्वावधान में 28 मई को महाराणा प्रताप जयंती पर शोभायात्रा निकाली गई।
उल्लेखनीय है कि जैन के कार्यकाल में 17 जून 2007 को महाराणा प्रताप स्मारक का शिलान्यास किया गया था। बाद में कांग्रेस सरकार आ गई। उसने इस पर मूर्ति स्थापना में रुचि नहीं दिखाई, हालांकि मूर्ति का ऑर्डर हो चुका था। चूंकि इस स्मारक का सपना जैन ने देखा था, इस कारण उनकी इसमें रुचि थी और स्मारक का वजूद कायम रखने के लिए वे हर साल यहां जयंती कार्यक्रम करते रहे। इसके लिए उन्हें अपने स्तर ही खासी मशक्कत करनी पड़ती थी। अब जब कि हेडा के कार्यकाल में स्मारक पर मूर्ति स्थापना हो चुकी है, तो उस मुख्य कार्यक्रम को हेडा ने हथिया लिया है। इतना ही नहीं दो अन्य संस्थाएं भी जाग गईं। मगर अफसोसनाक बात ये है कि जिसने इस स्मारक का सपना देखा, वह आज पूरी तरह से नैपथ्य में चला गया है। हालांकि यह सही है कि जैन को निमंत्रण पत्र देने स्वयं हेडा उनके निवास पर गए थे, और इसी नाते वे कार्यक्रम में गए भी, समुचित सम्मान भी मिला, मगर दिखे बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना की माफिक। शिक्षा राज्य मंत्री देवनानी ने उन्हें ठीकठाक तवज्जो दी।
-तेजवानी गिरधर
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गुरुवार, 25 मई 2017

विजय जैन के लिए कठिन है बूथ लेवल तक संगठन को मजबूत करना

आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस कमर कसने जा रही है। इसके लिए संगठन को बूथ लेवल तक मजबूत किया जाएगा, मगर अजमेर शहर कांग्रेस अध्यक्ष विजय जैन के लिए यह टास्क कठिन है। उनके पास अपनी कार्यकारिणी नहीं है, जिसके माध्यम से कार्यकर्ताओं को मोबलाइज कर सकें। पूर्व अध्यक्ष महेन्द्र सिंह रलावता के समय की कार्यकारिणी से काम लेना उनकी मजबूरी है। इस कारण अपेक्षित परिणाम आने की उम्मीद कम ही है।
असल में जब रलावता को हटा कर जैन को अध्यक्ष बनाया गया तो यकायक कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार हुआ। चाहे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट के डर से या नई कार्यकारिणी में स्थान पाने की लालच में कार्यकर्ता सक्रिय हो गए। जैन के नेतृत्व में आयोजित कार्यक्रमों में रलावता की तुलना में अधिक उत्साह नजर आने लगा। ऐसा लगा कि कांग्रेस आगामी विधानसभा चुनाव के लिए अंगड़ाई लेेने जा रही है। मगर यह उत्साह शनै: शनै: धीमा पड़ता जा रहा है। जैन को अध्यक्ष बने एक साल से ज्यादा हो गया है, मगर उनकी कार्यकारिणी अब तक नहीं बन पाई है। उधर चुनाव सिर पर हैं और संगठन को मजबूत करने की महती जिम्मेदारी उन पर है, मगर अपनी टीम के अभाव में उन्हें काम करने में दिक्कत आ रही है।
इस परेशानी का इजहार उन्होंने विधानसभा चुनावों के मद्देनजर कांग्रेस की जिलेवार फीडबैक बैठक में भी किया। उन्होंने ब्लॉक अध्यक्षों के रिक्त पदों पर नामों की घोषणा भी जल्दी करने की बात कही। उनका दर्द था कि अग्रिम संगठनों पदाधिकारी पुराने ही हैं, वे भी पार्टी बैठकों में भाग नहीं लेते।
इस सिलसिले में उनके चंद विरोधियों का कहना है कि असल में वे नाकामयाब अध्यक्ष हैं और अपनी कमी छिपाने के लिए कार्यकारिणी न होने का बहान बना रहे हैं। उनका तर्क है कि नई कार्यकारिणी नहीं है तो क्या हुआ, पुरानी के सभी लोग सक्रिय हैं। अगर कोई सहयोग नहीं कर रहा तो उसके बारे में उन्हें जानकारी देनी चाहिए। उन पर आरोप ये भी है कि वे सभी को तालमेल के साथ लेकर नहीं चल रहे। दूसरी ओर धरातल का सच ये है कि खुद की कार्यकारिणी न होने के कारण पुराने पदाधिकारियों को हैंडल करना उनके लिए वाकई कठिन काम है। कुछ तो जैन से भी सीनियर हैं। उनसे भला वे कैसे काम ले सकते हैं। सच तो ये है कि जैन के कार्यकाल की समीक्षा इसलिए नहीं हो सकती क्योंकि उन्हें फ्रीहैंड मिला ही नहीं। बावजूद इसके उनके नेतृत्व में अच्छे कार्यक्रम हुए, उसका श्रेय भले ही अकेले उनके खाते में नहीं जाता।
जो कुछ भी हो, अगर कार्यकारिणी एक साल पहले बन जाती तो आज संगठन का ढ़ांचा कुछ और ही होता। हो सकता है कि उसमें विवाद होते या कुछ कमियां रहतीं, मगर चुनाव से पहले उन्हें दुरुस्त किया जा सकता था। कम से कम कमियां सामने तो आतीं।
खैर, अब जबकि 30 जून तक बूथ लेवल तक की इकाइयों का गठन कर लेने के निर्देश दिए गए हैं, तो उम्मीद की जा रही है कि शहर की कार्यकारिणी व रिक्त ब्लॉक अध्यक्षों की घोषणा भी जल्दी हो जाएगी।
-तेजवानी गिरधर
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बुधवार, 24 मई 2017

धर्मेश जैन की सारी क्रेडिट छीनना चाहते हैं शिवशंकर हेडा

धर्मेश जैन
राजनीति में किए गए काम की क्रेडिट मिले या मिले, कुछ कहा नहीं जा सकता। अजमेर नगर सुधार न्यास के अध्यक्ष धर्मेश जैन के साथ ऐसा ही हुआ है। उन्होंने पुष्कर घाटी पर नौसर माता मंदिर के पास महाराणा प्रताप स्मारक बनाने का सपना देखा, शिलान्यास करवाया और मूर्ति बनवाने का आदेश भी दिया, मगर कार्यकाल बीच में ही छूट गया। बाद में अजमेर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष शिव शंकर हेडा बने और उनके कार्यकाल में मूर्ति स्थापना हुई तो उसकी सारी क्रेडिट वे ही लेना चाह रहे हैं। हालत ये है कि शिलान्यास से लेकर अब तक हर साल जैन वहां महाराणा प्रताप जयंती पर कार्यक्रम करते रहे हैं, मगर इस बार मूर्ति स्थापना के बाद हो रहे कार्यक्रम से जैन को पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया गया है। हालांकि उन्होंने इस बार भी कार्यक्रम करने की अनुमति का पत्र बहुत पहले एडीए को दे दिया, मगर हेडा के कहने पर उसे रद्दी की टोकरी दिखा दी गई। अब हेडा खुद एडीए के स्तर पर जयंती का कार्यक्रम करने जा रहे हैं।
गत दिवस जयंती समारोह की जानकारी देने के लिए हेडा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने कहा कि महाराणा प्रताप स्मारक एडीए ने मात्र साढ़े तीन महीने में तैयार किया गया। इसके निर्माण में जिला कलेक्टर गौरव गोयल व सेवानिवृत्त अधीक्षण अभियंता सुनील सिंघल का विशेष सहयोग रहने की बात भी कही, मगर जैन की भूमिका को लेकर एक भी शब्द नहीं कहा। इससे भी ज्यादा अफसोसनाक बात ये है कि जंयती समारोह में शहर के अधिसंख्य बड़े भाजपा नेताओं को अतिथि के रूप में बुलाया जा रहा है, मगर उस सूची में पूर्व न्यास अध्यक्ष जैन, जो कि इस स्मारक के स्वप्रदृष्टा हैं, का नाम कहीं पर भी नहीं है। हेडा इतने ढ़ीठ हैं कि इस मुद्दे पर उनकी खूब छीछालेदर हो रही है, फिर भी वे उसकी परवाह नहीं कर रहे। उन्हें इसकी भी चिंता नहीं कि इससे आम जनता में उनकी छवि कैसी बन रही है। उनकी इस जिद की वजह से भाजपा की गुटबाजी भी सड़क पर आ रही है, मगर उन्हें पार्टी की किरकिरी होने का कोई अहसास ही नहीं। जानकारी के अनुसार जैन ने इसकी शिकायत शहर भाजपा अध्यक्ष अरविंद यादव से की है और यादव ने भी एक पत्र हेडा को लिखा है, फिर भी उनके कान पर जूं तक नहीं रेंगी। सत्ता व संगठन के तालमेल का यह ताजा उदाहरण है।
स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठ रहा है कि जब जयंती समारोह जैन मनाते रहे हैं तो हेड़ा ने क्यों नई समिति बनाई? अगर पूर्व की समिति कांग्रेस डोमिनेटेड होती तो उसके स्थान पर भाजपानीत समिति बनाना समझ में आता, मगर अपनी ही पार्टी के नेता की अध्यक्षता में बनी समिति का उड़ा  देना उनकी संकीर्णतम मानसिकता का द्योतक है।
-तेजवानी गिरधर
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हेडा के अड़ंगे के बावजूद एलिवेटेड रोड बनेगा

लीजिए, अजमेर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष शिवशंकर हेडा के अड़ंगे के बावजूद अजमेर में एलिवेटेड रोड का रास्ता साफ हो गया है। स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में शहरी विकास मंत्रालय एवं राज्य सरकार ने अजमेर शहर में 162 करोड़ की लागत से एलिवेटेड रोड बनाने की सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। जानकारी के अनुसार अजमेर स्मार्ट सिटी लिमिटेड को इसके लिए जल्दी ही फोरलेन सड़क का चयन कर डीपीआर तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। अर्थात अब यह काम स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत होगा, जिसमें अजमेर विकास प्राधिकरण की कोई बाधा नहीं रहेगी।
ज्ञातव्य है कि पिछले दिनों स्वायत्त शासन मंत्री श्रीचंद कृपलानी अजमेर आए तो एक समारोह के दौरान शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी ने अजमेर में एलिवेटेड रोड की जरूरत पर जोर दिया, मगर हेडा ने उसका विरोध करते हुए उसकी संभावना पर पानी फेरने की कोशिश की और कह दिया कि इस बारे में मुख्यमंत्री से बात हो चुकी है। हालांकि देवनानी ने भी कहा कि उनकी मुख्यमंत्री से बात हुई है, मगर मतभिन्नता के चलते बात वहीं खत्म हो गई, मगर कृपलानी ने इस मामले को प्रसंज्ञान में ले लिया।  जानकारी के अनुसार इस बारे में अजमेर नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष धर्मेश जैन ने भी देवनानी पर दबाव बनाया। वे इससे पहले भी कई बार मुख्यमंत्री को आग्रह कर चुके थे। देवनानी ने भी मुख्यमंत्री से बात कर बात को आगे बढ़ाया और अंतत: शहरी विकास मंत्रालय एवं राज्य सरकार इसके लिए सैद्धांतिक रूप से सहमत हो गए।
हुआ यूं कि जिला कलेक्टर गौरव गोयल जयपुर में केंद्रीय शहरी विकास मंत्री वैंकेया नायडू एवं सीएम वसुंधरा राजे द्वारा सीएमओ में आयोजित बैठक में शहरी विकास योजनाओं तथा स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत कराए जा रहे कामों की जानकारी देने गए थे। वहीं उन्होंने इस मामले को रखा। इस पर मुख्यमंत्री ने अजमेर शहर में बढ़ते यातायात के दबाव के मद्देनजर 162 करोड़ की लागत से एलिवेटेड रोड बनाने की सैद्धांतिक स्वीकृति दे दी।
महत्वपूर्ण बात ये है कि अब एडीए का कोई लेना देना नहीं है। न तो हेडा अब बजट का रोना रो सकते हैं और न ही मुख्यमंत्री की मर्जी के खिलाफ कुछ बोल सकते हैं। असल में उनकी रुचि इस कारण नहीं बताई जाती है कि यह प्रोजेक्ट बड़ा होने के कारण उनके कार्यकाल में पूरा नहीं हो पाता और क्रेडिट भी कोई और लेता। मगर सवाल उठता है कि शहर का हित सर्वोपरि है या किस व्यक्ति की जिद। यह एक बेहद अफसोसनाक बात है कि जिस यातायात समस्या को पूरा शहर भोग रहा है, उसके समाधान में रुचि लेने की बजाय हेडा ने व्यक्ति नजरिये को तवज्जो दी। खैर, अब उनकी अनिच्छा व अड़ंगे का कोई लेना देना नहीं है। शहर वासियों को दुआ करनी चाहिए कि ऊर्जावान जिला कलेक्टर गोयल यहां रहते इस काम को शुरू करवा जाएं।
जहां तक सत्तारूढ़ भाजपा संगठन का सवाल है, वह इस एलिवेटेड रोड के प्रति कितना आतुर था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने एलिवेटेड रोड की मंजूरी की जानकारी आते ही मुख्यमंत्री का आभार जताया और उसकी उपयोगिता का बखान किया। मजे की बात ये है कि शहर भाजपा अध्यक्ष अरविंद यादव की ओर से जारी विज्ञप्ति में आभार के साथ जिन अधिसंख्य नेताओं के नाम जोड़े हैं, उनमें हेडा का भी नाम है। समझा जा सकता है कि यादव ने वह नाम औपचारिकता वश जोड़ा है। उन्होंने इसके लिए विशेष रूप से शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी  का आभार इस नाते व्यक्त किया है कि उन्होंने मुख्यमंत्री के समक्ष अजमेर की इस जरूरत पर ध्यान आकर्षित किया। साथ ही अजमेर में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी गौरव गोयल एवं अजमेर नगर निगम महापौर धर्मेंद्र गहलोत का आभार इसलिए कि उन्होंने इसके प्रथम चरण में डीपीआर बनवाई, कंसल्टेंट से फिजिबिलिटी के आधार पर तकनीकी रिपोर्ट तैयार करवाई।
-तेजवानी गिरधर
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सोमवार, 22 मई 2017

पुलिस अफसरों में ही तालमेल नहीं, कैसे सुधरेंगे हालात?

राजेन्द्र सिंह
अजमेर के निवनियुक्त जिला पुलिस अधीक्षक राजेन्द्र सिंह ने हाल ही जब नियम तोड़ कर वाहन चलाने वाले पुलिसकर्मियों के भी चालान कटवाए तो ऐसा लगा कि वे नई ऊर्जा व उत्साह के साथ आए हैं और पुलिस महकमे में आमूलचूल सुधार करने वाले हैं, मगर चंद दिन बाद ही राज खुल गया कि उनके अधीनस्थ पुलिस अधिकारियों में ही तालमेल नहीं है।
ज्ञातव्य है कि अजमेर पुलिस की कमान संभालने के तुरंत बाद उन्होंने  आमजन को सुधारने से पहले पुलिसकर्मियों को भी सुधारने के आदेश दिए। और उसी अनुरूप जिला पुलिस लाइन के बाहर यातायात के उपनिरीक्षक वी डी शर्मा और उनके सहयोगियों को तैनात किया। उन्होंने पुलिस लाइन में आने और जाने वाले पुलिसकर्मियों द्वारा हेलमेट नहीं लगाने, कार पर काली फिल्म चढ़ी होने सहित अन्य नियमों का उल्लंघन करने पर कार्रवाई की। ऐसा होता देख मीडिया को सुखद अहसास हुआ कि पिछले पुलिस अधीक्षक नितिन दीप ब्लग्गन के कार्यकाल में चरमरा चुकी कानून व्यवस्था लाइन पर आ जाएगी। मगर चंद दिन बाद ही पुलिस महकमे की पोल खुल गई है कि खुद उनके बीच ही तालमेल नाम की कोई चीज नहीं है। ऐसे में नए एसपी से कानून व्यवस्था में सुधार की क्या उम्मीद की जा सकती है?
हुआ यूं कि धार्मिक नगरी में नशे के सौदागरों और शराब माफियाओं के अवैध धंधों की शिकायत सीधे एसपी राजेंद्र सिंह को मिली थीं। समझा जा सकता है कि उन्हें ये समझ में आ गया होगा कि पुष्कर में बड़े पैमाने पर नशे का कारोबार फल फूल रहा है, मगर  पुष्कर थाना पुलिस ने कार्रवाई नहीं की है। अर्थात उसकी शराब तस्करों को पकडऩे में जरा भी रुचि नहीं है, जो कि सांठगांठ की ओर इशारा करता है। इस पर एसपी ने खुद एएसपी मोनिका सेन व उनकी टीम को पुष्कर में शराब के ठिकानों पर रेड के लिए भेजा। रेड के दौरान 9 ठिकानों पर कार्रवाई कर 9 लोगों को शराब बेचते रंगे हाथों पकड़ा गया। यूपी के दो चरस तस्कर भी पकड़े गए।
मगर यह बेहद अफसोसनाक बात रही कि आईपीएस मोनिका सेन ने पुष्कर सीआई दुलीचंद को कार्रवाई में मौके पर बुलाया, मगर वे नहीं गए। बाद में आला कमान के आदेशों पर जिला पुलिस कंट्रोल रूम से सीआई को मौके पर पहुंचने के लिए कहा गया, लेकिन फिर भी वे नहीं पहुंचे और थाने की जीप भिजवा दी। उनकी धौंस देखिए कि जब टीम कार्यवाही कर लौटी तो उस पर ही गुस्सा उतारने लगे। उनका ये व्यवहार पुष्कर में हो रहे नशे के बेखौफ कारोबार की पूरी कहानी बयां करने के लिए काफी है।
एक ओर सरकार तीर्थराज की महत्ता और पर्यटन के मद्देनजर विभिन्न योजनाओं में बजट आवंटित कर रही है, दूसरी और वहीं की पुलिस को इस तीर्थ की पवित्रता से कोई लेना देना नहीं है। उसकी का परिणाम है कि परचून की दुकान हो या फिर हाई-वे के ढाबे, रेस्त्रां, टेंट हाउस और शराब की आवंटित दुकानों की अवैध ब्रांच, सभी जगह खुलेआम देशी-अंग्रेजी शराब बिक रही है।
हालांकि एसपी का कहना है कि अगर छापामार कार्यवाही के मामले में पुष्कर थाना पुलिस की कोई लापरवाही सामने आती है तो कार्रवाई की जाएगी, मगर जिस तरह का सीआई का रवैया है, संदेह ही होता है कि कोई गंभीर कार्यवाही होगी। वे तो कह रहे हैं कि उन्हें तो टीम के आने का कुछ भी पता नहीं। बहरहाल, पुलिस अधिकारियों के बीच संवाद की जो भी कमी रही हो, मगर इतना तय है कि उनके बीच तालमेल कत्तई नहीं है। ऐसे में देखते हैं नए एसपी कैसे सुधार पाते हैं कि जिले की कानून व्यवस्था?
-तेजवानी गिरधर
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शनिवार, 20 मई 2017

क्या यकायक खतरनाक हो गए इतने सारे समारोह स्थल?

भरतपुर में कुछ दिन पूर्व तेज अंधड़ से एक समारोह स्थल की दीवार गिरने से हुई मौतों के बाद राज्य सरकार ने अचानक आदेश जारी कर दिए कि बिना लाइसेंस वाले समारोह स्थल सीज कर दिए जाएं। इसकी अनुपालना में अजमेर में भी धड़ाधड़ समारोह स्थल सीज कर दिए गए। नतीजा ये है कि तकरीबन तीन सौ आयोजक परेशानी में आ गए हैं कि वे अचानक नया समारोह स्थल कहां जा कर ढूंढ़े? दुविधा ये है कि अगर कोई और समारोह स्थल बुक करवाते हैं, वह भी अगर ऐन वक्त पर सीज हो गया तो वे क्या करेंगे? जो लोग कार्ड बांट चुके हैं, उनके लिए परेशानी ये भी है कि नए स्थान व नई तारीख की सूचना कम समय में कैसे भेजें? दैनिक भास्कर ने मीडिया का फर्ज निभाते हुए पड़ताल कर ऐसे मामलों को उजागर किया है। ऐसे और भी मामले होंगे ही। मगर सवाल ये उठता है कि क्या केवल मीडिया ही अपना फर्ज निभाएगा, सरकार व प्रशासन की कोई भी जिम्मेदारी नहीं है कि वह यकायक की गई कार्यवाही से हुई परेशानी का निराकरण करे?
कैसी विडंबना है कि सरकार व प्रशासन तब जा कर जागे, जबकि एक समारोह स्थल पर हादसा हो गया। क्या एक ही दिन में सारे समारोह स्थल खतरनाक हो गए? सैकड़ों-हजारों समारोह स्थल बिना लाइसेंस के चल रहे थे तो वह किसकी गलती है? वहां सुरक्षा के इंतजाम नहीं थे, तो उसके लिए कौन जिम्मेदार है? जिन अधिकारियों व कर्मचारियों पर समारोह स्थलों की निगरानी का जिम्मा था, क्या पूरी तरह से निर्दोष हैं। अगर वे गलत हैं तो उसके लिए सजा का क्या प्रावधान है? माना कि समारोह स्थल मालिकों ने गलती की तो उन्हें दंड मिलना ही चाहिए, मगर जिसकी लापरवाही से समारोह स्थल चल रहे थे, क्या उनका कुछ भी नहीं बिगड़ेगा? समारोह स्थल मालिकों से अवैध वसूलियां करने वाले अधिकारी-कर्मचारी छुट्टे घूमते रहेंगे? ये कैसा कानून है? और उससे भी बड़ी बात ये है कि जिन लोगों ने समारोह स्थल बुक करवाए, उनका क्या दोष? वे किस बात की सजा भोग रहे हैं? उनको जो आर्थिक व मानसिक हानि होगी, उसकी भरपाई कौन करेगा? माना कि सरकार ने जनहित में त्वरित कार्यवाही करते हुए बड़ा अच्छा काम किया, मगर क्या यह नहीं देखा जाना चाहिए था कि यकायक ऐसा करने से  जनता को परेशानी तो नहीं हो जाएगी? सरकार चाहती तो तुरंत जांच करवा कर ऐसे समारोह स्थलों को, जो वाकई खतरनाक हैं, उनको सीज करती, बाकी को फिलहाल छूट दे देती, जिनमें समारोह आयोजित करने पर अभी कोई खतरा नहीं है। लाइसेंस की औपचारिकता तो एक माह की अवधि में बाद में भी पूरी की जा सकती थी। मगर ऐसा हुआ नहीं, होना भी नहीं है, क्योंकि कानून अंधा है, सरकार व प्रशासन संवेदनहीन। ऊपर बैठे राजनेताओं को अपनी राजनीति का चिंता है, आदेश जारी करने वाले एसी चैंबर में बैठ कर एक ही लाठी से सबको हांकते हैं और निचले आधिकारियों तो केवल लकीर पीटनी है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

बुधवार, 17 मई 2017

एकजुट नहीं हुए तो देवनानी व अनिता, दोनों के टिकट काटने होंगे

हालांकि लगातार तीन बार जीतने की वजह से शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी व महिला व बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल काफी मजबूत माने जाते हैं, इसके अतिरिक्त दोनों मंत्री भी हैं, इस कारण उनके टिकट आगामी विधानसभा चुनाव में काटना निहायत कठिन काम है, मगर दोनों के बीच जिस तरह की खींचतान मची हुई है, उसे देखते हुए लगता यही है कि दोनों सीटें जीतने के लिए भाजपा हाईकमान को उन्हें टिकट देने से पहले सौ बार सोचना पड़ेगा। जमीन पर कार्यकर्ता इतना बंट चुका है कि उसे एकजुट करना अब बेहद मुश्किल है।
असल में दोनों नेताओं के बीच पहली बार जीतने के साथ ही छत्तीस का आंकड़ा हो गया था। अनुसूचित जाति की महिला विधायक होने के नाते श्रीमती भदेल का मंत्री बनना तय माना जा रहा था, मगर देवनानी सिंधी कोटे में मंत्री बन गए। तभी से दोनों के बीच नाइत्तफाकी आरंभ हुई। देवनानी के मंत्री बनने से अजमेर भाजपा के भीष्मपितामह औंकार सिंह लखावत को भी तकलीफ हुई। शनै: शनै: वह गुटबाजी में तब्दील हो गई। भाजपा का एक बड़ा गुट लखावत व अनिता के साथ हो गया, मगर संघ के दम पर देवनानी मजबूत बने रहे। पिछले चुनाव में तो हालत ये थी कि चाहे गैर सिंधीवाद के नाम से, चाहे गुटबाजी व व्यक्तिगत कारणों से, भाजपा के अधिसंख्य नेता देवनानी के खिलाफ थे। टिकट कटने की नौबत तक आ गई, संघ के वीटो से टिकट ले आए। धरातल पर हालत ये थी कि उन्हें हराने के लिए पूरी ताकत झोंक दी गई। उधर श्रीमती भदेल के दाहिने हाथ रहे उद्योगपति हेमंत भाटी को कांग्रेस का टिकट मिल गया और वे अनिता के सामने ही खड़े हो गए। जाहिर तौर पर वे भी कमजोर थीं। कुल मिला कर देवनानी व अनिता दोनों ही पिछले चुनाव में हार के करीब थे, मगर मोदी लहर ऐसी चली कि दोनों अच्छे वोटों से जीत गए। ऐसे में उन्हें यह भ्रम है कि वे अजेय हो गए हैं। तीसरी बार जीतने पर संघ के दबाव में देवनानी तो मंत्री बनाना जरूरी था तो वसुंधरा ने बैलेंस करने के लिए अनिता को भी मंत्री बना दिया। अब दोनों के बीच आए दिन भिड़ंत होती रहती है। प्रशासन भी परेशान है।
दो साल पहले नगर निगम चुनाव में भाटी ने अपनी हार का बदला ले लिया और दिखा दिया कि अनिता जमीन पर कमजोर हो गई हैं। मेयर चुनाव में उनके दूसरे सिपहसालार सुरेन्द्र सिंह शेखावत भी छिटक गए। ऐसे में उनके पास चुनाव जीतने के काबिज ताकत नहीं रह गई है। हालांकि सिंधी व माली वोट बैंक अब भी उनकी ताकत बना हुआ है, मगर देवनानी गुट के लोगों के भीतरघात करने व एंटी इंकंबेंसी के चलते उनको दिक्कत पेश आएगी। यद्यपि हाल ही उन्होंने अजमेर दक्षिण क्षेत्र के सभी वार्डों की क्रिकेट प्रतियोगिता करवा कर जमीन पर पकड़ बनाई है, मगर यह आयोजन भी संगठन के स्तर पर विवाद का शिकार हो गया है।
बात अगर देवनानी की करें तो हालांकि उन्होंने निगम चुनाव में अपनी ताकत दिखा दी है, आज भी उनकी टीम मजबूत है, मगर जमीन पर हालात बहुत अच्छे नहीं रहे हैं। चलते रस्ते ब्राह्मणों को भी नाराज कर बैठे हैं। लखावत-अनिता खेमा भी उन्हें हराने को तैयार बैठा है। इस बार तो अजमेर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष शिव शंकर हेडा उनकी टिकट में बड़ी बाधा बन कर आ सकते हैं। उन्होंने भी अपनी सेना सजाना शुरू कर दिया है। इस प्रकार शहर भाजपा में तीन गुट हो गए हैं। खींचतान इतनी है कि शहर भाजपा अध्यक्ष बदलने तक का फैसला अटका हुआ है। कुल मिला कर गुटबाजी इतनी चरम पर पहुंच गई है कि सुलह होना नामुमकिन है। भाजपा हाईकमान इस बात से बेखबर नहीं है। हाल ही स्वायत्त शासन मंत्री श्रीचंद कृपलानी भी हालात देख कर गए हैं। ऐसे में भाजपा को यह अच्छी तरह से समझ आ गई होगी कि अगर दोनों सीटें जीतनी हैं तो दोनों मौजूदा विधायकों के टिकट काटने ही होंगे। चुनाव अभी दूर हैं। इस बीच अगर कोई सुलह हो पाती है तो ठीक, वरना इन दोनों को टिकट देने से पहले हाईकमान को गंभीरता से विचार करना होगा। ऐसा नहीं है कि भाजपा संगठन या कार्यकर्ता कमजोर हुआ है, आज भी भाजपा अजमेर में मजबूत स्थिति में है, जातीय समीकरण के लिहाज से और मोदी फोबिया के कारण, मगर केवल गुटबाजी पार्टी को लेकर बैठ सकती है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

सोमवार, 15 मई 2017

देवनानी व हेडा के बीच झूल रहा है एलीवेटेड रोड

काल्पनिक एलीवेटेड रोड
इसे अजमेर का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जिस एलीवेटेड रोड की अजमेर को सख्त जरूरत है, उसको लेकर अजमेर में भाजपा के दो दिग्गज शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी व अजमेर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष शिवशंकर हेडा खींचतान कर रहे हैं। चूंकि एलीवेटेड रोड बनाना या न बनाना सीधे-सीधे प्राधिकरण के क्षेत्राधिकार में है, इस कारण देवनानी का दबाव में काम नहीं कर रहा।
ज्ञातव्य है कि गत दिवस स्वायत्तशासन मंत्री श्रीचंद कृपलानी अजमेर आए तो एक समारोह के दौरान देवनानी ने जोर दे कर कहा कि एलीवेटेड रोड शहर की जरूरत है और इसके लिए खुद मुख्यमंत्री भी तैयार हैं। देवनानी के अनुसार सीएम ने तो यहां तक कहा है कि हुडको से इसके लिए लोन लिया जा सकता है, मगर कुछ लोगों की दुकानें इसमें बाधा बन रही है।
इस मांग को सिरे से खारिज करते हुए जवाब में हेडा ने कहा कि सड़क की चौड़ाई कम होने के कारण एलीवेटेड रोड बनाना उचित नहीं होगा और उनकी इस बारे में मुख्यमंत्री से बात हो चुकी है। इसके बदले वैकल्पिक रोड के रूप में पालबीचला वैकल्पिक मार्ग बनाया जा रहा है। जल्द ही कानूनी बाधा दूर कर ली जाएगी।
सवाल ये उठता है कि एक ही मुद्दे पर मुख्यमंत्री की राय भिन्न-भिन्न नेताओं के साथ भिन्न-भिन्न राय कैसे हैï? क्या दोनों में एक झूठ बोल रहा है? ऐसा प्रतीत होता है कि मुख्यमंत्री को अजमेर की स्थानीय जरूरत का गहराई से अनुमान ही नहीं है। जब देवनानी उनसे मिल कर जोर देते हैं तो वे सहमति जता देती हैं और जब हेडा कोई कारण गिना कर उसे अनुपयुक्त बताते हैं तो भी सहमति दे देती हैं। मगर इन दोनों की इस मतभिन्नता के चलते अजमेर एलीवेटेड के अभाव को भुगत रहा है। ऐसा लगता है कि हेडा की रुचि इस कारण नहीं है कि यह प्रोजेक्ट काफी बड़ा है और इसके पूरा होने से पहले ही उनका कार्यकाल खत्म हो जाएगा और भविष्य में जो भी एडीए चेयरमैन होगा, वह के्रडिट लेगा। इसके अतिरिक्त शायद उन्होंने मुख्यमंत्री को सलाह दी हो कि यदि अभी इस पर काम किया तो चुनाव के आते-आते खुदाई आदि के कार्य के कारण पूरा शहर तकलीफ पाएगा और उसका नुकसान चुनाव में हो सकता है।
असल में एलीवेटेड रोड के लिए सर्वे का काम तो कांग्रेस शासनकाल में तत्कालीन न्यास चेयरमैन नरेन शहाणी भगत के दौरान ही हो गया, मगर वे बीच में ही हट गए। बाद में नई भाजपा सरकार आई तो एडीए सरकारी अफसरों के हवाले था। उन्होंने कोई रुचि नहीं ली। कोई दो साल बाद अध्यक्ष की नियुक्ति हो पाई। अगर सरकार के गठन के वक्त ही अध्यक्ष नियुक्त कर दिया जाता तो वह पूरी क्रेडिट लेने के लिए तीन साल में उसे पूरा करवाने का प्रयास करता।
खैर, अब जब कि हेडा ने इसे सिरे से ही खारिज कर दिया है तो उम्मीद करना व्यर्थ है। हां, इतना जरूर है कि आज नहीं तो कल एलीवेटेड रोड बनाना ही होगा। तब उसकी लंबाई भी बढ़ानी पड़ेगी।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

कृपलानी की फटकार से कौने से सुधर जाएंगे अजमेर के भाजपा नेता

अजमेर को तीन लोक से मथुरा न्यारी की संज्ञा दी जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। वो इसलिए कि जो भाजपा तथाकथित रूप से सर्वाधिक अनुशासित दल कहलाता है, उसी में अनुशासनहीनता और गुटबाजी चरम पर है। मीडिया तो इस बारे में लिख-लिख कर थक चुका, अब बाहर के नेता आ कर फटकारने लगे हैं, फिर भी उम्मीद नहीं कि स्थानीय नेता सुधरेंगे।
ज्ञातव्य है कि स्वायत्त शासन मंत्री श्रीचंद कृपलानी जब यहां जनाना अस्पताल रोड तिराहे पर आयोजित शिलान्यास व लोकार्पण कार्यक्रम में आए तो देखा कि स्थानीय मंत्री व नेता उनके सामने ही मंच पर उलझ रहे हैं। उन्होंने कई बार सबको शांत करने का प्रयास किया, लेकिन पदाधिकारी अपना गुबार निकालते रहे। उन्होंने यहां तक कहा कि अजमेर के भाजपा नेता एक हो जाएं तो यहां की पहचान ब्रह्मांड में हो जाए। यह कम शर्मनाक बात नहीं है कि जिस वक्त उन्होंने ऐसा कहा तब मंच पर शिक्षा राज्यमंत्री वासुदेव देवनानी एवं महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री अनिता भदेल, संसदीय सचिव सुरेश रावत, राज्य किसान आयोग के अध्यक्ष सांवरलाल जाट, शहर भाजपा अध्यक्ष अरविंद यादव और अजमेर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष शिवशंकर हेड़ा मौजूद थे। हालांकि उन्होंने मजाकिया लहजे में ही कहा कि मंच पर बैठे ये सभी मेरे साले और सालियां हैं, मैं अजमेर का दामाद हूं, मगर कोई नेता अपनी स्थानीय रिश्तेदारी के बहाने दामाद का रौब दिखा जाए, यह कम अफसोसनाक नहीं।
उल्लेखनीय है कि अजमेर में भाजपा वासुदेव देवनानी एवं अनिता भदेल के गुटों में बंटी हुई है। अब तो आगामी विधानसभा चुनाव में अजमेर उत्तर से टिकट हासिल करने की ख्वाहिश रख कर शिव शंकर हेड़ा भी मजबूत होने लगे हैं। इन गुटों में खींचतान इतनी चरम पर है कि बड़े नेता एक दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते। निष्ठावान भाजपा कार्यकर्ता इसका कितना नुकसान उठा रहे हैं, यह उनका मन ही जानता है। इतना ही नहीं इस गुटबाजी के कारण शहर के विकास में भी बाधाएं आती हैं, मगर इसे दूर करने की ताकत किसी बड़े नेता में नहीं। इस बार कृपलानी फटकार गए, मगर उम्मीद कम ही है कि गुटबाजी तनिक भी कम हो पाएगी।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

शनिवार, 13 मई 2017

देवीशंकर भूतड़ा कर रहे हैं चुनाव लडऩे की तैयारी

ब्यावर के पूर्व विधायक देवीशंकर भूतड़ा की आगामी विधानसभा चुनाव लडऩे की प्रबल इच्छा है। इसका संकेत मिलता है फेसबुक पर उनकी ओर से की गई पोस्ट, जिसमें वे बताते हैं कि उन्होंने अपने कार्यकाल में कितना कार्य करवाया, चाहें तो उसकी तुलना पिछले आठ साल से कर लीजिए।
आइये, जरा उनकी पोस्ट पर नजर डाल लें:-
प्रिय मित्रों,
लगभग आठ वर्ष पूर्व मुझे ब्यावर विधायक के रूप में कार्य करने का सौभाग्य मिला, तो मैने प्रयास किया कि जन-जन की आकाक्षाओं को पूर्ण करूं। क्षेत्र की आधारभूत बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा, चिकित्सा व सफाई जैसी समस्याओं का समाधान करते हुए ब्यावर की बहुत पुरानी मांग जल व जिले के लिये ठोस कार्य कर परिणाम ला सकूं। साथ ही मगरे के विकास हेतु विशेष दर्जा व पर्यटन की दृष्टि से राजस्थान के नक्शे पर ला सकूं। ताकि मगरे का तीव्र गति से विकास हो सके। मैने समस्याओं के समाधान व विकास के लिये हर सम्भव प्रयास करने के साथ ही ब्यावर विधानसभा क्षेत्र को सिंचाई, पर्यटन व सोन्दर्यीकरण की दृष्टि से भी उभारने का प्रयास किया।
मित्रों पिछले 8 वर्षों से ब्यावर के जो हालात हैं, उससे ब्यावर का आमजन परिचित है। उपरोक्त हालतों पर जब हम यदा कदा बोलते हैं तो अनेक युवा बंधुजन बोलते आप भी तो रहे, आप ने क्या किया, तब मुझे लगता है कि मैने उस समय जो किया या कर सका उस समय कि मीडिया कवरेज द्वारा मेरे पास उपलब्ध सामग्री है, उसे मैं आप को शेयर करूं, ताकि आप ठीक से वे पांच वर्ष व अभी के 8 वर्ष से अधिक के कार्यकाल का आंकलन कर अपनी राय व्यक्त कर सकें।
भूतड़ा की इस पोस्ट से साफ है कि वे मौजूदा भाजपा विधायक शंकर सिंह रावत के कार्यकाल को नकारा बता रहे हैं। इसके विपरीत अपने कार्यकाल को बेहतर मानते हैं। यानि कि वे जनता के संज्ञान में अपनी उपलब्धियां ला कर भाजपा हाईकमान पर दबाव बनाना चाहते हैं कि इस बार उन्हें मौका दिया जाए।
यहां आपको बता दें कि ब्यावर की राजनीति बड़ी उलझी हुई है। गांवों में रावत मतदाताओं का बाहुल्य है, इसके अतिरिक्त शहर के भाजपा मानसिकता के वोट भी मिलते हैं, इस कारण भाजपा का रावत प्रत्याशी आसानी से जीत जाता है। हालांकि पेच ये है कि शहर का आम मतदाता रावत प्रत्याशी को पसंद नहीं करता, मगर उसकी ताकत कम होती है। इसके अतिरिक्त अमूमन त्रिकोणीय मुकाबले होते हैं, इस कारण रावत प्रत्याशी भारी पड़ जाता है।
बात अगर शंकर सिंह रावत की करें तो उन्होंने ब्यावर को जिला बनवाने के लिए खूब मशक्कत की, आंदोलन तक किया, मगर वह हाईकमान को रास नहीं आया। इस कारण चुप हो कर बैठ गए। उन्हें डर रहा कि अगर हाईकमान नाराज हो गया तो तीसरी बार टिकट नहीं मिल पाएगा।
बताते हैं कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे उनसे प्रसन्न नहीं हैं। इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि लगातार दो बार जीतने के बाद भी उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया। संसदीय सचिव बनने की बारी आई तो भी पहली बार जीते पुष्कर विधायक सुरेश रावत को मौका मिला। देखते हैं आगामी विधानसभा चुनाव भाजपा किस जातीय समीकरण के तहत प्रत्याशी तय करती है। वैसे रावत के टिकट पर संकट तो माना जा रहा है। कदाचित भूतड़ा इसी वजह से उम्मीद पाले हुए हों।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

शुक्रवार, 12 मई 2017

अगर गैर सिंधी का प्रयोग हुआ तो गहलोत होंगे नंबर वन

कानाफूसी है कि अव्वल तो शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी का टिकट कटने का कोई कारण तो नजर नहीं आता, उनकी चुनावी तैयारी भी पूरी है, मगर बावजूद इसके इस बार भी गैर सिंधी दावेदार टिकट जरूर मांगेंगे। उसके लिए अंडरग्राउंड बाकायदा तैयारी चल रही है।
बताते हैं कि अजमेर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष शिवशंकर हेडा आगामी चुनाव में टिकट के लिए गणित बैठा रहे हैं। इसी प्रकार अजमेर नगर परिषद के पूर्व सभापति सुरेन्द्र सिंह शेखावत भी भाजपा में लौट कर टिकट की ख्वाहिश रखते हैं। पिछले बार तो बहुत दमदार तरीके से उभर कर आए थे। अजमेर नगर निगम के मेयर धर्मेन्द्र गहलोत पर किसी की नजर नहीं है, मगर अंदर का सच ये है कि उनकी भी पूरी तैयारी है। उन्होंने पिछले दिनों मजाक मजाक में पार्टी कार्यकर्ताओं के एक स्नेह मिलन में इसका इशारा भी किया। उनके लिए माली समाज गुपचुप लामबंद हो रहा है, जो कि प्रो-बीजेपी माना जाता है। मालियों के वोट विशेष रूप से अजमेर दक्षिण में हैं, जो कि महिला व बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल की लगातार तीन बार जीत में अहम भूमिका अदा कर चुके हैं। उनके ही दम पर गहलोत प्रबल दावेदार बन जाएंगे। बस फर्क ये है कि वे खुल कर टिकट मांगने की स्थिति में नहीं हैं, क्योंकि वे देवनानी के प्रमुख सेनापति हैं। उनके सामने टिकट मांगना नैतिकता के लिहाज से उपयुक्त नहीं होगा। मगर इतना तय है कि अगर देवनानी का टिकट कटा और कोई और सिंधी दावेदार समझ में नहीं आया तो हो सकता है कि इस बार भाजपा गैर सिंधी का प्रयोग करे। इसके पीछे भाजपा की यह सोच भी हो सकती है कि सिंधी मतदाता तो उसकी जेब में है, वो कहां जाएगा। अगर ऐसा हुआ तो स्वाभाविक रूप से देवनानी गहलोत को ही सपोर्ट करेंगे। इसके अतिरिक्त संघ भी गहलोत का साथ देगा। कदाचित मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को गहलोत पसंद न भी हों, मगर अजमेर उत्तर की सीट का फैसला तो संघ ही करेगा। हेडा भी वैश्य समाज के दम पर टिकट मांगेंगे, मगर उनकी तुलना में गहलोत को अधिक ऊर्जावान होने का लाभ मिल सकता है। कोशिश तो शेखावत भी कम नहीं करेंगे, मगर संघ उनका साथ देगा, इसमें संदेह है। इसके अतिरिक्त अजमेर भाजपा के भीष्मपितामह रहे औंकार सिंह लखावत भी आड़े आएंगे। उनका पुराना हिसाब किताब है। लखावत के पुत्र उमरदान लखावत जब जीसीए छात्र संघ के अध्यक्ष का चुनाव लड़ रहे थे तो शेखावत ने अलग संगठन के बैनर पर प्रत्याशी उतारा, नतीजतन उमरदार हार गए। जब जब शेखावत का जिक्र आता है तो उनके विरोधी वह किस्सा उठा कर ले आते हैं। खैर, गैर सिंधियों में और भी कई दावेदार हो सकते हैं, मगर प्रमुख रूप से तीन ही हैं। कुछ ब्राह्मण भी दावेदार बन कर उभर सकते हैं। औरों का जिक्र करके उन्हें अनावश्यक रूप से दावेदारों की सूची में लाना प्रायोजित माना जाएगा।

बुधवार, 10 मई 2017

धर्मेश जैन को भुला दिया शिवशंकर हेडा ने

धर्मेश जैन
राजनीति में आदमी कितनी संकीर्ण मानसिकता तक जा सकता है, इसका उदाहरण पेश किया है अजमेर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष शिवशंकर हेडा ने। उन्होंने अजमेर में महाराणा प्रताप स्मारक की परिकल्पना करने और उसका शिलान्यास करवाने वाले अपनी ही पार्टी के पूर्व नगर सुधार अध्यक्ष धर्मेश जैन को महाराणा प्रताप जयंती पर होने वाले कार्यक्रम से पूरी तरह से अलग-थलग करने की कोशिश की है। सच तो ये है कि उन्होंने शिलान्यास से लेकर पिछले साल तक हर वर्ष जयंती मनाने वाली समिति पर ही कब्जा कर लिया है। इतना सामान्य शिष्टाचार तक नहीं रखा कि जैन को जयंती समारोह मनाने के लिए एडीए में आयोजित बैठक में बुला लेते।
ज्ञातव्य है कि जैन पुष्कर घाटी में नौसर माता मंदिर के पास स्थापित महाराणा प्रताप स्मारक पर हर साल जयंती मनाते हैं। इसके लिए एक समारोह समिति भी बनी हुई है। मगर मूर्ति की स्थापना के बाद पहली बार आ रही जयंती के मौके पर होने वाले समारोह को एडीए ने अपने कब्जे में ले लिया है। हेडा चाहते तो अपने पद की गरिमा रखते हुए उसी समिति को जयंती समारोह मनाने में सहयोग करते, मगर निहित उद्देश्य को लेकर उन्होंने अपनी अध्यक्षता में एडीए में बैठक आयोजित की और तय किया कि महाराणा प्रताप जयंती के मौके पर पूर्व संध्या पर 27 मई को सांस्कृतिक कार्यक्रम व जयंती के दिन 28 मई को वाहन रैली व कवि सम्मेलन आयोजित किया जाएगा। इसके लिए नई समिति की गठन भी किया गया है, जिसमें आनन्द सिंह राजावत, डॉ. अरविन्द शर्मा गिरधर, रासबिहारी गौड़, कंवल प्रकाश, सोमरत्न आर्य, नरेन्द्र सिंह शेखावत, विजय दिवाकर, संदीप भार्गव, रमेश मेघवाल, रामकिशन प्रजापति, प्रियशील हाड़ा, डॉ. सुभाष माहेश्वरी, सी.पी. गुप्ता, देवेन्द्र सिंह शेखावत, रमेश चन्द शर्मा, भगवती बारहठ व संजीव नागर को शामिल किया गया है।
जानकारी के अनुसार गत 6 मई को जैन ने एडीए को पत्र लिख कर जयंती समारोह आयोजित करने की अनुमति देने व हर साल ही तरह सहयोग करने का आग्रह किया है, मगर समझा जाता है कि उस पत्र को रद्दी की टोकरी दिखा दी गई है।
कुल मिला कर यह स्पष्ट है कि हेडा इस स्मारक में जैन के योगदान को पूरी तरह से भुला देना चाहते हैं। इतना तक कि शिलान्यास के वक्त जो शिलापट्ट रखा गया था, उसे भी वहां से हटा दिया गया है, ताकि किसी को यह जानकारी न हो कि इसका शिलान्यास जैन के कार्यकाल में हुआ। राजनीति में अगर एक दल दूसरे दल के साथ ऐसा करे तो भी उसे सदाशयता के विपरीत माना जाता है, मगर एक ही पार्टी के नेता एक दूसरे के साथ ऐसा करें तो अटपटा लगना स्वाभाविक है।
समझा जाता है कि यह मामला यूं ही समाप्त नहीं होगा। जैन इसे पार्टी हाईकमान तक जरूर ले जाएंगे कि किस प्रकार हेडा निहित उद्देश्य के तहत उन्हें नजरअंदाज करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे आमजन में पार्टी के बारे में गलत संदेश जाएगा।
जानकारों का मानना है कि हेडा का साइलेंट एजेंडा आगामी विधानसभा चुनाव में अजमेर उत्तर से भाजपा का टिकट हासिल करना है। और उसी के तहत सारा काम कर रहे हैं। संभव है आगे चल कर गैर सिंधीवाद को लामबंद करने की भी कोशिश करें।
यहां यह बताना प्रासंगिक रहेगा कि पृथ्वीराज चौहान स्मारक और सिंधुपति महाराजा दाहरसेन पर जयंती व पुण्यतिथि पर आयोजित होने वाले कार्यक्रमों के लिए भी समितियां बनी हुई हैं। ये दोनों स्मारक वरिष्ठ भाजपा नेता औंकार सिंह लखावत ने अपने न्यास अध्यक्षीय कार्यकाल में बनवाए। दोनों की समारोह समितियां लखावत की देखरेख में ही कार्य करती हैं, जिसमें एडीए का योगदान रहता है। मगर चूंकि राजनीतिक रिश्ते में लखावत हेडा के पिताजी लगते हैं, इस कारण उन समितियों के छेड़छाड़ तो बहुत दूर, उलटा सहयोग करने को मजबूर हैं। चूंकि जैन का पाया अभी कुछ कमजोर है, इस कारण उनको नजरअंदाज करने की हिमाकत की जा रही है। वैसे एक बात है, ऐसा करके हेडा अपने करीब एक ऐसा दुश्मन पैदा कर रहे हैं, जो उनकी हर गतिविधि पर नजर रखेगा और मौका पड़ते ही वार करेगा।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

सोमवार, 8 मई 2017

शेखावत का भाजपा में आना औपचारिकता भर बाकी

अजमेर नगर परिषद के पूर्व उपसभापति सुरेन्द्र सिंह शेखावत का भाजपा में लौटना औपचारिकता भर बाकी है। समझा जाता है कि जब भी उचित मौका होगा, वे मुख्य धारा में आ जाएंगे। यह आम धारणा बनी हुई है, मगर गत दिवस इसके पुख्ता संकेत फिर मिल गए।
असल में भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं शीर्ष नेता ओमप्रकाश माथुर रविवार को पुष्कर में आयोजित नानी बाई का मायरा की कथा में भाग लेने के लिये आये थे। वे यहां करीब डेढ़ घंटे रुके भी लेकिन स्थानीय भाजपाइयों को इसकी संगठन भनक तक नहीं लगी। बताते हैं कि लखन सरवाडिय़ा समेत दो-तीन भाजपा कार्यकर्ताओं ने उनका स्वागत किया, मगर पार्टी कार्यकर्ता के नाते नहीं। इस मौके पर शेखावत ने भी अपनी उपस्थिति दर्शायी। माथुर के साथ उनके फोटो हितेश वर्मा ने बाकायदा फेसबुक पर शाया किए। सर्वविदित है कि शेखावत माथुर के करीबी हैं। पिछले दिनों शहर भाजपा अध्यक्ष अरविंद यादव की ओर से माथुर के स्वागत के लिए आयोजित समारोह में भी वे खुल कर मौजूद थे।
हालांकि एक वर्ग का मानना है कि अगर उन्हें अजमेर उत्तर से भाजपा का टिकट नहीं मिला तो निर्दलीय चुनाव लड़ेंगे, मगर नेगोसिएशन कर भाजपा में लौटना भी उनके लिए कठिन नहीं होगा।
ज्ञातव्य है कि पिछले कुछ समय से ऐसी अफवाहें उड़ रही हैं कि माथुर को वसुंधरा राजे की जगह मुख्यमंत्री बनाया जाएगा। इस सिलसिले में पुष्कर के पत्रकारों ने उनसे सवाल किया तो ऐसी अटकल को यह कहते हुये खारिज कर दिया कि अभी उनके पास केंद्र का दायित्व है।

शुक्रवार, 5 मई 2017

हवाई अड्डे के नाम पर छिड़ी बहस ने कर दी गंदगी

जैसी कि आशंका थी वही हुआ। किशनगढ़ में स्थापित हवाई अड्डे के नाम को लेकर बहस ने गंदगी कर दी। राजस्थान पत्रिका ने तो स्वस्थ बहस के मकसद से नाम सुझाने का सर्वे आरंभ किया, मगर हुआ इसका उलटा। सोशल मीडिया पर यह बहस बाकायदा सांप्रदायिक रूप लेती दिखाई दे रही है। कितनी अफसोसनाक बात है कि तीर्थराज पुष्कर व ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह को अपने आचंल में समेटे जो अजमेर नगरी दुनिया में सांपद्रायिक सौहाद्र्र की मिसाल के रूप में जानी जाती है, जो जिला पूरे उत्तर भारत में प्रथम संपूर्ण साक्षर जिला होने का गौरव हासिल कर चुका है, वहीं पर एक स्थान का अदद नाम रखने को लेकर खुली सांप्रदायिक प्रतिस्पद्र्धा हो रही है। इंटरनेट पर चल रही पोलिंग में कोई ख्वाजा गरीब नवाज के नाम पर तो कोई सम्राट पृथ्वीराज चौहान के नाम पर वोट करने को कह रहा है। कोई तीर्थराज पुष्कर का नाम सुझा रहा है तो कोई सिंधुपति महाराजा दाहरसेन के नाम पर नामकरण करने को कह रहा है। एक पोल में तो तेजाजी का नाम ही सबसे पहले रखा गया है। कहीं पृथ्वीराज चौहान नाम की पैरवी करने वाले मोहम्मद गौरी को याद कर रहे हैं तो कहीं महान सूफी संत ख्वाजा साहब को ही इस्लाम का प्रचारक बता कर विरोध हो रहा है। समझा जा सकता है कि पूरी बहस ने जातिवादी व सांप्रदायिक रूप ले लिया है। हालांकि जितने भी नाम सुझाए जा रहे हैं, वे किसी न किसी दृष्टि से अच्छे ही हैं, बुरा कोई नहीं, मगर नामकरण को लेकर जिस प्रकार की गंदी बहस हो रही है, वह अजमेर में अमन-चैन के लिए शुभ संकेत नहीं है।
हालांकि पोल किसी कानूनी मान्यता के दायरे में नहीं आते और उनका निष्कर्ष किसी भी प्रकार से बाध्य नहीं करता। पोल की वेबसाइट पर ही लिखा है कि इसमें त्रुटियां संभव हैं और यह सिर्फ मनोरंजन के लिए है, मगर इससे अगर सामाजिक विद्वेष पैदा होता है तो वह चिंताजनक है और उस पर प्रशासन को नजर रखनी ही चाहिए।
पत्रिका की ओर से किया जा रहा सर्वे एक अर्थ में अच्छा था, मगर स्वस्थ मानसिकता वालों के लिए, मगर उस सर्वे की पहल के कारण सोशल मीडिया पर जो गंदी बहस छिड़ी, उस लिहाज अच्छा नहीं रहा। मगर उससे एक फायदा ये हुआ कि इसी बहाने समाज के भीतर लोग किस प्रकार बंटे हुए हैं, वह सामने आ गया। इस बहस ने हमें अपना आइना दिखा दिया है कि हमारे पर चेहरे पर कितने दाग हैं। यदि बिना बहस के सरकार के स्तर पर किसी महापुरुष के नाम पर नामकरण कर दिया जाता तो उसे कदाचित सभी स्वीकार कर भी लेते, मगर अब गंदी बहस होने के बाद सरकार के लिए भी दुविधा हो गई होगी। यह एक स्वाभाविक सी बात है कि हर जगह राजनीति होती है। सत्ता बदलने पर पहले से किए गए नामकरण तक बदल दिए जाते हैं। इसको लेकर कई बार विवाद भी होता है। ऐसे विवादों से बचने का एक ही रास्ता है कि केवल उन्हीं नामों पर विचार हो, जो कि सर्वमान्य हो सकते हों। अगर स्थान के नाम को लेकर भी विवाद होता है तो स्थान के ऐसे नाम  पर सहमति बननी चाहिए, जिस पर किसी को काई ऐतराज होने की गुंजाइश न रहे।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

भगवान परशुराम को विनयांजलि देने पर भी शांत नहीं हुए ब्राह्मण बंधु

ब्राह्मण समाज के बारे में शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी की कथित टिप्पणी को लेकर आंदोलनरत ब्राह्मणों को खुश करने के लिए देवनानी ने परशुराम जयंती के मौके पर ही ऐलान कर दिया कि स्कूली बच्चों को भगवान परशुराम के बारे में पढ़ाया जाएगा। मगर इसके बावजूद आंदोलनकारी ब्राह्मण शांत नहीं हुए हैं। अपितु वे इसे राजनीतिक जुमला करार दे रहे हैं और ये सवाल भी कर रहे हैं कि परशुराम जी की याद आज ही आनी थी क्या? उन्होंने समानांतर कार्यक्रम करने की भी निंदा की।
ज्ञातव्य है कि आंदोलनरत ब्राह्मणों के अपने आराध्य देव भगवान परशुराम जयंती के मौके पर और उग्र होने की आशंका थी। ऐसे में संघ ने तोपदड़ा में भारतीय शिक्षा मंडल अजमेर महानगर चितौड़ प्रांत के बैनर पर परशुराम जयंती का आयोजन किया, जिसमें देवनानी को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया गया, ताकि यह संदेश नहीं जाए कि परशुराम जयंती के मौके पर समाज ने उन्हें अलग-थलग कर दिया। इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में संघ के नेता व जाने-माने व्यवसायी सुनीलदत्ता जैन थे, जबकि अध्यक्षता प्रसिद्ध शिक्षाविद् डॉ. बद्रीप्रसाद पंचोली ने की। इसी आयोजन में विप्र फाउंडेशन युवा मंच शहर जिला अध्यक्ष श्याम कृष्ण पारीक और सभी पदाधिकारियों ने देवनानी से मुलाकात कर भगवान परशुराम का अध्याय पाठ्यक्रम में शामिल करने का आग्रह किया, जिसे देवनानी तत्काल ने स्वीकार कर लिया। इस पर विप्र फाउंडेशन युवा मंच शहर जिला अजमेर ने उनका आभार जताया। वाकई यह एक बड़ी घोषणा है, जिससे यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि देवनानी का ब्राह्मणों के प्रति कोई दुराग्रह नहीं है, इसी कारण उनके आराध्य देव भगवान परशुराम के बारे में एक पाठ स्कूलों में पढ़ाने की मांग को मान लिया है। इस घोषणा के लिए मौका भी भगवान परशुराम जयंती का चुना गया। ऐसा लगता है कि यह सब पूर्व नियोजित था।
बहरहाल, जैसे ही यह खबर इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिए प्रकाश में आई तो सोशल मीडिया पर भी छा गई। हालांकि त्वरित टिप्पणी में आंदोलन से जुड़े नेताओं ने अपने ही समाज के कुछ साथियों के इस कृत्य को अन्यथा लिया और उनके बारे में कई तरह की टिप्पणियां की जा रही हैं और आंदोलन को और तेज करने की बात कर रहे हैं, मगर देवनानी का यह पैंतरा काम भी कर सकता है। एक प्रकार से उन्होंने ठंडे छींटे डालने की कोशिश की है।
इतना ही नहीं उन्होंने परशुराम जयंती के मौके पर एक संदेश भी जारी कर मामले का डाइल्यूट करने की कोशिश की है। संदेश में लिखा है कि अन्याय, अत्याचार पर न्याय और सदाचार की विजय के प्रतीक, शस्त्र और शास्त्र का समुचित समय पर सटीक उपयोग का संदेश देने वाले भगवान परशुराम के जन्मोत्सव पर सभी न्याय के पक्षधर मेरे अपनों को अनेकानेक शुभकामनाएं। अक्षय तृतीया का भी संदेश साफ है। समाज भी अक्षय रहे। भगवान श्री परशुरामजी पीडि़त मानवता को समर्थ बनायें और न्याय के लिए हमें लङने में सक्षम बनायें यहीं उनके श्री चरणों में प्रार्थना है।
देवनानी को उम्मीद होगी कि इससे कम से कम गुस्से की तीव्रता में कमी तो आ ही जाएगी, बाकी तो आगे भगवान मालिक है कि अपने विशिष्ट स्वभाव वाले भगवान परशुराम को मानने वालों का गुस्सा कब शांत होगा?
-तेजवानी गिरधर
7742067000

तो अब किशनगढ़ एयरपोर्ट के उद्घाटन की जरूरत कहां है?

लो जी, अजमेर जिले की बहुप्रतीक्षित व महत्वाकांक्षी किशनगढ़ एयरपोर्ट का शुभारंभ हो गया है। संसदीय सचिव सुरेश रावत व किशनगढ़ भाजपा विधायक भागीरथ चौधरी ने दिल्ली से यहां आए निजी कंपनी के चार्टर प्लेन को बाकायदा हरी झंडी दिखाई। इन दोनों नेताओं का नाम अजमेर के इतिहास में सदा के लिए स्वर्णाक्षरों में दर्ज हो गया है। इनकी तो बल्ले बल्ले हो गई। जिले के ही राज्य किसान आयोग के अध्यक्ष प्रो. सांवरलाल जाट, राजस्थान पुरा धरोहर संरक्षण प्राधिकरण के अध्यक्ष औंकार सिंह लखावत, शिक्षा राज्यमंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी, महिला व बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल, संसदीय सचिव शत्रुघ्न गौतम सरीखे नेता ये सोच रहे होंगे कि उनके होते, और उनके बिना रहते हरी झंडी फहरा दी गई।
कैसी विचित्र बात है कि इस एयरपोर्ट का औपचारिक व विधिवत शुभारंभ हुआ नहीं है, महज एक प्राइवेट कंपनी का ट्रायल चार्टर प्लेन आया था, मगर उसका स्वागत कुछ इस तरह से हुआ, मानो इसी के साथ हवाई अड्डों की दुनिया में अजमेर भी शुमार हो गया है। जबकि हकीकत ये है कि इससे पहले भी चार्टर प्लेन लैंड कर चुके हैं।
हालांकि यह पूरा घटनाक्रम हुआ कैसे, यह अभी गुत्थी ही है, मगर सोशल मीडिया पर दोनों जनप्रतिनिधियों ने बधाइयां बटोर लीं। वहां रावत बोले कि किशनगढ़ एयरपोर्ट को जो सपना देखा था, वह आज पूरा हो गया, जल्द ही एयरपोर्ट से नियमित विमान सेवाएं शुरू होगीं। मानो वह सपना उन्होंने ही देखा था। उन्होंने ही पूरा करवाया। जब कि सच ये है कि यह सपना सबसे पहले सिटीजंस कौंसिल के अध्यक्ष व दैनिक नवज्योति के प्रधान संपादक दीनबंधु चौधरी ने देखा था। बसरों तक राज्य व केन्द्र सरकार के साथ चि_ी पत्री करते रहे। मगर आखिर तभी साकार होने की दिशा में कदम बढ़ा जब पूर्व केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट ने रुचि ली। बेशक अब जब कि यह एयरपोर्ट नियमित रूप से शुरू होने के मुकाम पर आया है तो इसका श्रेय भाजपा ही लेना चाहेगी। ऐसा होता रहा है। एक सरकार कोई योजना शुरू करवाती है और दूसरी पूरा करवाती है तो श्रेय दूसरी ही लेती है।  मगर हरी झंडी दिखाने का गौरव तो रावत व चौधरी ने ही हासिल किया।
खैर, सच्चाई ये है कि इस एयरपोर्ट से नियमित व्यावसायिक उड़ानें अगस्त माह से शुरू होंगी, जिसका विधिवत शुभांरभ करने केन्द्र का कोई बड़ा नेता यथा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व राज्य की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे आनी चाहिए। बड़ा जलसा होना अपेक्षित है। मगर अब जबकि संसदीय सचिव रावत व विधायक चौधरी एक प्राइवेट कंपनी के चार्टर प्लेन को हरी झंडी दिखाने वहां पहुंच चुके हैं तो सवाल उठता है कि क्या यहां फिर से हरी झंडी दिखाने की रस्म की जरूरत रह गई है?
ऐसा प्रतीत होता है कि यह सब मीडिया का किया धरा है। उसी ने एक सामान्य सी खबर को इतना बढ़ा चढ़ा कर पेश किया कि ऐसा प्रतीत होने लगा कि मानो शुभारंभ होने जा रहा है।
बहरहाल, रावत व चौधरी को बधाई।

-तेजवानी गिरधर
7742067000

गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

क्या हाईकोर्ट को दिखाने भर के लिए बना अतिक्रमण हटाओ अभियान?

हाईकोर्ट के आदेश से शहर में अतिक्रमण हटाए जाने के लिए बनाए गए कार्यक्रम के पहले दिन ही नगर निगम का जो रवैया नजर आया, उसको लेकर निगम की खूब छीछालेदर हुई। जाहिर सी बात है कि जिन अफसरों पर अतिक्रमण हटाने की जिम्मेदारी थी, वे ही सरकारी दौरे पर दिल्ली चले गए तो आलोचना होनी ही थी। हार्टकोर्ट के आदेश की पालना में निगम के गंभीर नजर नहीं आने का सवाल भी उठा। अभियान का तो जो हश्र होना था, वह भी हुआ। उसका बखान करना बेकार है।
ज्ञातव्य है कि आगामी 30 अप्रैल को निगम को हाईकोर्ट में शपथ पत्र दे कर बताना है कि अतिक्रमण हटाने के उसके आदेश की अनुपालना कर दी गई है। अर्थात निगम पर ये दबाव था कि वह किसी भी तरह से अतिक्रमण हटाने के लिए बाकायदा अभियान चलाए। अभियान के लिए कार्ययोजना भी बनाई गई और दो जोन बना कर जिम्मेदारी भी तय की गई। शहर में जहां दुकानदारों में खलबली थी तो नगर वासियों में संतोष था कि आज तगड़ी कार्यवाही होगी और यातायात सुगम होगा। मगर हुआ ये कि दक्षिण जोन की प्रभारी उपायुक्त ज्योति ककवानी अपना कार्यभार उपायुक्त गजेन्द्र सिंह रलावता को सौंप कर दिल्ली चली गईं। साथ में प्रभारी अधिकारी रेखा जेसवानी और असेसर नीलू गुर्जर को ले गईं। उन्हें वहां स्मार्ट सिटी के लिए आयोजित कार्यशाला में हिस्सा लेना था। उत्तर जोन की स्थिति ये थी कि जोन प्रभारी पवन मीणा की छुट्टी पहले से ही मंजूर की हुई थी। एक दिन के लिए जैसे तैसे बुलाया गया, मगर रवैया टालमटोल वाला ही रही। समझा जा सकता है कि ऐसे में अतिक्रमण हटाने का जो हल्ला मचाया गया था, उसकी हवा तो खुद निगम के ही अधिकारी निकाल चुके थे।
सवाल ये उठता है कि जब तीन अधिकारी दिल्ली जाने थे और एक ने छुट्टी ले रखी थी तो अतिक्रमण हटाने का कार्यक्रम तय ही क्यों किया गया? ऐसा तो था नहीं कि कार्यक्रम तय होने के बाद अचानक रात में दिल्ली से न्यौता आया। जरूर पहले से सूचना या जानकारी रही होगी। बावजूद इसके मीडिया के जरिए ढि़ंढ़ोरा पीटा गया कि बुधवार को शहर को दो जोन में बांट कर बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हटाए जाएंगे। ऐसा प्रतीत होता है कि यह सब हाईकोर्ट के संज्ञान में लाने के लिए सायास किया गया, ताकि यदि आधी अधूरी कार्यवाही पर फटकार लगे तो बताया जा सके कि निगम तो तय समय में अतिक्रमण हटा देता, मगर अचानक नई परिस्थिति पैदा हो गई।
जहां तक अतिक्रमण हटाओ अभियान तय होने के बाद भी अधिकारियों के दिल्ली जाने का मसला है तो यह सही है कि दिल्ली जाना ज्यादा जरूरी था। अतिक्रमण तो कभी भी हट सकता है, एक-दो दिन देर से ही सही, मगर स्मार्ट सिटी के लिए दिल्ली में होने वाली कार्यशाला अजमेर के लिए तो टल नहीं सकती थी। कार्यशाला में न जाने पर अधिकारी जरूरी जानकारियों से वंचित रह जाते, साथ ही ऊपर से भी अनुपस्थिति पर खिंचाई हो सकती थी।
अजमेर के लिए जितना जरूरी स्मार्ट सिटी योजना है, उतना ही जरूरी अतिक्रमण हटाना भी है, दोनों को अंजाम भी इन्हीं अधिकारियों को देना है, तो बेहतर ये है कि तालमेल बैठा कर कार्ययोजना बनाई जाए।
हाईकोर्ट की बात छोडिय़े, निगम की खुद की ही जिम्मेदारी है कि अतिक्रमण हटाए, उसके लिए हाईकोर्ट को क्यों दखल देना पड़े? अव्वल तो अतिक्रमण होने ही नहीं देना चाहिए, मगर सच्चाई क्या है, इस बारे में ज्यादा खुलासा करने की जरूरत नहीं है। सब कुछ मिलीभगत से होता है। फिर जब समस्या बेहद गंभीर हो जाती है तो अतिक्रमण हटाने के लिए अभियान की जरूरत पड़ती है। अगर निगम शहर को वाकई अतिक्रमण से मुक्त करना चाहता है तो उसे बाकायदा योजनाबद्ध तरीके से अभियान चलाना होगा। इतना ही नहीं, उसकी आगे भी मॉनिटरिंग करते रहनी होगी, ताकि फिर अतिक्रमण न होने पाए।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

जवाहरलाल नेहरू अस्पताल में पोपाबाई का राज?

जहां कहीं भारी अव्यवस्था होती है, अराजकता होती है, उसके लिए आम तौर पर राजस्थान में एक शब्द का इस्तेमाल होता है- पोपाबाई का राज। ये पोपाबाई कौन थी, उनका राज इतिहास के किस कालखंड में था, इसके बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है, मगर ये कहावत बनी है तो जरूर इसके कोई मायने होंगे। बीते दिन संभाग के सबसे बड़े अस्पताल जवाहर लाल नेहरू अस्पताल में संभाग के सबसे आला अफसर हनुमान सहाय मीणा ने खुद जो हालात देखे, तो यही पाया कि वहां न तो भाजपा का राज है और न ही उनके प्रशासन का कोई डर, यानि कि वहां पोपाबाई का राज है।
जिस संभाग मुख्यालय पर दो-दो मंत्री रहते हों, एक राज्य स्तरीय प्राधिकरण अध्यक्ष का निवास हो, जिस जिले का जनप्रतिनिधि राज्य स्तरीय आयोग का अध्यक्ष और जहां से दो-दो संसदीय सचिव प्रतिनिधित्व करते हों, वहां अगर सबसे प्रमुख अस्पताल में लापरवाही का आलम हो तो यह वाकई शर्मनाक है। जिस जिले का कलेक्टर अपनी कार्यकुशलता और त्वरित निर्णय करने के कारण वाहवाही पा रहा हो, उसकी छत्रछाया में अगर अस्पताल के मासूम बच्चों वाले विभाग में जरूरी सुविधाएं न हों तो इससे ज्यादा अफसोसनाक बात क्या हो सकती है?
अस्पताल प्रशासन कितना बेखौफ है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि संभागीय आयुक्त अस्पताल का दौरा कर रहे हों और वहां बदइंतजामी पसरी रहे। यानि कि आम दिनों में तो और भी हालत खराब रहती होगी। कैसी विडंबना है कि जनप्रतिनिधि और आला अफसर तो ए.सी. का आनंद लेते हैं और मासूम बच्चों के लिए पंखे व कूलर तक ठीक नहीं हैं। शायद 37 डिग्री तापमान में खुद संभागीय आयुक्त पसीने से तरबतर हो गए, तभी उन्हें वहीं की नारकीय स्थिति का अहसास हुआ होगा।
यह ठीक है कि उन्होंने शिशु वार्ड के सभी पंखे व कूलर ठीक करने के निर्देश दिए और आठ एयर कंडीशनर खरीदने पर सहमति जताई, मगर सवाल ये उठता है कि क्या अस्पताल प्रबंधन को खुद को यह ख्याल नहीं आता कि इस प्रकार की व्यवस्था वह अपने स्तर पर करे? अगर फंड का अभाव था तो उसके लिए जिला प्रशासन व सरकार से आग्रह करे। साफ है कि अस्पताल प्रशासन पूरी तरह से लापरवाह है, उसकी नतीजा है कि वहां ड्यूटी देने वाला स्टाफ यूनिफॉर्म में नहीं आता और न ही सफाई ड्यूटीचार्ट ठीक से भरा जाता। न ही शिकायत दर्ज करवाने की उचित व्यवस्था है। ऐसे में आम मरीज को कैसी अव्यवस्थाओं को भोगना पड़ता होगा, इसकी जानकारी कहां इंद्राज होगी। और जब बदइंतजामी की जानकारी रिकार्ड पर ही नहीं होगी तो उसे ठीक भी कौन करेगा?
अस्पताल प्रशासन कैसे आंख मूंद कर वहां की व्यवस्थाओं का संचालन कर रहा है, इसका अंदाजा इसी बात लगाया जा सकता है कि सफाई ठेकेदार ने मनमानी कर रखी है। जब उसको सुविधा होती है, तभी सफाई होती है। कैसा विरोधाभास है, जिस देश में सफाई के लिए राष्ट्रीय अभियान चलाया जा रहा हो, महात्मा गांधी को याद करके हर दफ्तर में सफाई की नौटंकी की जा रही हो। उस पर करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हों। घर-घर से कचरा संग्रहित करने की कवायद की जा रही हो, उसी के सबसे बड़े संभागीय अस्पताल में गंदगी का आलम हो। अरे, कभी गली में सफाई से चूक हो जाए तो समझ में आता है, मगर जहां सफाई पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए, बच्चों के जिस विभाग में सेनिटेशन की सबसे ज्यादा अहमियत होती है, वहीं समय पर कचरा नहीं उठाया जाता। इसका सीधा सा अर्थ है कि आदर्शों की बातें सिर्फ दिखाने के लिए होती हैं, धरातल पर तो सब कुछ पोपाबाई पर छोड़ देते हैं।
-तेजवानी गिरधर
7742067000