शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

कौन होगा प्रो. सांवरलाल जाट का उत्तराधिकारी?

अजमेर लोकसभा सीट से सांसद प्रो. सांवर लाल जाट के निधन से रिक्त हुई सीट के लिए आगामी छह माह के भीतर उप चुनाव कराना संभावित है। ऐसे में भाजपा के लिए उनके जितना ही सशक्त उत्तराधिकारी तलाशना कठिन होगा। उधर कांग्रेस में भी चूंकि यहां के पूर्व सांसद व केन्द्रीय राज्य मंत्री सचिन पायलट प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हैं और मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किए जा रहे हैं, इस कारण वहां भी नया प्रत्याशी तलाशना कठिन टास्क होगा।
जहां तक भाजपा का सवाल है, उसके पास इस वक्त अजमेर जिले से दो राज्य मंत्री, दो संसदीय सचिव, एक प्राधिकरण के अध्यक्ष होने के कारण ऐसा प्रतीत होता है कि उसके पास जिला स्तरीय नेताओं की कोई कमी नहीं है, मगर सच्चाई ये है कि प्रो. जाट के निधन के बाद आगामी संभावित लोकसभा उपचुनाव के लिए सशक्त प्रत्याशी का अभाव है। यह अभाव तब भी था, जब भाजपा ने जाट को नजरअंदाज कर किरण माहेश्वरी को बाहर से ला कर चुनाव लड़वाया था।
ज्ञातव्य है कि स्वर्गीय जाट की रुचि अपने बेटे रामस्वरूप लांबा को नसीराबाद विधानसभा सीट से चुनाव लड़वाने थी, मगर भाजपा ने पूर्व जिला प्रमुख श्रीमती सरिता गेना को मैदान में उतारा, मगर वे हार गईं। उन्हें भी आगामी उपचुनाव में एक दावेदार माना जा सकता है, मगर चूंकि वे विधानसभा चुनाव हार चुकी हैं, इस कारण लगता नहीं कि भाजपा उन पर दाव खेलेगी। अजमेर डेयरी अध्यक्ष व प्रमुख जाट नेता रामचंद्र चौधरी जरूर भाजपा के खेमे में हैं, मगर अभी उन्होंने भाजपा ज्वाइन नहीं की है। वे एक दमदार नेता हैं, क्योंकि डेयरी नेटवर्क के कारण उनकी पूरे जिले पर पकड़ है। शायद ही ऐसा कोई गांव-ढ़ाणी हो, जहां उनकी पहचान न हो। यदि संघ सहमति दे दे तो वे भाजपा के एक अच्छे प्रत्याशी हो सकते हैं। यूं पूर्व जिला प्रमुख व मौजूदा मसूदा विधायक श्रीमती सुशील कंवर पलाड़ा के पति युवा भाजपा नेता भंवर सिंह पलाड़ा प्रयास कर सकते हैं, मगर भाजपा राजपूत का प्रयोग कितना कारगर मानती है, इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।
बहरहाल, अब जबकि प्रो. जाट का स्वर्गवास हो गया है, संभव है भाजपा सहानुभूति वोट हासिल करने के लिए उनके पुत्र रामस्वरूप लांबा को चुनाव मैदान में उतारे।
जरा पीछे जाएं तो पूर्व सांसद प्रो. रासासिंह रावत लंबे समय तक स्थानीय प्रत्याशी के रूप में जीतते रहे। वे पांच बार जीते व एक बार हारे। रावत के सामने कांग्रेस ने भूतपूर्व राजस्व मंत्री किशन मोटवानी, पुडुचेरी के उपराज्यपाल बाबा गोविंद सिंह गुर्जर, जगदीप धनखड़ व हाजी हबीबुर्रहमान को लड़ाया गया था, जो कि हार गए। पूर्व राज्यसभा सदस्य डॉ. प्रभा ठाकुर एक बार उनसे हारीं और एक बार जीतीं। इनमें से मोटवानी व बाबा का निधन हो चुका है, जबकि धनखड़ ने राजनीति छोड़ दी है और हाजी हबीबुर्रहमान भाजपा में जा चुके हैं। डॉ. प्रभा ठाकुर अभी हयात हैं। स्थानीय सशक्त प्रत्याशी के अभाव में कांग्रेस ने सचिन पायलट को उतारा, और वह प्रयोग कारगर साबित हुआ। उन्होंने जिले में जितने कार्य करवाए, उतने तो पूर्व सासंद पच्चीस साल में भी नहीं करवा पाए, मगर मोदी लहर के चलते वे दूसरी बार नहीं जीत पाए। अब जब कि उपचुनाव की नौबत आ गई है तो एक बार फिर उनके नाम पर नजर अटकती है, मगर वे प्रदेश अध्यक्ष हैं और उन्हें यह दायित्व मुख्यमंत्री के रूप में ही प्रोजेक्ट करने के लिए ही दिया गया तो समझा जाता है कि वे विधानसभा चुनाव ही लड़ेंगे। ऐसे में कांग्रेस के लिए फिर लोकसभा चुनाव का प्रत्याशी तलाशना कठिन होगा। यदि जातीय समीकरण की बात करें तो कांग्रेस के पास सचिन के अतिरिक्त उनके जितना कोई दमदार गुर्जर नेता जिले में नहीं है। चूंकि यह सीट अब जाट बहुल हो गई है, उस लिहाज से सोचा जाए तो पूर्व जिला प्रमुख रामस्वरूप चौधरी व पूर्व विधायक नाथूराम सिनोदिया को दावेदार माना जा सकता है। गुर्जर प्रत्याशी के रूप में महेन्द्र गुर्जर का नाम लिया जा सकता है।
यदि जाट-गुर्जर से हट कर बात करें तो कांग्रेस के पास बनियों में पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती हैं, जिनका नाम पूर्व में भी उभरा था। एक बार इस सीट पर जीत चुकी प्रभा ठाकुर के नाम पर भी विचार हो सकता है। उनके अतिरिक्त पूर्व विधायक रघु शर्मा व सेवादल के प्रदेशाध्यक्ष राजेश पारीक के भी नाम भी सामने आ सकते हैं। उधर भाजपा के पास पूर्व जिला प्रमुख पुखराज पहाडिय़ा हैं, हालांकि नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष धर्मेश जैन भी अपने आप को इस योग्य मानते रहे हैं। प्रयोग करने के लिए मौजूदा अजमेर नगर निगम मेयर धर्मेन्द्र गहलोत की विचारे जा सकते हैं।
बहरहाल, चूंकि इस साल के आखिर में गुजरात में विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में संभव है कि इसके साथ ही अजमेर का उपचुनाव भी करवा लिया जाए। कुल मिला कर यह तय है कि अजमेर लोकसभा का चुनाव कांग्रेस हो या भाजपा दोनों के लिए ही 2018 में होने वाले विधानसभा चुनावों के सेमीफाइनल की तरह होगा।
-तेजवानी गिरधर
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बुधवार, 9 अगस्त 2017

मजबूत जाट नेता के रूप में भाजपा को बड़ा नुकसान

राज्य किसान आयोग के अध्यक्ष व अजमेर के भाजपा सांसद प्रो. सांवरलाल के निधन से जहां देश व राज्य ने एक सशक्त किसान नेता खो दिया है, वहीं भाजपा राजनीतिक रूप से एक मजबूत जाट नेता से वंचित हो गई है, जिसकी क्षतिपूर्ति बेहद मुश्किल है। कदाचित वे इकलौते जाट नेता थे, जिन्होंने अजमेर जिले में परंपरागत रूप से कांग्रेस विचारधारा के जाट समुदाय को भाजपा से जोड़े रखा। जल संसाधन मंत्री रहे प्रो. जाट ने अनके बार मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे के लिए संकट मोचक के रूप में भूमिका निभाई।
स्वर्गीय श्री बालूराम के घर गोपालपुरा गांव में 1 जनवरी 1955 को जन्मे श्री जाट ने एम.कॉम. व पीएच.डी. की डिग्रियां हासिल की। पेशे से वे प्रोफेसर थे, मगर बाद में राजनीति में भी उन्होंने सफलता हासिल की। वे राजस्थान विश्वविद्यालय के लेखा शास्त्र एवं सांख्यिकी विभाग के सह आचार्य रहे। चौधरी चरण सिंह के लोकदल से 1990 में राजनीतिक सफर शुरू करने वाले जाट ने फिर राजनीति में पीछे मुड़ कर नहीं देखा। वे कितने लोकप्रिय थे, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे नौवीं, दसवीं, ग्यारहवीं व बारहवीं राजस्थान विधानसभा के सदस्य चुने गए। वे 13 दिसंबर 1993 से 30 नवंबर 1998 तक सहायता एवं पुनर्वास विभाग के राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और 8 दिसंबर 2003 से 8 दिसंबर 2008 तक जल संसाधन, इंदिरा गांधी नहर परियोजना, जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी, भू-जल एवं सिंचित क्षेत्र विकास विभाग के मंत्री रहे। तेरहवीं विधानसभा के चुनाव में उनका विधानसभा क्षेत्र भिनाय परिसीमन की चपेट में आ गया और उन्होंने नसीराबाद से चुनाव लड़ा, लेकिन कुछ वोटों के अंतर से ही श्री महेन्द्र सिंह गुर्जर से पराजित हो गए। पंद्रहवीं लोकसभा चुनाव में वे अजमेर संसदीय क्षेत्र से भाजपा टिकट के प्रबल दावेदार थे, लेकिन पार्टी ने अपने महिला मोर्चे की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती किरण माहेश्वरी को चुनाव मैदान में उतार दिया था, जो कि पूर्व केन्द्रीय राज्य मंत्री व मौजूदा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट से हार गईं। चौदहवीं विधानसभा के चुनाव में वे नसीराबाद से जीते और फिर से जलदाय मंत्री बनाए गए, मगर उसके बाद सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में उन्हें अजमेर संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़वाया गया और उन्होंने पायलट को हरा दिया। 20 दिसम्बर 2013 को उन्होंने केंद्रीय मंत्री की शपथ ग्रहण की। मोदी सरकार के पहले मंत्रिमंडल विस्तार में राज्यमंत्री बने प्रोफेसर सांवरलाल जाट सांसद बनने के बाद भी वसुंधरा सरकार में कैबिनेट मंत्री रहने पर हमेशा विपक्ष के निशाने पर रहे। विपक्ष ने कई बार सांवरलाल जाट को लेकर सदन की कार्यवाही में बाधा डाली और सदन से वॉकआउट किया।
मोदी मंत्रीमंडल के फिर हुए विस्तार में उन्हें स्वास्थ्य कारणों से मंत्री पद से हटा दिया गया। इसका जाट समाज ने कड़ा विरोध किया। आखिरकार मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को उन्हें राज्य किसान आयोग का अध्यक्ष बना कर केबीनेट मंत्री का दर्जा दिया।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता ये रही कि वे अपने समर्थकों व कार्यकर्ताओं के सार्वजनिक अथवा निजी कामों के लिए सदैव तत्पर रहते थे। अजमेर ने एक दिग्गज किसान नेता तो खो ही दिया है, उनके निधन से भाजपा को ज्यादा बड़ा नुकसान हुआ है। उनके मुकाबले का दूसरा जाट नेता भाजपा के पास नहीं है। अब संभव है अजमेर संसदीय सीट के लिए आगामी छह माह के भीतर होने वाले उपचुनाव में भाजपा उनके पुत्र रामस्वरूप लांबा को स्वर्गीय प्रो. जाट की विरासत संभालने को कहे।
-तेजवानी गिरधर
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शुक्रवार, 4 अगस्त 2017

प्रो. जाट के स्वास्थ्य पर जारी करना पड़ा प्रेस नोट

राजस्थान किसान आयोग के अध्यक्ष व अजमेर के सांसद प्रो. सांवरलाल जाट के स्वास्थ्य को लेकर उनके पीए राजेन्द्र जैन ने एक प्रेस नोट जारी किया है। उसमें लिखा है कि उनका दिल्ली के एम्स में इलाज चल रहा है और स्वास्थ्य में सुधार है। शुभचिंतकों से अपील की गई है कि वे किसी भी प्रकार अफवाह या दुष्प्रचार पर ध्यान न दें। यह बेहद अफसोसनाक बात है कि कोई शख्सियत जिजीविषा के बल पर स्वास्थ्य लाभ ले रही हो और उसके बारे में अफवाहें फैलाई जाएं, तब मजबूरी में स्वास्थ्य को लेकर स्पष्टीकरण जारी करना पड़े।
असल में यह स्थिति इस कारण बनी है कि वे दिल्ली के एम्स में भर्ती हैं और मीडिया उसकी रिपोर्टिंग नहीं कर रहा। जब तक जयपुर में भर्ती थे तो पूरी सरकार का ध्यान वहीं था, दिनभर नेताओं का जमावड़ा अस्पताल में ही रहता था और मीडिया भी पल-पल की खबर ले रहा था। चाहे सोशल मीडिया के जरिये, चाहे प्रिंट व इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिए, उनके स्वास्थ्य के बारे में आम जनता को जानकारी मिल रही थी। अस्पताल की ओर से मेडिकल बुलेटिन जारी हो न हो, पत्रकार अपने स्तर पर ही डॉक्टरों से जानकारी लेकर खबर बना रहे थे। मगर जब से उन्हें दिल्ली शिफ्ट किया गया है, कोई भी आधिकारिक जानकारी मीडिया में नहीं आ पा रही। उसकी वजह ये है कि दिल्ली की मीडिया की इसमें रुचि नहीं है। राज्य के अखबारों को भी अपने प्रतिनिधियों के जरिए प्रतिदिन खबर मंगवाना प्रैक्टिकेबल नहीं है। यही  वजह है कि प्रो. जाट की हालत इस समय कैसी है, उसके बारे में कुछ भी पता नहींं लग रहा। जाहिर है ऐसे में अफवाहें फैलती हैं। जितने मुंह उतनी बातें। नकारात्मक-सकारात्मक दोनों किस्म की चर्चाएं हो रही हैं। यहां तक कि भावी राजनीति तक पर चर्चा करने से लोग बाज नहीं आ रहे। इसको लेकर तनिक विवाद भी हुआ। हालांकि उनके समर्थक, जो कि दिल्ली में प्रो. जाट के रिश्तेदारों के संपर्क में है, वे वाट्स ऐप के जरिए स्वास्थ्य में सुधार की जानकारी दे रहे हैं, मगर चूंकि उसमें मेडिकल की टैक्निकल टर्म में खुलासा नहीं होता, इस कारण उस पर उतना विश्वास नहीं होता, जितना कि प्रिंट मीडिया में छपी खबर पर होता है।
कुल मिला कर उनके बारे में जानकारी न मिलने के कारण समर्थकों में चिंता व्याप्त है। विशेष रूप से अजमेर जिले के लोगों को तो उनके बारे में जानने की बहुत उत्कंठा है, चूंकि वे अजमेर के जनप्रतिनिधि हैं। राज्यभर में भी सरकार व राजनीति से जुड़े लोगों को उत्सुकता है, चूंकि वे एक प्रभावशाली नेता व किसान आयोग के अध्यक्ष हैं।
हालांकि यह तय है कि जयपुर की तुलना में दिल्ली में स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर है, मगर ऐसा प्रतीत होता है कि राज्य सरकार की भी यही मंशा रही कि आगे का इलाज दिल्ली में हो। उसकी वजह ये रही होगी कि जयपुर में इलाज चलने पर पूरी सरकार व मंत्रियों-विधायकों का ध्यान यहीं अटका रहता। इसके अतिरिक्त उनके शुभचिंतकों का जमावड़ा होने से अस्पताल की व्यवस्थाएं प्रभावित होतीं। मगर दिल्ली भेजे जाने का परिणाम ये रहा कि उनके स्वास्थ्य के बारे में जानकारी मिलना ही बंद सी हो गई। ऐसे में अफवाहें फैलनी ही थीं। उसी की प्रतिक्रिया स्वरूप उनके निजी सचिव को भी बाकायदा प्रेस नोट जारी करना पड़ा कि उनके स्वास्थ्य में सुधार हो रहा है। यह सुखद है कि उनकी तबियत अब ठीक है, मगर सरकार को चाहिए कि वह अपने स्तर पर ही प्रतिदिन के सुधार के बारे में जानकारी मीडिया को उपलब्ध करवाए।
-तेजवानी गिरधर
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गुरुवार, 3 अगस्त 2017

सरकार दरगाह कमेटी व नाजिम को लेकर गंभीर नहीं

ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह की अंदरूनी व्यवस्थाओं को देखने वाली दरगाह कमेटी के प्रशासनिक मुखिया नाजिम को लेकर गंभीर नहीं है। दरगाह ख्वाजा साहब एक्ट के तहत गठित इस कमेटी को एक ढर्ऱे की तरह चलाया जा रहा है, जबकि इसमें सदस्यों से लेकर नाजिम तक की नियुक्ति में अतिरिक्त सावधानी की जरूरत है।
सरकार की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कमेटी के प्रशासनिक मुखिया की नियुक्ति अत्यधिक लेटलतीफी बरती जाती है। ऐसे अनेक मौके रहे हैं, जबकि नाजिम की अनुपस्थिति में कार्यवाहक नाजिम से ही काम चलाया गया है। हाल ही गुजरात के रिटायर्ड आईएएस आई बी पीरजादा को नाजिम नियुक्त किया गया है। सरकार की मनमर्जी देखिए कि जब अब तक यहांं नौकरी कर रहे सरकारी अधिकारी की नियुक्ति का नियम है और यही परंपरा भी रही है, उसके बावजूद इस पद पर सेवानिवृत्त आईएएस को नियुक्त कर दिया है। नियुक्ति में किस प्रकार राजनीतिक दखल रहा है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पूरे देश में उसे केवल गुजरात का ही अधिकारी इस पद के योग्य मिला है। इससे स्पष्ट है कि सरकार इस पद को ईनाम का जरिया बना रही है, जबकि यहां पूर्णकालिक अधिकारी की जरूरत है। जरूरत इसलिए है कि यह उस दरगाह का प्रबंध देखने वाली कमेटी का प्रशासनिक मुखिया है, जो पूरी दुनिया में सूफी मत मानने वालों का सबसे बड़ा मरकज है। इतना ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के चलते अत्यंत संवेदनशील स्थान है। आतंकियों के निशाने पर है और एक बार तो यहां बम ब्लास्ट तक हो चुका है।
बेशक प्रतिदिन आने वाले जायरीन की सुविधा के मद्देनजर सरकार गंभीर रहती है, उसके लिए बजट भी आवंटित होता है, मगर दरगाह कमेटी व नाजिम को लेकर सरकार एक ढर्ऱे पर ही चल रही है। वस्तुस्थिति ये है कि यह कमेटी, विशेष रूप से नाजिम न केवल दरगाह की दैनिक व्यवस्थाओं को अंजाम देते हैं, अपितु खादिमों व दरगाह दीवान के बीच आए दिन होने वाले विवाद में भी मध्यस्थ की भूमिका उन्हें निभानी होती है। यह काम कोई पूर्णकालिक अधिकारी ही कर सकता है। होना तो यह चाहिए कि इस पद पर नियुक्ति ठीक उसी तरह से की जाए, जिस तरह आरएएस व आईएएस अधिकारियों तबादला नीति के तहत की जाती है। उसमें विशेष रूप से यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि वह दबंग हो।
अफसोसनाक बात है कि इस ओर केन्द्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय कत्तई गंभीर नहीं है। यही वजह है कि जब भी कोई नाजिम अपना कार्यकाल पूरा करके जाता है या इस्तीफा दे देता है तो लंबे समय तक यह पद खाली ही पड़ा रहता है। कार्यवाहक नाजिम से काम चलाया जाता है, जिसके पास न तो प्रशासनिक अनुभव होता है और न ही उतने अधिकार होते हैं। मंत्रालय इस पद को लेकर कितना लापरवाह है, इसका अनुमान इसी बात से लग रहा है कि उसने नियमों के विपरीत जा कर एक सेवानिवृत्त अधिकारी को नाजिम बना दिया। एक सेवानिवृत्त अधिकारी में कितनी ऊर्जा होती है, यह बताने की जरूरत नहीं है, जबकि यहां ऊर्जावान अधिकारी की जरूरत है, जैसे जिला कलेक्टर गौरव गोयल। ऐसा अधिकारी ही यहां की व्यवस्थाओं को ठीक ढ़ंग से अंजाम दे सकता है।
एक सवाल ये भी उठा है कि यदि सरकार को नियम बदल कर सेवानिवृत्त अधिकारी हो ही यहां लगाना था तो काहे को सेवारत अधिकारियों के इंटरव्यू आहूत किए गए। यह पहले से स्पष्ट होता कि इस पद के लिए सेवानिवृत्त अधिकारी भी आवेदन कर सकता है, तो संभव अन्य सेवानिवृत्त अधिकारी भी आवेदन करते।
-तेजवानी गिरधर
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बुधवार, 2 अगस्त 2017

साध्वी अनादि सरस्वती लड़ेंगी अजमेर उत्तर से?

जाने-माने राजनीतिक पंडित एडवोकेट राजेश टंडन एक नई खबर लेकर आए हैं सोशल मीडिया पर। वो ये कि चिति योग संस्थान की साध्वी अनादि सरस्वती पर संघ की नजर है कि यदि आगामी विधानसभा चुनाव में ऐन वक्त पर मौजूदा विधायक व शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी का टिकट काटना पड़े तो उनकी जगह किसी भाजपाई की बजाय उनको चुनाव मैदान में उतारा जाए। हालांकि यह खबर से ज्यादा फिलहाल अफवाह ही कही जाएगी, मगर राजनीति में सब कुछ संभव है। और जब टंडन साहब कहीं से खोद कर लाए हैं तो उस पर जरा गौर करना वाजिब है।
टंडन ने अपनी खबर को पुख्ता आधार देने के लिए साध्वी की हाल की गतिविधियों की ओर भी इशारा किया है। जैसे जयपुर में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से मुलाकात, मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को उनका आशीर्वाद देना, राज्यसभा सदस्य भूपेन्द्र यादव से उनकी शिष्टाचार भेंट इत्यादि। इसके अतिरिक्त विश्व हिंदू परिषद व संघ के कार्यक्रमों में उनके मंचों पर भी उन्हें देखा गया है। इसके अलावा रायपुर-छत्तीसगढ की यात्रा के दौरान उनकी मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से मुलाकात को भी उन्होंने इसी संदर्भ में जोड़ा है।
हालांकि अभी तक साध्वी अनादि सरस्वती की ओर से इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, इस कारण उनका मन्तव्य क्या है, कुछ कहा नहीं जा सकता। चूंकि संघ की भले ही उन पर नजर हो, मगर अनादि सरस्वती जैसी साध्वी राजनीति में आने को तैयार होती हैं, या नहीं, उस बारे में अभी से अनुमान लगाना कठिन है। हालांकि जब से वे जनता में अवतरित हुई हैं, तब आरंभ में कांग्रेस व भाजपा, दोनों ही दलों के नेताओं से उनके संपर्क रहे हैं। शुरू में कुछ प्रमुख समाजसेवी व व्यवसायी भी उनके संपर्क में रहे। पिछले कुछ सालों में उनकी गतिविधि यकायक बढ़ गई है और वे दूर-दूर की आध्यात्मिक यात्राएं कर चुकी हैं। अब तो उनके चित्ताकर्षक फोटो युक्त प्रवचन सोशल मीडिया में भी खूब नजर आ रहे हैं। फेसबुक पर उनके सैकड़ों अनुयायी हैं। उनके मन में राजनीतिक महत्वाकांक्षा है, या नहीं, कहा नहीं जा सकता, मगर जो कोई भी उनको प्रोजेक्ट करना चाहता है, वह निश्चित रूप से शातिर दिमाग है। कदाचित संघ में घुसपैठ करवाने में भी उसी की भूमिका हो।
अपनी जितनी समझ है, उसके हिसाब अगर साध्वी राजनीति में आती हैं तो यह तय है कि जब वे साध्वी नहीं थीं, तब के कहानी-किस्से भी लोग चर्चा में ले आएंगे। एक चुटकला नहीं है कि अगर आपको अपनी सात पीढिय़ों के बारे में जानकारी न हो तो केवल इतना कीजिए कि अपने चुनाव लडऩे की अफवाह फैला दीजिए, लोग आपकी सात पीढ़ी का पूरा हिसाब-किताब ढूंढ लाएंगे, पुष्कर में किसी पंडे से नहीं मिलना होगा।
-तेजवानी गिरधर
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शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

शरीर मात्र विलीन हुआ है, आनंदपाल अब भी जिंदा है

हालांकि भारी जद्दोजहद के बाद भड़की हिंसा के बीच पुलिस के हस्तक्षेप से कुख्यात आनंदपाल की अंत्येष्टि हो गई और उसका शरीर पंच तत्त्व में विलीन हो गया, मगर आनंदपाल अब भी जिंदा है। पूरे राजपूत समाज के समर्थन में खड़े होने से उसकी आत्मा का साया अब भी मंडरा रहा है। बेशक अंत्येष्टि से सरकार ने राहत की सांस ली है, मगर एनकाउंटर की सीबीआई जांच पर अड़ा राजपूत समाज शांत होता नहीं दिख रहा।
विशेष रूप से सोशल मीडिया में समाज को और लामबंद करने और सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले रखने की मुहिम जारी है। क्राइम के दायरे को लांघ कर पूरी तरह से राजनीतिक हो गई इस समस्या से सरकार कैसे निपटेगी, ये तो आने वाला समय ही बताएगा, मगर चुनाव से तकरीबन डेढ़ साल पहले उपजे इस जिन्न को शांत करने के लिए कई जतन करने होंगे।
वस्तुत: आंदोलन के चलते हुए हिंसा के कारण यह मामला और पेचीदा हो गया है। अनेक नेताओं की धरपकड़ की गई है तो कई पर मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं। अब जो लोग फंसे हैं, उन्हें बचाने के लिए समाज का दबाव नेताओं पर होगा। एनकाउंटर की सीबीआई जांच की मांग तो अपनी जगह है ही, मगर आंदोलन के चलते मुकदमों में फंसे लोगों का साथ देने के के लिए एक और मुहिम शुरू होगी। सच तो ये है कि मुहिम शुरू हो ही गई है। सोशल मीडिया पर मुख्यमंत्री को राजपूत विरोधी करार देकर आने वाले चुनाव में निपटाने की कसमें खाई जा रही हैं। बीजेपी के झंडे वाले चिन्ह पर क्रॉस बना कर बहिष्कार की अपील की जा रही है। राजस्थान के हर राजपूत परिवार के पास मोबाइल में यह सब पहुंच रहा है। समाज के हित में निर्णय लेने की कसम खिलाई जा रही है।
वाट्स ऐप पर एक अपील चल रही है कि अगर आप आनन्दपाल को न्याय दिलवाना चाहते हो तो  प्रधानमन्त्री कार्यालय के टोल फ्री नंबर 18001204411 पर कॉल करके पीएम मोदीजी को अपनी आवाज में वॉइस सन्देश दें कि इस फर्जी एनकाउंटर की सीबीआई जांच करवा कर वसुंधरा को हटायें नहीं तो आगामी चुनाव में परिणाम भुगतना होगा। ध्यान रहे 1 मिनट होते ही आपकी काल कट जायेगी और आपका सन्देश पहुंचते ही आपको वापस मेसेज मिलेगा। अब एक कॉल तो घुमा दो राजपूत होने के नाते। अभी नही तो कभी नहीं। इतने कॉल करो कि मोदीजी सोचने पर मजबूर हो जाएं।
इसी प्रकार लोकेन्द्र सिंह कालवी, गिरिराज सिंह लाटवाड़ा, महिपाल सिंह मकराना व सुखदेव सिंह गोगामेड़ी के नाम से एक अपील जारी की गई है, जिसके तहत 21 जुलाई को राजस्थान चक्का जाम, 22 जुलाई को जयपुर बंद का अह्वान किया गया है।
इतना जरूर है कि सरकार अपनी पावर का उपयोग कर इस आंदोलन से निपट ही लेगी, मगर सत्तारूढ़ भाजपा के लिए बड़ी समस्या ये है कि जो समाज वर्षों तक उसका वोट बैंक रहा है, उसे छिटकने से कैसे बचाया जाए? हालांकि जातीय मुहिमों में दरार डालने के कई उपाय सरकार के पास होते हैं, मगर जिस तरह से इस आंदोलन ने रूप अख्तियार किया है, उसे देखते हुए लगता है कि सरकार भले ही समाज को संतुष्ट करने के अनेक जतन कर ले, मगर जो  एक बड़ा तबका छिटकेगा, उसका रुख फिर भाजपा की ओर करना बेहद कठिन होगा।
-तेजवानी गिरधर
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बनते बनते बिगड़ी बात, लॉ एंड ऑर्डर फेल

राजस्थान पुलिस के हाथों एनकाउंटर में मारा गया कुख्यात गैंगस्टर आनंदपाल सिंह मौत के बाद भी सरकार और पुलिस के लिए सिर दर्द बना हुआ है। पूरा राजपूत समाज उसके साथ खड़ा है। किसी अपराधी के साथ पूरा समाज एकजुट है तो इसका सीधा सा अर्थ है कि यह मसला अकेला कानून व्यवस्था का नहीं, बल्कि इसके राजनीतिक निहितार्थ भी हैं। उधर सरकार का सीबीआई जांच के लिए राजी न होना संकेत देता है कि वह किसी आशंका से घिरी हुई है।
चलो, पहले कानून व्यवस्था की बात। मुठभेड़ से पहले समस्या ये थी कि जब भी सरकार कानून व्यवस्था की उपलब्धियों का बखान करती तो आनंदपाल का नाम उस पर कालिख पोत देता और अब मौत के बाद हुआ आंदोलन जब पूर्णाहुति के करीब था तो कानून व्यवस्था की विफलता ने ही पानी फेर दिया। पहले गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया आनंदपाल का नाम सुनते ही झल्ला जाते थे और और बोल पड़ते थे कि वह मेरी जेब में तो बैठा नहीं है। अब भी उनकी स्थिति ये है कि सांवराद में सुलह सिरे पर पहुंचती, इससे पहले ही हिंसा भड़क उठी और डीजी जेल अजीत सिंह शेखावत की सारी मेहनत जाया हो गई, ऐसे में उनसे जवाब देते नहीं बन रहा। समस्या वहीं की वहीं है। कानून व्यवस्था संभाले नहीं संभल रही। इसकी जड़ें मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे व संघ पृष्ठभूमि के गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया के बीच खिंची अदृश्य रेखा की तह में तो नहीं है, इसका केवल कयास ही लगाया जा सकता है।
असल में सरकार ऐसे पेचीदा मसले में भी सीबीआई जांच की मांग तुरंत मानने की बजाय आगामी चुनाव को ही ध्यान में रख रही है। दैनिक भास्कर ने तो साफ लिखा है कि सुलह के लिए डीजी जेल अजीत सिंह शेखावत को भेजने का मकसद ही ये था कि राजपूत समाज में संदेश जाए कि वे ही राज्य के नए डीजीपी बनाए जा रहे हैं। अगर सफलता मिलती तो सरकार में एक दमदार राजपूत चेहरा उभरता। प्राप्त सूचनाओं के अनुसार सुलह लगभग हो भी चुकी थी, मगर इस बीच अचानक हिंसा भड़क उठी और सब कुछ बिखर गया। स्पष्ट है कि जब अजीत सिंह बातचीत में व्यस्त थे तो वहां की कानून व्यवस्था संभाले हुए अफसर गच्चा खा गए। अब लाख तर्क दिए जाएं कि पुलिस की कोई गलती नहीं है, आंदोलनकारियों ने हिंसा की, मगर इस बात का जवाब क्या है कि आपसे भीड़ हैंडल क्यों नहीं हो पाई? भीड़ अनुमान से ज्यादा पहुंचने का तर्क भी पुलिस के ही गले पड़ा हुआ है कि आपका सूचना तंत्र फेल कैसे हो गया? खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक 15 से 20 हजार लोगों के ही आने की संभावना थी, मगर आ गए तीन गुना ज्यादा, जबकि जवान तैनात थे 2 हजार 500। इसका सीधा सा अर्थ है कि आपने भीड़ को रोकने के इंतजामात के तहत 16 स्थानों पर जो नाकेबंदी की थी, वह भी गड़बड़ा गई।
बात अगर राजनीतिक कोण की करें तो इस आंदोलन से परंपरागत रूप से भाजपा मानसिकता से जुड़े राजपूत समाज के छिटकने का खतरा है।  अब अगर सरकार सीबीआई जांच की मांग मान भी लेती है तो भी जो नुकसान हो चुका है, उसकी भरपाई पूरी तो नहीं हो पाएगी।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

क्या आनंदपाल की अंत्येष्टि की 13 तारीख में भी कोई राज है?

एनकाउंटर में मारे गए कुख्यात आनंदपाल की अंत्येष्टि को लेकर बहुत जद्दोजहद हुई और आखिरकार 13 जुलाई को उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया। क्या इस 13 तारीख में कोई राज है? इस बारे में वरिष्ठ एडवोकेट व पूर्व अजमेर बार अध्यक्ष राजेश टंडन की अपनी स्टडी है। उन्होंने फेसबुक पर 10 जुलाई को ही लिख दिया था कि आनंदपाल का अंतिम संस्कार 13 तारीख को निश्चित रूप से हो जाएगा। उन्होंने इसका संदर्भ मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा से जोड़ा था। उनका कहना है कि श्रीमती वसुंधरा के लिए 13 तारीख बहुत महत्वपूर्ण है। उनकी जन्म दिनांक 13 है, बंगले का नंबर भी 13 ही है। इसके अतिरिक्त वे हर शुभ व महत्वपूर्ण कार्य 13 तारीख को ही करती हैं। इसी तारीख को उन्होंने आनंदपाल की अंत्येष्टि से जोड़ा था। यानि कि यदि आनंदपाल की अंत्येष्टि 13 को होती है तो यह मुख्यमंत्री के लिए मुफीद है। संयोग देखिए कि आनंदपाल की अंत्येष्टि 13 तारीख को ही हुई। हालांकि यह एक संयोग हो सकता है, मगर टंडन का तीन दिन पहले ही कहना कि अंत्येष्टि 13 को ही होगी, चौंकाने वाला है।

बुधवार, 12 जुलाई 2017

क्या आनासागर में स्नान भी पवित्र है पुष्कर की तरह?

तत्कालीन यूआईटी अध्यक्ष डॉ. श्रीगोपाल बाहेती के कार्यकाल में आनासागर के पास ऋषि घाटी वैकल्पिक मार्ग बनाने के साथ गरीब जायरीन के नहाने के लिए जो रामप्रसाद घाट बनाया गया था, वह इतिहास का हिस्सा बनने जा रहा है। सौंदर्यीकरण के तहत वहां पाथ वे बनाया जा रहा है। साथ ही वहां नहाने पर भी रोक लगा दी गई है, ताकि झील का पानी दूषित न हो।  ऐसे में यह सवाल मुंह बाये खड़ा है कि दरगाह ख्वाजा साहब की जियारत करने से पूर्व प्रतिदिन हजारों गरीब जायरीन के वजू अथवा नहाने की परंपरा का क्या होगा? इस बारे में न तो जिला प्रशासन ने कोई व्यवस्था दी है और न ही नगर निगम ने कुछ विचार किया है। न तो दरगाह में जियारत करवाने वाले खादिमों की संस्था अंजुमन ने कोई राय दी है और न ही दरगाह दीवान का मन्तव्य सामने आया है। आखिरकार शहर की कुछ सामाजिक संस्थाओं ने इस मसले को उठाया है। उनका कहना है कि जायरीन की भावनाओं की कद्र करते हुए उनके लिए नहाने की व्यवस्था आनासागर पर की जाए। उनका तर्क है कि जिस प्रकार प्रशासन ने पुष्कर में श्रद्धालुओं के नहाने के लिए कुंंड बना कर व्यवस्था की है, उसी के अनुरूप आनासागर में भी कुंड की व्यवस्था की जाए, ताकि जायरीन की भावनाओं की कद्र हो सके।
ऐसे यह सवाल मौजूं है कि क्या जिस प्रकार तीर्थराज पुष्कर में नहाना धार्मिक लिहाज से पवित्र माना जाता है, क्या उसी प्रकार आनासागर में जायरीन का नहाना भी एक पवित्र कृत्य है? इस मुद्दे पर जरा गहराई से विचार करें तो तीर्थराज पुष्कर में स्नान की तो महिमा शास्त्रों में भरी पड़ी है और वहां श्रद्धालु मुख्य रूप से नहाने ही आते हैं। दूसरी ओर यह सच है कि दरगाह में जियारत करने वाले गरीब जायरीन अनेक वर्षों से परंपरागत रूप से आनासागर में नहाते हैं, मगर उसकी कोई धार्मिक महत्ता है, इस बारे में अब तक कोई जानकारी उभर कर नहीं आई है। हां, यह तर्क जरूर दिया जाता है कि किसी जमाने में स्वयं ख्वाजा साहब इसी आनासागर में वजू किया करते थे, इस कारण यहां नहाना पवित्र कृत्य है। इसमें कोई दो राय नहीं कि गरीब जायरीन आनासागर में ही नहाने के बाद जियारत करने जाते हैं, मगर इसकी कोई धार्मिक महत्ता भी है या फिर यह महज एक सामान्य स्नान ही है, यह विवाद का विषय हो सकता है। एक तर्क ये भी है कि यदि वाकई इसका धार्मिक महत्व होता तो जियारत करने के लिए आने वाले हर आम ओ खास जायरीन यहा स्नान करते। केवल गरीब जायरीन ही क्यों स्नान करते हैं?
खैर, आनासागर में स्नान भी तीर्थराज पुष्कर की तरह पवित्र है या नहीं, इस विषय से हट कर विचार करें तो यह मुद्दा तो है ही कि यदि प्रशासन आनासागर में नहाने की व्यवस्था पूरी तरह से समाप्त करने जा रहा है तो उसने यहां नहाने को प्रतिदिन आने हजारों गरीब जायरीन के नहाने की वैकल्पिक व्यवस्था पर विचार क्यों नहीं किया? क्या वह यह तर्क दे कर बच सकता है कि गरीब जायरीन कहां नहाएंगे, इसकी उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है, वे चाहें तो आसपास बने सुलभ कॉम्पलैक्स में नहा सकते हैं। इसमें विचारणीय ये है कि क्या गरीब जायरीन पर नहाने के लिए पैसे देने का बोझ डालना उचित है? और अगर इसे नजरअंदाज भी किया जाए तो क्या हजारों जायरीन के अनुपात में सुलभ कॉम्पलैक्स बनाने पर विचार किया गया है? क्या यह जिम्मेदारी प्रशासन की नहीं है कि वह कोई व्यवस्था लागू करने के साथ ही उसकी वैकल्पिक व्यवस्था भी करे। माना कि आनासागर में नहाने का धार्मिक महत्व होने की कोई लिपिबद्ध जानकारी कहीं नहीं भी मिल रही, तो भी अगर गरीब जायरीन के लिए आनासागर में नहाना आस्था का मामला है तो प्रशासन को जरूर उनकी आस्था का ख्याल रखना ही चाहिए।
-तेजवानी गिरधर
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मंगलवार, 11 जुलाई 2017

टंडन वाकई राजनीतिक व प्रशासनिक पंडित हैं

अजमेर के जाने-माने वकील व जिला बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष राजेश टंडन वाकई राजनीतिक व प्रशानिक पंडित हैं। हाल ही उन्होंने अपनी एक फेसबुक पोस्ट में लिखा था कि आईएएस के पूर्व अधिकारी डॉ. ललित के. पंवार राजस्थान लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्ति के बाद राजस्थान आईएलडी स्किल्स विश्वविद्यालय जयपुर के प्रथम कुलपति नियुक्त होंगे। उन्होंने उन कयासों को भी पूरी तरह से नकारा था कि पंवार राजनीति में जाएंगे। उन्होंने लिखा था कि उनके चोहटन से चुनाव लडऩे की संभावना इस कारण नहीं है क्योंकि वे वहां जातीय समीकरण में फिट नहीं बैठते। वहां मेघवाल समाज का बाहुल्य है। ये बात स्वयं पंवार भी जानते हैं। उनके लिए कोई और विधानसभा क्षेत्र भी उपयुक्त नहीं है। राज्यसभा में भी उनके जाने की संभावना नहीं है।
उनकी यह पोस्ट उन अफवाहों के बाद आई थी, जब कुछ लोग ये कयास लगा रहे थे कि पंवार राजनीति में जाने वाले हैं।
ज्ञातव्य है कि इससे पूर्व भी एक बार अजमेर नगर निगम के मेयर धर्मेन्द्र गहलोत व तत्कालीन अजमेर नगर परिषद के पूर्व सभापति सुरेन्द्र सिंह शेखावत के विवाद पर भविष्यवाणी की थी कि उनकी सुलह राजगढ़ मसाणियां धाम में चंपालाल जी के दरबार में ही होगी। हुआ भी यही। उन दोनों ने कुछ दिन बाद महाराज के सामने अपने गिले-शिकवे भुला दिए थे।
असल में टंडन राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं। उनके अनेक राजनेताओं और आईएएस व आईपीएस अधिकारियों के साथ घनिष्ठ संबंध हैं। इसी कारण उनका सूचना तंत्र इतना मजबूत है।

रविवार, 25 जून 2017

नगर निगम के बाद एडीए में नियुक्यिों का इंतजार

अजमेर नगर निगम में लंबे इंतजार के बाद मनोनीत पार्षदों की घोषणा होने के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं को अजमेर विकास प्राधिकरण में प्रस्तावित बोर्ड के सदस्यों की घोषणा का इंतजार है।
जानकारी के अनुसार बोर्ड में एडीए अध्यक्ष शिवशंकर हेडा की पसंद के अतिरिक्त अजमेर उत्तर व दक्षिण, पुष्कर व किशनगढ़ के विधायकों की ओर से सिफारिश किए गए नेताओं को शामिल किया जाएगा, क्योंकि एडीए के क्षेत्र में अजमेर शहर के अतिरिक्त पुष्कर व किशनगढ़ भी आते हैं। अजमेर नगर निगम में जब मनोनीत पार्षदों के लिए स्थानीय दोनों विधायकों, जो कि राज्य मंत्री भी हैं, ने तीन-तीन नाम प्रस्तावित किए थे, तभी एडीए में भी अपनी पसंद के दो-दो नेताओं के नाम भी जयपुर भेजे दिए थे।
हालांकि सिद्धांत: यह तय है कि एडीए में बोर्ड गठित होगा, मगर उस पर कार्यवाही को लेकर अभी मंथन चल रहा है। सरकार यह विचार कर रही है कि क्या बाकी बचे डेढ़ साल के लिए नियुक्तियां करना उचित रहेगा या नहीं। असल में डर है कि यदि नियुक्तियां कर दी गईं तो जो नेता वंचित रह जाएंगे, उनमें असंतोष फैल जाएगा। विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सरकार ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहती, जिससे जमा हुआ पानी हिलने लग जाए। हालांकि स्थानीय नेता बोर्ड के गठित करने के लिए लगातार दबाव बना रहे हैं, क्योंकि उनके चहेते उनके पीछे पड़े हुए हैं, मगर सरकार कदम उठाने से पहले पूरी तरह से हालात को ठोक बजा लेना चाहती है। इसकी वजह ये है कि यदि अभी बोर्ड गठित हो जाने पर असंतोष बढ़ा तो उसे तुष्ट करने का कोई उपाय नहीं रहेगा, क्योंकि स्थानीय स्तर पर ऑब्लाइज करने का कोई उपाय नहीं है। ज्ञातव्य है कि बोर्ड में उन ही नेताओं की सिफारिश की गई है, जिनको निगम में एडजस्ट नहीं किया जा सका। उन्हें आश्वासन दिया हुआ है। सरकार का कार्यकाल खत्म होने की ओर अग्रसर है, इस कारण नियुक्ति के दावेदारों में उतावलापन है। उनका तर्क है कि जब निगम में नियुक्ति हो चुकी है तो एडीए  में क्यों अटका रखी है? उन्होंने अपने-अपने आकाओं की नींद हराम कर रखी है, मगर वे भी क्या करें, फैसला सरकार को करना है। समझा जाता है कि वे भी मन ही मन ये सोच रहे होंगे कि नियुक्ति न हो तो अच्छा। स्वाभाविक रूप से जितने नाम घोषित होने हैं, कम से उनसे दो या तीन गुना को लॉलीपोप दे रखी होगी। जैसे ही नियुक्ति हुई तो शेष बचे नेता उनके कपड़े फाड़ेंगे। चूंकि चुनाव में मात्र डेढ़ साल बाकी रह गया है और उन्हें फिर से टिकट की उम्मीद है, ऐसे में उन्हें असंतुष्ट नेताओं के बगावत या भीतरघात करने का खतरा है।
बहरहाल, फिलहाल मामला अधरझूल में है। यह केवल सरकार पर ही निर्भर है कि वह क्या फैसला करती है, स्थानीय नेताओं के हाथ में कुछ भी नहीं।
-तेजवानी गिरधर
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शनिवार, 24 जून 2017

किशनगढ़ एयरपोर्ट की वाहवाही लूटते हैं तो खैर-खबर भी लें

जिस किशनगढ़ एयरपोर्ट को स्थापित करने की आरंभिक सारी कवायद पूर्व केन्द्रीय संचार राज्य मंत्री सचिन पायलट ने की, उसका श्रेय स्थानीय भाजपा नेता ले तो रहे हैं, चूंकि आज केन्द्र व राज्य में भाजपा की सरकार है, मगर वे इसके लिए कितने प्रयासरत हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लग रहा है कि जुलाई से ट्रायल उड़ानें और अगस्त में शिड्यूल फ्लाइट्स शुरू होने को लेकर आशंकाएं जताई जा रही हैं।
भास्कर के तेजतर्रार रिपोर्टर अतुल सिंह की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक अब तक न तो गृह मंत्रालय से एनओसी मिला और न ही डायरेक्ट्रेट जनरल सिविल एविएशन (डीजीसीए) से लाइसेंस। ऐसे में एयरपोर्ट का संचालन शुरू होने पर सवाल उठने ही हैं। इसका सीधा सा अर्थ है कि केन्द्र में अजमेर का प्रतिनिधित्व करने वाले इस ओर ध्यान ही नहीं दे रहे। जो कुछ हो रहा है, वह ब्यूरोक्रेट लेवल पर है।
जहां तक इस एयरपोर्ट में राज्य सरकार की भूमिका का सवाल है, बिजली, पानी और हाई-वे से रोड कनेक्टिविटी के काम भी कछुआ चाल से चल रहे हैं। क्या इसका यह अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए कि राज्य सरकार का हिस्सा बने अजमेर के भाजपाई जनप्रतिनिधि इन कामों को समय पर पूरा करवाने के लिए कोई निगरानी नहीं कर रहे। ऐसे में यह कहते हुए अफसोस ही होता है कि मात्र वाहवाही लेने के लिए संसदीय सचिव सुरेश रावत व किशनगढ़ के भाजपा विधायक भागीरथ चौधरी दिल्ली से यहां आए निजी कंपनी के चार्टर प्लेन को बाकायदा हरी झंडी दिखाने पहुंच जाते हैं। कैसी विडंबना है कि जिस एयरपोर्ट का औपचारिक व विधिवत शुभारंभ हुआ नहीं है, वहां एक प्राइवेट कंपनी का ट्रायल चार्टर प्लेन आने पर ऐसा माहौल बना दिया जाता है, मानो हवाई अड्डों की दुनिया में अजमेर भी शुमार हो गया है। जबकि हकीकत ये है कि इससे पहले भी चार्टर प्लेन लैंड कर चुके थे। बेशक, आज जब भाजपा की सरकार है तो शाबाशी भी वे ही लूटेंगे, मगर वहां पर रावत का बड़े अधिकारापूर्वक यह कहना कि किशनगढ़ एयरपोर्ट को जो सपना देखा था, वह आज पूरा हो गया, जल्द ही एयरपोर्ट से नियमित विमान सेवाएं शुरू होगीं, तो ऐसा प्रतीत होता है, मानो वे इसकी मॉनिटरिंग कर रहे हैं। और वाकई कर रहे हैं तो ऐसी स्थिति क्यों बनती है कि जुलाई से ट्रायल उड़ानें और अगस्त में शिड्यूल फ्लाइट्स शुरू होने को लेकर मीडिया सवाल खड़े करता है। मीडिया सवाल खड़े करे न करे, धरातल का सच भी यही है कि निर्धारित शिड्यूल से काम नहीं हो रहा। ऐसे में क्या स्थानीय भाजपाई जनप्रतिनिधियों, जिनमें राज्य किसान आयोग के अध्यक्ष प्रो. सांवरलाल जाट, राजस्थान पुरा धरोहर संरक्षण प्राधिकरण के अध्यक्ष औंकार सिंह लखावत, शिक्षा राज्यमंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी, महिला व बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल, संसदीय सचिव शत्रुघ्न आदि शुमार हैं, का यह दायित्व नहीं बनता कि वे अजमेर की इस महत्वाकांक्षी योजना को गंभीरता से लें। अगर क्रेडिट लेने का हक आपका है तो उसको समय पर पूरा करने की जिम्मेदारी भी आप पर ही आयद होती है।
अजमेर के हितों के लिए वर्षों से संघर्षरत सिटीजंस कौंसिल के अध्यक्ष व दैनिक नवज्योति के प्रधान संपादक दीनबंधु चौधरी ने एक बार व्यक्तिगत चर्चा में बताया था कि अजमेर दर्द यही है कि जनप्रतिनिधि न तो अजमेर से संबंधित योजनाओं की पूरी स्टडी करते हैं और न ही फॉलोअप। इसी वजह से अजमेर का विकास धीमी गति से हो रहा है।
इसी संदर्भ में अगर स्मार्ट सिटी अजमेर की बात करें तो जब पहली बार अजमेर के नाम की घोषणा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने की थी, तब भाजपा नेता वाहवाही लेने तो आगे आ गए, मगर उन्हें यह पता तक न था कि अजमेर का चयन किस प्रक्रिया के तहत हुआ। उन्हें यह जानकारी भी ठीक नहीं थी इसके तहत आखिर होगा क्या? तत्कालीन संभागीय आयुक्त ने भी खूब बेवकूफ बनाया। यदि मौजूदा जिला कलैक्टर गौरव गोयल इसमें व्यक्तिगत रुचि न लेते तो अजमेर का नाम सूची में अब तक भी नहीं आ पाता। इससे समझा जा सकता है कि अजमेर का पानी कैसे लाडलों का जन्म देता है।
-तेजवानी गिरधर
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गुरुवार, 22 जून 2017

देवनानी का अनिता के कार्यक्रम में जाना भी है एक खबर

कहते हैं न कि यदि कुत्ता आदमी को काट खाए तो कोई खबर नहीं बनती, मगर यदि आदमी कुत्ते को काट खाए तो वह खबर हो हो जाती है।  आपने ये भी देखा होगा कि अगर कोई किसी के साथ बेईमानी करे तो उसकी खबर मात्र इस कारण छपती है, क्योंकि एक घटना हुई है, लेकिन उस पर कोई खास गौर नहीं करता क्योंकि बेईमानी आम बात है, मगर यदि कोई किसी के खोए हुए रुपए या वस्तु ला कर उसके मालिक को दे तो ईमानदारी जिंदा है के शीर्षक से बॉक्स में खबर लगती है। कुछ ऐसा ही शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी व महिला व बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल को लेकर है। वे एक दूसरे के कार्यक्रम में नहीं जाएं तो चंद लाइनें छप जाती हैं, क्योंकि यह आम बात है, सब जानते हैं कि दोनों के बीच छत्तीस का आंकड़ा है, मगर यदि एक दूसरे के कार्यक्रम में पहुंच जाए तो वह बड़ी खबर हो जाती है, क्योंकि वह चौंकाने वाली है।
बीते दिन कुछ ऐसा ही हुआ। शिक्षा राज्यमंत्री वासुदेव देवनानी व महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री अनिता भदेल दोनों एक भवन के लोकार्पण समारोह में साथ-साथ दिखाई दिए तो वह खबर मीडिया ने तुरंत हॉट केक की तरह उठा ली। असल में घटना इसलिए भी खास थी क्योंकि कार्यक्रम महिला एवं बाल विकास विभाग का था, जिसकी मंत्री खुद अनिता भदेल हैं। इसे श्रीमती भदेल की उदारता माना जाए या कुछ और, मगर यह कम बात नहीं कि लोकार्पण पट्टिका पर भी अनिता भदेल व वासुदेव देवनानी का नाम बराबर में लिखा था। एक टाइम वो भी था, जब दोनों में इस बात को लेकर खींचतान होती थी कि ऊपर किसका नाम आए और नीचे किस का। अधिकारियों को बड़ी मुश्किल होती थी।
खबर की बारीक बात ये है कि देवनानी कोई अनिता के खुद के आमंत्रण पर नहीं गए थे। अनिता ने तो महिला एवं बाल विकास विभाग की उप निदेशक अनुपमा टेलर को कहा था कि देवनानी को भी बुलावा भेजा जाए। एक अधिकारी मात्र के बुलावे पर उनका अनिता के कार्यक्रम में जाना वाकई चौंकाने वाला है। स्वाभाविक रूप से राजनीतिक हलकों में इस बात पर अचरज जताया जा रहा है कि देवनानी यकायक इतना कैसे बदल गए?  क्या कहीं से इशारा था?
इस कार्यक्रम में देवनानी के करीबी माने जाने वाले मेयर धर्मेंद्र गहलोत का भदेल द्वारा लगाए गए शिविर की जमकर तारीफ करना भी चौंकाने वाला माना गया। वैसे किसी के मुंह पर उसकी तारीफ करना एक सामान्य शिष्टाचार वाली बात है।
बहरहाल, इस वाकये जुड़ा एक दिलचस्प पहलु देखिए। देवनानी खुद भले ही अनिता के जुड़े किसी कार्यक्रम में चले जाएं, मगर देवनानी खेमे के नेता, पार्षद आदि ऐसा करने से पहले दस बार सोचते हैं। सोचते क्या, जाते ही नहीं हैं, क्योंकि देवनानी की नाराजगी का डर रहता है। देवनानी भी क्लास लिए बिना नहीं मानते। ठीक ऐसी ही स्थिति अनिता खेमे के नेताओं की है। ताजा कार्यक्रम में भी ऐसा ही हुआ। उपमहापौर संपत सांखला ने औपचारिकता के नाते देवनानी खेमे के नेताओं से भी कार्यक्रम में आने को कहा था, मगर कई इसी कारण नहीं गए कि बाद में देवनानी को पता लगा तो वे खिंचाई कर देंगे। बाद में उन्हें पता लगा तो यही सोचने लगे समरथ को नहीं दोष गुसाईं।
-तेजवानी गिरधर
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मंगलवार, 20 जून 2017

यातायात विभाग में दलालों का बोलबाला?

न जाने कितनी बार यह तय हुआ है कि यातायात विभाग के दफ्तर में जा कर कर्मचारियों से दलाल सीधे नहीं मिलेंगे, मगर आज भी हालत ये है कि वहां दलालों का ही बोलबाला है। आम आदमी तो निर्धारित खिड़कियों पर लाइन लगा कर धक्के खाता है, जबकि दलाल सीधे अंदर जा कर संबंधित कर्मचारियों से काम करवाते हैं।
असल में जो लोग दलालों की बजाय खुद ही वहां काम करवाने जाते हैं, उन्हें कर्मचारी धक्के खिलवाते हैं। सच बात तो ये है कि उनसे सीधे मुंह बात ही नहीं की जाती। चाहे लाइसेंंस बनवाना हो या रिन्यू करवाना हो, या फिर कोई और काम हो, आम आदमी को दलाल से ही संपर्क करने की राय दी जाती है। अगर कोई कहता है कि वह दलाल के पास नहीं जाएगा तो उसे कम से कम तीन-चार चक्कर लगवाए जाते हैं। शहर से दूर होने के कारण आम लोगों को इतने चक्कर लगाने पर बहुत परेशानी होती है, इस कारण तंग आ कर लोग दलालों के पास ही जाते हैं। दलाल अपने मन मुताबिक कमीशन लेते हैं। ऐसा इस कारण भी होता है कि निर्धारित फार्म भरना आम आदमी के बस की बात नहीं होती। उसे यह भी पता नहीं होता कि किसी काम के लिए कौन कौन से दस्तावेज साथ अटैच करने होते हैं। कर्मचारी उसे बताते नहीं और दलाल के पास ही जाने की सलाह देते हैं। हालत ये है कि निर्धारित फार्म भी महकमा उपलब्ध नहीं करवाता, वे बाहर दलालों के पास ही मन मुताबिक रेट पर मिलते हैं। जबकि होना यह चाहिए कि दफ्तर में ही फार्म आदि मिलें और ऐसे कर्मचारियों को बैठाया जाए, जो वे आम आदमी का मार्गदर्शन करें, ताकि उसे दलाल के पास जाने की जरूरत ही नहीं रहे। मगर ऐसा महकमा क्यों करने वाला है? यदि दलाल नहीं कमाएंगे तो कर्मचारियों का भरण पोषण कैसे होगा?
इस मुद्दे पर न जाने कितनी बार मीडिया में खबरें आ चुकी हैं। कई बार जयपुर के बड़े अधिकारियों की मौजूदगी में तय हो चुका है कि दलाल प्रथा को हतोत्साहित किया जाए और दलालों का दफ्तर में प्रवेश वर्जित हो। कुछ दिन तो इस पर अमल होता है, मगर बाद में फिर वही ढर्ऱा शुरू हो जाता है। ऐसा नहीं है कि यहां बैठे अफसरों का इस सिस्टम के बारे में जानकारी नहीं, मगर वे चुप्पी साधे बैठे हैं।
यातायात महकमे के अफसर कितने लाचार हैं, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट बनाने वाली एजेंसी निर्धारित शुल्क से कई गुना अधिक वसूल रही है। अनेकानेक शिकायतें हो चुकी हैं, शिकायतों की पुष्टि भी हो कर जयपुर प्रेषित की जा चुकी है, कई बार मंत्री महोदय की जानकारी में लाया जा चुका है, मगर आज तक लूट जारी है। जब स्थानीय अधिकारियों से पूछा जाता है तो वे यही कहते हैं कि वे तो रिपोर्ट बना कर ऊपर भेज चुके हैं, वहीं से कार्यवाही होगी, हम कुछ नहीं कर सकते।
कुल मिला कर अजमेर के यातायात महकमे से आम आदमी बेहद त्रस्त है, मगर उसका समाधान न तो आज तक निकल पाया है और न ही कोई उम्मीद लगती है।
-तेजवानी गिरधर
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सोमवार, 19 जून 2017

अब क्यों नौटंकी कर रही है यातायात पुलिस?

अजमेर में यातायात पुलिस का ढर्ऱा अरसे से बिगड़ा हुआ है। न तो किसी पुलिस अधीक्षक ने इस पर ध्यान दिया और न ही जनप्रतिनिधियों ने पुलिस प्रशासन पर दबाव बनाया। जब-जब भी कोई हादसा होता है तो पुलिस यकायक मुस्तैद होने का नाटक करती है, मगर चंद दिन बाद फिर वही पहले वाला ढर्ऱा शुरू हो जाता है।
भाजपा पार्षद अनीश मोयल के पुत्र सर्वज्ञ की ट्रैक्टर से कुचलने से हुई मौत के बाद जिला पुलिस ने ट्रैक्टर चालकों के खिलाफ सख्ती बरतना शुरू कर दिया। एक ही दिन में 9 ट्रैक्टर चालकों के खिलाफ यातायात पुलिस ने कार्रवाई की, इनमें से 6 को जब्त किया गया, शेष 3 के खिलाफ नो पार्किंग का चालान बनाया गया। सख्ती का सिलसिला कुछ दिन और चल सकता है। मगर सवाल ये उठता है कि पुलिस हादसा होने के बाद ही क्यों चेतती है? ऐसा नहीं है कि यातायात पुलिस कोसे जाने लायक है, इस कारण कोसी जाती है, हकीकत भी यही है। पूरे शहर में कहीं भी चले जाइये, हर जगह आपको ओवर लोडेड वाहन मिल जाएंगे। ऑटो रिक्शाओं में निर्धारित संख्या से ज्यादा बच्चे मिलते हैं। सिटी बसों में यात्री भेड़-बकरियों की तरह भरे जाते हैं। सिटी बस व टैम्पो वाले अंटशंट स्पीड से चलते हैं। ट्रैक्टर भी निर्धारित गति से ज्यादा स्पीड से चलाए जाते है, जिसकी वजह से ताजा दर्दनाक हादसा हुआ। हर मुख्य चौराहे पर यातायात पुलिस के कर्मचारी तैनात तो होते हैं, मगर वे कितने मुस्तैद होते हैं, इसको बताने की जरूरत इसलिए नहीं है कि पूरे शहर का यातायात अस्त व्यस्त है। अगर वे वाकई कार्यवाही करते तो ये हालात नहीं होते। अर्थात दाल में कुछ काला है। सबको दिख रहा है कि क्या माजरा है, मगर किसी को कोई लेना-देना नहीं। न पुलिस अधिकारियों को और न ही जनप्रतिनिधियों को। ऐसे में अगर आप उम्मीद करें कि यातायात सुव्यवस्थित रहेगा तो वह बेमानी है।
आपको याद होगा कि पूर्व में भी जब किसी ओवर लोडेड ऑटो रिक्शा के पलटने से स्कूल बच्चे चोटिल हुए हैं तो प्रशासन यकायक मुस्तैद हो जाता है। यातायात समिति की बैठकें होती हैं। नए सिरे से निर्देश जारी होते हैं, मगर नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात वाला नजर आता है।
इस बार भी जब हादसे के बाद प्रिंट, इलैक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया ने पुलिस पर तंज कसे तो पुलिस अधीक्षक राजेन्द्र सिंह ने मुस्तैदी दिखाई। यह स्थिति भी इस कारण आई कि हादसे का शिकार एक भाजपा पार्षद का मासूम पुत्र हुआ था। अगर आम बच्चा होता तो इतनी चर्चा ही नहीं होती।
कितनी अफसोसनाक बात है कि हादसे के बाद पुलिस अधीक्षक कह रहे हैं कि यातायात थाना पुलिस ट्रैक्टरों के बेकाबू रफ्तार पर लगाम लगाने के लिए विशेष अभियान शुरू कर रही है। तेज रफ्तार से ट्रैक्टर दौड़ाने वाले, शराब पीकर ट्रैक्टर चलाने वाले, ओवर लोडिंग के अलावा प्राइवेट लाइसेंस पर ट्रैक्टर का कॉमर्शियल इस्तेमाल करने वाले चालकों के खिलाफ पुलिस सख्ती से पेश आएगी। पुलिस के इंटरसेप्टर वाहन मुस्तैदी से तैनात हैं, तेज रफ्तार से वाहन दौड़ाने वालों पर शिकंजा कसेगा। यह सब हादसे से पहले क्यों नहीं होता?
-तेजवानी गिरधर
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शनिवार, 17 जून 2017

ऐसे शिविरों को रोक क्यों नहीं दिया जाता?

पिछले कितने दिनों से मीडिया में लगातार यह खबर सुर्खी में है कि मुख्यमंत्री शहरी जन कल्याण शिविर नाकामयाब हैं, मगर प्रशासन तो लकीर के फकीर की तरह कवायद किए जा रहा है और सरकार भी है कि ऐसे शिविरों को निरंतर जारी रखे हुए हैं, मानों डाक्टर ने कहा हो या किसी पंडित ने सलाह दी हो।
कितने अफसोस की बात है कि मीडिया यह तथ्य लिख लिख कर नहीं  थक रहा कि मुख्यमंत्री शहरी जन कल्याण शिविर पूरी तरह से फ्लॉप शो साबित हो रहे हैं, आम जनता भी इस खबर को पढ़ पढ़ का ऊब गई है, मगर सरकार व प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही।
असल में इन शिविरों की नामकामयाबी की मुख्य वजह कच्ची बस्ती में पट्टे नहीं दिए जाने और सरकारी भूमि का नियमन नहीं होना है। खुद सरकार ही इस मामले में असमंजस में रही। पहले कच्ची बस्ती पट्टे एवं सरकारी भूमि पर नियमन की बात कही गई, लेकिन जैसे ही शिविर शुरू हुए सरकार ने दोनों अहम मुद्दे हटा लिए। नतीजा ये रहा कि आम आदमी की रुचि इन शिविरों में समाप्त हो गई। असल में ऐसे शिविरों को इंतजार इसीलिए रहता है कि इनमें पट्टे व नियमन इनमें आसानी से हो जाते हैं। सबको पता है कि पट्टे जारी करने व नियमन के मामले इतने कॉम्प्लीकेटेड होते हैं कि फाइलों को एक सीट से दूसरी सीट तक खिसकने में कछुआ चाल की याद आ जाती है। लोगों की जूतियां दफ्तर के चक्कर लगाते लगाते घिस जाती हैं।  बरसों लग जाते हैं। शिविर में चूंकि संबंधित सभी अफसर व कर्मचारी मौजूद होते हैं और उन्हें पता होता है कि उन्हें यही काम करना है, इस कारण वहां ऐसे मामले निपट जाते हैं। बाकी के काम तो रुटीन में चलते ही हैं। उनके लिए शिविर की जरूरत ही नहीं होती। मगर सरकार को ये बात समझ में ही नहीं आई।
हालत ये है दिनभर अधिकारी एवं कर्मचारी लोगों के इंतजार में बैठे नजर आते हैं। जो कार्य आम दिनों में दफ्तरों में संपादित होते हैं, वही कार्य शिविर में हो रहे हैं, जिनमें से प्रमुख रूप से जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, विवाह पंजीयन, भामाशाह कार्ड वितरण, एसबीएम के तहत व्यक्तिगत शौचालयों के लिए राशि का वितरण आदि हैं। शिविरों में आवक न होने की खबरें लगातार आ रही हैं, मगर प्रशासन व सरकार ढर्रे पर ही चल रहे हैं। अनुमान लगाइये कि जिन शिविरों से कोई लाभ नहीं हो रहा, उन पर टेंट, कुर्सियां, कूलर व अन्य इंतजामात पर कितना खर्च हो रहा है। इसके अतिरिक्त जो कर्मचारी दफ्तर में कुछ काम भी कर लेता, वह शिविर में आ कर निठल्ला बैठा है। इसका कितना नुकसान हो रहा है, इसको देखने वाला कोई नहीं है। ऐसा हो सकता है कि शिविर समापन पर प्रशासन व सरकार ऐसे आंकड़े देने की कोशिश करें कि देखो शिविर कितने कामयाब रहे, मगर जब बारीकी से देखा जाएगा तो यही सामने आएगा कि आम जन के वे काम ही हो पाए हैं, जो कि आम दिनों में आसानी से होते हैं। उनके लिए शिविर की जरूरत ही नहीं थी।
सबसे अफसोसनाक बात ये है कि सरकार को यह परवाह भी नहीं कि उसकी भद पिट रही है। उसकी छवि खराब हो रही है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आम जनता का भरोसा सरकार पर रह ही नहीं गया। मगर नीति निर्धारक हैं कि उनकी नींद ही नहीं खुल रही। कदाचित ऐसी स्थिति को ही किसी जमाने में पोपा बाई का राज की उपमा दी गई होगी, जो कि कहावत बन गई।
-तेजवानी गिरधर
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शुक्रवार, 16 जून 2017

भाजपा मानसिकता के व्यापारी अब कोस रहे हैं सरकार को

जीएसटी का विरोध बढ़ता ही जा रहा है। व्यापारी त्रस्त है। अब तो भाजपा मानसिकता के व्यापारी भी सरकार की इस नीति के खिलाफ खुसरफुसर कर रहे हैं। कुछ व्यापारी तो खुल कर विरोध प्रदर्शन भी कर रहे हैं। गत दिवस राजस्थान कपड़ा व्यापार महासंघ जी.एस.टी. संघर्ष समिति के आह्वान पर अजमेर वस्त्र व्यापारिक संघ के सभी कपड़ा व्यापारी सदस्यों ने अपने व्यापारिक प्रतिष्ठानों को बन्द करके कपड़े पर जी.एस.टी 5 प्रतिशत लगाने के विरोध में हड़ताल कर प्रदर्शन किया। इसमें अधिसंख्य भाजपा मानसिकता के व्यापारी थे। उन्होंने चेताया कि आगामी 26 जून तक यदि भारत सरकार ने कपड़े से जी.एस.टी. नहीं हटाया तो कपड़ा व्यवसायी अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले जायेंगे। समझा जा सकता है उनका दर्द कितना गहरा है।
ज्ञातव्य है कि आमतौर पर व्यापारी वर्ग भाजपा मानसिकता का माना जाता है। अब जब कि केन्द्र में भाजपा की सरकार है तो उन्हें इस बात का मलाल है कि आजादी के बाद 70 वर्ष में किसी भी सरकार ने कपड़े पर कोई भी टैक्स नहीं लगाया, जबकि मौजूदा सरकार इस पर आमादा है।
संघ की ओर से जारी विज्ञप्ति से ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इस हड़ताल में किस प्रकार भाजपा मानसिकता के व्यापारियों ने हिस्सा लिया। जरा उन नामों पर गौर कर लीजिए:- मुख्य कार्यकारिणी अध्यक्ष सुरेशचन्द गुप्ता, सचिव प्रवीनचन्द जैन, भगवान चन्दीराम, मुकेश सेठी, राजकुमार गर्ग, अशोक राठी, मुकेश गोयल, कमलेश शर्मा, सुन्दर भाई, किशन गोपाल गुप्ता, कैलाश अग्रवाल, शिवशंकर बाड़मेरा, रमेश शर्मा, मुकेश जैन, सुनिल गदिया, ललित अग्रवाल, किशोर सतरानी, दुर्गेष सन्तूमल, परमानन्द, सन्देश मॉयल साडी। कम से कम व्यापारी वर्ग तो जानता है कि इनमें कितने भाजपा मानसिकता के हैं।
ज्ञातव्य है कि इससे पहले नमकीन व्यापारियों ने विरोध जताया था, जिनमें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अजमेर महानगर प्रमुख सुनील दत्त जैन आगे की पंक्ति में खड़े थे।
इसी प्रकार अन्य वस्तुओं का व्यापार करने वाले भी कसमसा रहे हैं। आपसी बातचीत में वे केन्द्र सरकार को कोस रहे हैं। उन्हें इस बात का ज्यादा अफसोस है कि जब केन्द्र में कांग्रेस सरकार जीएसटी को लाना चाहती थी, तब भाजपा ने उनकी पैरवी करते हुए इसका विरोध किया था और जब भाजपा सत्ता में है तो इसे लागू करने पर अड़ी हुई है।
जाहिर सी बात है कि आज जब भाजपा मानसिकता के व्यापारी परेशान हैं तो कांग्रेसी मानसिकता के लोग इस मुद्दे को हाथोंहाथ लपक रहे हैं। राष्ट्रीय सोनिया गांधी ब्रिगेड कांग्रेस अजमेर के शहर अध्यक्ष राजकुमार गर्ग, राजस्थान प्रदेश यूथ फेडरेशन के प्रदेश संयोजक कमल गंगवाल, सीए प्रकोष्ठ के अध्यक्ष विकास अग्रवाल एवं पूर्व विधि प्रकोष्ठ अध्यक्ष एडवोकेट विवेक पाराशर और वरिष्ठ कांग्रेस नेता शिव बंसल, नीरु दोसाई, असलम खान, सीताराम सांखला, सुनीता सांखला, विभूति जैन, जीनत बानो, विनीता अग्रवाल, शांति लश्कार, आशा कच्छावा, अनुपम शर्मा, अरुणा कच्छावा, राजेश जैसवाल, नीरु गर्ग, अभिलाषा विश्नोई ने तो बाकायदा संयुक्त विज्ञप्ति जारी कर कपड़े पर प्रस्तावित टैक्स से मुक्त किये जाने की मांग को लेकर चल रहे विरोध का समर्थन कर दिया। विरोध के यज्ञ में आहुति देते हुए उन्होंने कहा कि व्यापारी वर्ग नोटबन्दी की वजह से परेशान है, व्यापार ठप्प पड़ा हुआ है, नोटबन्दी के बाद बाजार में अभी तब उठाव आया ही नहीं था कि सरकार जीएसटी जैसा जटिल टैक्स लागू कर रही है, जिसने व्यापारियों की कमर ही तोड़ दी है।
अब देखने वाली बात ये है कि क्या सरकार देशहित का ख्याल रखती है या फिर वोट बैंक खिसकने के डर से पैर पीछे खींचती है।
-तेजवानी गिरधर
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सोमवार, 12 जून 2017

अब योग के जरिए जमीन पर पकड़ मजबूत करेंगे देवनानी

जैसे महिला व बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल अपने अजमेर दक्षिण विधानसभा क्षेत्र में क्रिकेट प्रतियोगिता करके जमीन पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कवायद कर चुकी हैं, ठीक उसी तरह अब शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी भी अजमेर उत्तर में योग शिविर लगा कर कार्यकर्ताओं को लामबंद करने जा रहे हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जन्मशती समारोह के तहत उत्तर विधानसभा क्षेत्र के प्रत्येक वार्ड में दस दिवसीय योग शिविर आगामी 14 से 23 जून तक आयोजित किए जाएंगे। यह शिविर सुबह 5.30 बजे से 7 बजे तक होंगे।
बकौल देवनानी आज संपूर्ण विश्व योग के महत्व को जानने लगा है तथा इसकी विरासत को आमजन तक पहुंचाने के उद्देश्य से यह शिविर आयोजित होंगे, मगर इसे यदि राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो यह आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारी पूर्वाभ्यास है। इससे जहां कार्यकर्ता मोबलाइज होगा, वहीं आम जनता में भी पकड़ बनेगी। शिविर की कामयाबी सुनिश्चित ही समझी जानी चाहिए, क्योंकि अजमेर नगर निगम मेयर धर्मेन्द्र गहलोत खुद इसके संयोजक हैं। रहा सवाल सह संयोजक सुभाष काबरा व सोमरत्न आर्य का तो स्पष्ट है कि उनका उपयोग मैनेजमेंट के लिए किया जा रहा है।  आम जन तक योग और देवनानी की पहुंच बनाने का गणित भी बनाया गया है, जिसके तहत आयोजन समिति में पार्षदों सहित 31 व्यक्तियों को शामिल गया गया है और योग शिविरों के जरिए लगभग 3000 लोगों को जोड़ा जाएगा।
यहां गौरतलब बात ये है कि इस बार शहर भाजपा अध्यक्ष अरविंद यादव को आपत्ति नहीं होगी, जैसी कि उनको अनिता भदेल के मात्र अजमेर दक्षिण में क्रिकेट प्रतियोगिता करने पर हुई थी। स्वाभाविक भी है, जब अनिता केवल अपने इलाके में क्रिकेट प्रतियोगिता करवाती हैं तो देवनानी ने भी अगर केवल अजमेर उत्तर में योग शिविर का आयोजन किया है तो उस पर आपत्ति क्यों होनी चाहिए? लेकिन इससे एक संदेश जरूर जाता है कि भाजपा अजमेर उत्तर व अजमेर दक्षिण में बंटी हुई थी, है और रहेगी। उनको कोई एक नहीं कर पाएगा। शायद ऊपर वालों की मंशा भी यही है कि वे आपस में लड़ते रहें। इससे एक फायदा ये होगा कि दोनों अपने-अपने इलाके में बिजी रहेंगे तो कम से कम से एक-दूसरे के इलाके में टांग नहीं फंसा पाएंगे। यह बात दीगर है कि इससे कार्यकर्ता जरूर असमंजस में रहता है और अपनी अपनी सीमा रेखा में रहने को मजबूर होता है, जबकि शहर एक ही है, चुनाव के लिहाज से जरूर बंटा हुआ है, मगर कार्यकर्ता व जनता तो गुंथे हुए ही हैं। किसी का मकान अजमेर उत्तर में और दुकान अजमेर दक्षिण में है तो किसी का मकान दक्षिण व दुकान उत्तर में है। वो भला उत्तर दक्षिण को अलग-अलग करके कैसे देख सकता है?
-तेजवानी गिरधर
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शनिवार, 10 जून 2017

हासानी होंगे अजमेर उत्तर की टिकट के गंभीर दावेदार

हालांकि आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस में इस वक्त लगभग चुप्पी छायी हुई है, मगर गुपचुप तैयारी तो हर कोई दावेदार कर रहा है। अगर अजमेर उत्तर की बात करें तो यूं तो एकाधिक दावेदार गंभीर रूप से सामने आने वाले हैं, मगर जो सर्वाधिक दमदार दावेदारी करेंगे, उनका नाम है दीपक हासानी। आप जान ही गए होंगे कि ये कौन हैं? माया मंदिर वाले। राजनीतिक गलियारों से छन-छन कर जो जानकारी आ रही है, उसके मुताबिक हासानी टिकट हासिल करने के लिए साम दाम दंड भेद, सभी हथियार आजमाने की स्थिति में हैं।
असल में वे एक अच्छे लाइजनर हैं। न केवल कांग्रेस, अपितु भाजपा के भी बड़े-बड़े नेताओं से उनके संपर्क हैं। प्रदेश के कई बड़े अधिकारियों से भी उनके घनिष्ठ संबंध हैं। बड़े व्यवसायी होने के कारण उनके संबंध अजमेर के प्रमुख व्यापारियों से हैं। जयपुर से लेकर दिल्ली तक उनके लिए जैक लगाने वाले अनेक हैं। इसके अतिरिक्त सबसे बड़ी बात ये है कि वे पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत के खासमखास दोस्त हैं। स्थानीय स्तर पर पूर्व विधायक डॉ. श्रीगोपाल बाहेती का उन पर वरदहस्त है। समझा जा सकता है कि अगर उन्होंने तय ही कर लिया कि टिकट लाना है, उनके पास कितनी साधन-संपन्नता है। जानकारी के अनुसार उन्होंने ग्राउंड पर भी चुनावी नजरिये से लोगों से संपर्क बनाना शुरू कर दिया है। फिलवक्त जमीनों संबंधी कुछ मसलों को सुलझाने में लगे हैं, मगर समझा जाता है कि जल्द ही जाजम बिछाएंगे।
ऐसा नहीं कि वे पहली बार दावेदारी कर रहे हैं। इससे पूर्व भी उनकी महत्वाकांक्षा रही है। पिछली कांग्रेस सरकार में तो वे नगर सुधार न्यास का अध्यक्ष बनने के बहुत करीब पहुंच चुके थे।
यूं गैर सिंधियों में शहर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष महेन्द्र सिंह रलावता एक मात्र प्रबल दावेदार हैं, मगर चूंकि इस बार ऐसा माना जाता है कि कांग्रेस किसी सिंधी को ही टिकट देगी, इस कारण यहां केवल सिंधी दावेदारों की चर्चा की जा रही है। अगर अन्य दावेदारों की बात करें तो कर्मचारी नेता व सामाजिक कार्यकर्ता हरीश हिंगोरानी, पूर्व पार्षद रश्मि हिंगोरानी, पूर्व पार्षद सुनील मोतियानी सरीखे भी खम ठोक कर टिकट मांगने वाले हैं। पुराने दावेदार राजस्थान सिंधी अकादमी के पूर्व अध्यक्ष डॉ. लाल थदानी व युवा कांग्रेस नेता नरेश राघानी  भी दावेदारी कर सकते हैं, मगर फिलवक्त कुछ पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वे अपने पत्ते नहीं खोल रहे। इसी प्रकार रेलवे कर्मचारी नेता मोहन चेलानी का नाम भी चलाया जा रहा है। एक नाम बंटी जयसिंघानी का भी बताया जाता है। उनके पास भी टिकट लाने की जुगत बताई जाती है। राज दरबार अगरबती वाले राजकुमार लुधानी भी पिछली बार की तरह ऐन वक्त पर भागदौड़ कर सकते हैं। मॅस्काट स्कूल वाले गुलाब मोतियानी का नाम भी तैर रहा है। ऐसे ही कुछ और नाम भी हो सकते हैं। यानि कि इस बार टिकट के दावेदारों की फेहरिश्त काफी लंबी हो सकती है। कई धनपति भी हाथ आजमा सकते हैं। असल में यह सब इस कारण हो रहा है कि सभी को मैदान खाली लग रहा है। पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष नरेन शहाणी भगत कांग्रेस छोड़ चुके हैं और अभी रिश्वत प्रकरण से जूझ रहे हैं, वरना उनके मुकाबले का दावेदार एक भी नहीं है।
-तेजवानी गिरधर
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शुक्रवार, 9 जून 2017

कुछ खास उत्साह नजर नहीं आया मनोनीत पार्षदों के शपथ ग्रहण में

लंबी प्रतीक्षा के बाद अजमेर नगर निगम में मनोनीत छह पार्षदों के शपथ ग्रहण समारोह में कुछ खास उत्साह नजर नहीं आया। हालांकि शपथ ग्रहण संक्षिप्त और सादा सा था, मगर भाजपा पार्टी कार्यकर्ताओं में जैसा उत्साह नजर आना चाहिए था, वैसा कुछ नजर नहीं आया। कुल जमा डेढ़ सौ से ज्यादा की भीड़ नहीं थी। नारेबाजी भी फीकी ही थी। अधिसंख्य पार्टी पदाधिकारी इस मौके पर मौजूद नहीं थे। कुछ एक पार्षदों के अतिरिक्त मनोनीत पार्षदों के व्यक्तिगत समर्थक ही आए। गिनाने लायक नाम शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी, नगर निगम महापौर धर्मेन्द्र गहलोत, उपमहापौर संपत सांखला, पार्षद नीरज जैन, जे. के. शर्मा, भागीरथ जोशी, जिला महामंत्री रमेश सोनी, जयकिशन पारवानी, महेंद्र जादम, अनीश मोयल, चन्द्रेश सांखला, संदीप गोयल, राजू साहू, महेंद्र जैन मित्तल, धर्मेंद्र शर्मा, रचित कच्छावा, अनिल नरवाल, मोहन ललवानी, रंजन शर्मा, दुर्गाप्रसाद शर्मा, प्रकाश बंसल, अमित यादव आदि महेन्द्र जादम इत्यादि थे। चूंकि महिला व बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल बाहर हैं, इस कारण उनकी अनुपस्थिति रही। देवनानी समय पर आ गए, मगर मनोनीत पार्षद एक-एक करके आए। शहर अध्यक्ष यादव को विलंब हो गया। देवनानी ने उनका इंताजार करने को कहा। उनके आने के बाद मनोनीति पार्षदों को शपथ दिलवाई गई।
असल में मनोनीत पार्षदों में भी कुछ खास खुशी इस कारण भी नहीं थी कि लंबे इंतजार के बाद उनके नामों की घोषणा हुई। नामों की सूची छह माह पहले ही सरकार को भेजी जा चुकी थी। नाम भी फाइनल ही थे, मगर किसी न किसी कारण से घोषणा अटकी हुई थी। अब उनके पास काम करने को तकरीबन डेढ़ साल ही बचा है। अगर विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा सरकार रिपीट हुई तो संभव है उन्हें तीन साल का कार्यकाल पूरा करने का मौका मिल जाए। अगर कांग्रेस सरकार आई तो निर्वाचित निगम बोर्ड तो यथावत रह जाएगा, मगर मनोनीत पार्षदों को हटा दिया जाएगा।
ज्ञातव्य है कि मनोनीत पार्षदों में तीन प्रो. देवनानी व तीन श्रीमती अनिता भदेल की सिफारिश पर नियुक्त हुए हैं। देवनानी खेमे के बलराम हरलानी, सुरेश गोयल व धर्मेन्द्र चौहान और श्रीमती अनिता भदेल की अनुशंसा पर सोहनलाल शर्मा, मोहन राजोरिया व राजेश घाटे को मनोनीत पार्षद बनाया गया है।
यहां बता दें कि शहर की प्रतिष्ठित फर्म दुर्गा ऑयल मिल के प्रोपराइटर बलराम हरलानी कृषि उपज मंडी समिति (अनाज) के उपाध्यक्ष रहे हैं और वर्तमान में डायरेक्टर हैं। वे शहर भाजपा पुरुषार्थी प्रकोष्ठ के अध्यक्ष एवं बैंकिंग प्रकोष्ठ के संयोजक भी रहे हैं। हालांकि अजमेर उत्तर में देवनानी की दावेदारी के रहते अथवा उनके इशारे के बिना कभी अजमेर उत्तर से टिकट की दावेदारी नहीं करेंगे, मगर आने वाले समय के लिए तैयार हो रही खेप के चुनिंदा लोगों में जरूर शामिल हो गए हैं। अजमेर विद्युत वितरण निगम से सेवानिवृत्त सुरेश गोयल भाजपा के मीडिया प्रकोष्ठ संयोजक स्वर्गीय शरद गोयल के पिता हैं। धर्मेंद्र चौहान भाजपा खनन प्रकोष्ठ के संयोजक हैं। इसी प्रकार सोहन लाल शर्मा पूर्व पार्षद रहे हैं और वर्तमान में आदर्श मंडल अध्यक्ष हैं। मोहन राजोरिया और राजेश घाटे शहर भाजपा में जिला मंत्री हैं।
जहां तक जातीय समीकरण का सवाल है अजमेर उत्तर विधानसभा क्षेत्र में सिंधी, बनिया और राजपूत समाज को प्रतिनिधित्व मिला है, जबकि दक्षिण विधानसभा क्षेत्र में ब्राह्मण, कोली और महाराष्ट्रियन राजपूत को मौका मिला है।
-तेजवानी गिरधर
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मंगलवार, 6 जून 2017

पुष्कर घाटी में सुरंग के पीछे क्यों पड़ा है एडीए?

जानकारी के अनुसार पुष्कर घाटी में सुरंग बनाने की योजना के सिलसिले में कंसल्टेंट सेवाओं के लिए अजमेर विकास प्राधिकरण ने एक बार फिर मशक्कत शुरू कर दी है। सुरंग के सर्वे के लिए कंसल्टेंट तय करने के लिए निविदा जारी की गई है। इसके लिए प्री बिड मीटिंग 13 जून को रखी गई है। ऑनलाइन बिड सबमिट करने की तारीख 21 जून तय की गई है और 23 जून को टेक्निकल बिड खोली जाएगी।
यह एक अच्छी बात है कि यात्रियों की सुविधा के लिए प्राधिकरण सजग है, मगर सवाल ये उठता है कि जब बहुत पहले ही यह तथ्य सामने आ चुका है कि इस घाटी में सुरंग बनाना खतरे से खाली नहीं है तो आखिर क्यों इसको बनाने की कवायद की जा रही है?
आपको बता दें कि इस सुरंग की बात पहले भी कोई चौदह साल पहले आई थी। सन् 1990 में तत्कालीन पुष्कर विधायक व भेड़ ऊन राज्यमंत्री रमजान खान ने सुरंग की मांग उठाई थी। इसके बाद 1998 से 2003 तक भी यहां के विधायक रहते उन्होंने फिर दबाव बनाया। भाजपा के वरिष्ठ नेता औंकार सिंह लखावत ने भी भरपूर कोशिश की। इस पर वन विभाग, सार्वजनिक निर्माण विभाग और राजस्व विभाग ने सर्वे किया। सर्वे में नौसर स्थित माता मंदिर से पुष्कर रोड स्थित चमत्कारी बालाजी मंदिर तक के मार्ग का सुरंग बनाने के लिए चयन किया गया। इसमें नौसर से बालाजी के मंदिर तक पहाड़ी को काटते हुए सुरंग बनाने का प्रस्ताव तैयार किया गया। इस मार्ग की कुल लंबाई महज आधा किलोमीटर आई, जबकि घाटी से चलने पर यह रास्ता करीब ढाई किलोमीटर का होता है। सर्वे में यह बात स्पष्ट रूप से सामने आई थी कि अजमेर व पुष्कर को अलग करने वाली पहाड़ी इतनी मजबूत व सख्त नहीं है कि वहां सुरंग खोदी जा सके। अगर सुरंग खोदी गई तो वह कभी भी ढ़ह सकती है। सुरंग के व्यावहारिक धरातल पर संभव न होने की वजह से ही अजमेर को पुष्कर से जोडने के लिए रेल लाइन के प्रस्ताव पर काम किया गया, जिसमें औंकार सिंह लखावत ने अहम भूमिका निभाई थी। ऐसे में जाहिर तौर पर सुरंग का प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया।
एडीए में शिवशंकर हेड़ा की अध्यक्ष पद पर नियुक्ति के बाद सुरंग बनाने की योजना पर फिर कार्रवाई शुरू हुई। इस बाबत एडीए की 1 दिसंबर 2016 को हुई बोर्ड बैठक में प्रस्ताव भी पारित हो गया और सर्वे के लिए निविदा आमंत्रित की गई। पहले तो सर्वे के लिए कंसलटेंट फर्म ही नहीं मिली। दूसरी बार एडीए ने दस लाख रुपए की निविदा निकाली तो एक कंपनी ने केवल फिजिबिलिटी और सर्वे पर ही साढ़े चार करोड़ रुपए खर्च बता दिया। इसे निरस्त करने के बाद एडीए प्रशासन फिर से सुरंग के लिए सर्वे रिपोर्ट तैयार करने में जुट गया है।
सवाल ये उठता है कि जब पुष्कर घाटी में सुरंग बनाना उचित नहीं है तो प्राधिकरण क्यों इसके पीछे पड़ा है? पूर्व में इस कवायद पर 15 लाख रुपए पूरे हो चुके हैं, क्या प्राधिकरण कुछ और राशि बर्बाद करके ही मानेगा?
एक सवाल ये भी है कि सुरंग की बात तब आई थी, जब कि वैकल्पिक मार्ग नहीं था, अब तो रेलवे मार्ग के अतिरिक्त बाईपास भी है, फिर क्यों घाटी के सौंदर्य के साथ छेड़छाड़ की जा रही है?
-तेजवानी गिरधर
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अपनी सरकार के निर्णय के विरुद्ध ही आना पड़ा देवनानी व जैन को

केन्द्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल को ज्ञापन देते सुनील दत्त जैन
प्रदेश के शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी व अजमेर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख सुनील दत्त जैन को अपनी ही पार्टी की केन्द्र सरकार के निर्णय के खिलाफ आगे आना पड़ गया। मुद्दा ये है कि सरकार ने हाल ही जीएसटी लागू करने का जो निर्णय किया है, उसकी वजह से नमकीन के सभी प्रकार के उत्पाद पर 5 प्रतिशत वेट की बजाय 12 प्रतिशत टैक्स लगा दिया गया है। यह निर्णय आगामी 1 जुलाई से लागू होगा।
असल में इस सिलसिले में राजस्थान के प्रमुख नमकीन कारोबारियों की एक बैठक हुई। इसमें राजस्थान नमकीन महासंघ बनाया गया, जिसमें हालांकि जैन ने कोई बड़ा जिम्मेदार पद नहीं लिया, मगर समझा जा सकता है कि उनका जो कद है, उसके मद्देनजर महासंघ में उनकी भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होगी। यह कम बात नहीं कि नमकीन कारोबारियों की बैठक में राज्य सरकार के राज्य मंत्री प्रो. देवनानी भी मौजूद रहे। समझा जा सकता है कि वे किसके कहने पर बैठक में पहुंचे। यह सर्वविदित ही है कि जैन भी अजमेर के एक प्रमुख नमकीन कारोबारी हैं। इस कारण जीएसटी की वजह से इस कारोबार पर पडऩे वाले असर पर उनकी बारीक पकड़ होगी ही।
जैन सहित सभी नमकीन कारोबारियों का तर्क है कि राजस्थान शुष्क प्रदेश है, इस कारण यहां नमकीन का उपयोग सब्जी के बतौर भी किया जाता है। अर्थात यह आम उपयोग की वस्तु है। अकेले राजस्थान में टैक्स बढ़ाने से 10 लाख लोग प्रभावित होंगे। राज्य में नमकीन का कारोबार कुटीर उद्योग की तरह हैं। हजारों परिवारों की आजीविका इस उद्योग पर निर्भर है। यदि 12 प्रतिशत टैक्स वसूला गया तो टैक्स चोरी की संभावना भी बढ़ जाएगी। उनकी बात में दम है। इस प्रकार का असर अन्य उद्योगों पर भी पड़ रहा होगा, मगर चूंकि खुद जैन नमकीन कारोबारी हैं, इस कारण उन्हें अपनी जमात की खातिर सरकार के निर्णय के विरुद्ध आगे आना पड़ा।
बहरहाल, असल मुद्दा ये भी है कि क्या केन्द्र सरकार ने राजस्थान के हालात का सर्वे किए बिना ही नमकीन पर टैक्स बढ़ाने का निर्णय कर लिया। स्पष्ट है कि इस प्रकार का निर्णय सरकारी कारिंदों ने एसी चैंबर में बैठ कर किया है, जिस पर सरकार ने बिना सोचे मुहर लगा दी। कदाचित इसके पीछे एक सोच ये भी रहती होगी कि एक बार तो निर्णय सुना दो, फिर जिसको जो तकलीफ होगी, वह सामने आएगा, और तब उस पर विचार किया जाएगा। मगर ऐसा भी तो हो सकता था कि निर्णय लागू करने से पहले संबंधितों से भी चर्चा की जाती, ताकि टैक्स घोषित करने और उसके बाद विशेष परिस्थिति के मद्देनजर वापस या कम करने की कवायद नहीं करनी पड़ती।
अव्वल तो अभी ये देखने वाली बात है कि क्या सरकार राजस्थान नमकीन महासंघ के तर्क से सहमत होती भी है या नहीं? अगर इसी प्रकार अन्य उद्योगों के व्यवसायी अथवा अन्य राज्यों के लोग भी किसी अन्य उत्पाद को लेकर टैक्स कम करने की मांग करने लगेंगे तो बात कहां तक जाएगी। खैर, महासंघ ने मांग रखी है। देवनानी मुख्यमंत्री और जीएसटी काउंसिल की सदस्य श्रीमती वसुंधरा राजे से बात करेंगे। अगर वे सहमत हो भी गईं तो उन्हें जीएसटी काउंसिल पर दबाव बनाना होगा। इसमें कितना समय लगेगा, तब तक तो टैक्स लागू करने की तारीख 1 जुलाई आ ही जाएगी। कुल मिला कर यह अच्छी बात है कि नमकीन कारोबारियों ने भले ही अपने हित की खातिर मुद्दा उठाया है, उसका लाभ अंतत: आम आदमी को ही मिलेगा।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

शनिवार, 3 जून 2017

सात साल पहले की थी ऐसे एलिवेटेड रोड की कल्पना

काफी जद्दोजहद के बाद आज जिस बहुप्रतीक्षित व बहुअपेक्षित एलिवेटेड रोड को बनाए जाने का रास्ता खुला है, उसका सपना बहुत पुराना है। दैनिक नवज्योति के प्रधान संपादक श्री दीनबंधु चौधरी ने सिटीजंस कौंसिल के माध्यम से सबसे पहले इसकी मांग पुरजोर तरीके से उठाई थी। अन्य स्वयं सेवी संगठनों व सामाजिक संस्थाओं ने भी इस पर जोर दिया। करीब सात साल पहले प्रकाशित पुस्तक अजमेर एट ए ग्लांस में स्वामी समूह के सीएमडी श्री कंवल प्रकाश किशनानी ने अपने आलेख में इसकी जरूरत प्रतिपादित की। इतना ही नहीं, उन्होंने एलिवेटेड रोड का एक काल्पनिक चित्र भी आलेख के साथ दिया। दिलचस्प बात है कि उस चित्र में रेलवे स्टेशन परिसर में कुछ बहुमंजिला इमारतें दर्शाईं तो लोगों ने कहा कि ऐसा भले कैसे संभव हो सकता है। मगर आज आप देखिए बिलकुल वैसी की एक बहुमंजिला इमारत इस वक्त निर्माणाधीन है, जो श्री किशनानी के स्वप्र दृष्टा होने का आभास कराती है। आपको ख्याल होगा कि ये वही शख्स है, जिसने अजमेर की महानगरीय दिशा में कदम उठाते हुए शहर को पहला व्यावसायिक कॉम्पलैक्स, स्वामी कॉम्पलैक्स दिया था।

शुक्रवार, 2 जून 2017

स्मार्ट सिटी के साथ स्मार्ट हो रही हैं अनिता भदेल

जैसे जैसे अजमेर स्मार्ट सिटी बनने की ओर बढ़ रहा है, यहां की कई चीजें, बातें, रोड, लुक आदि,  सभी बदल रहे हैं। ऐसे में भला हमारे की यहां की राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल कैसे पीछे रह सकती हैं। उनके फेसबुक अकाउंट से अजमेर वासियों ने जाना वे इन दिनों पेरिस में हैं। चौंकाया उनके पेरिस में होने ने नहीं, बल्कि उनके बदले बदले अंदाज ने। उस अंदाज का वर्णन बेमानी है, खुद आप ही देख लीजिए। सहसा आपको यकीन ही नहीं होगा कि क्या ये भोली भाली, सीधी सादी, सादगीपसंद अनिता भदेल ही हैं। उनके इस लुक की अजमेर वासियों में दिन भर चर्चा रही। यह ठीक है कि वे मंत्री हैं, इस कारण उन्हें अपनी वेशभूषा, अंदाज आदि का पूरा ख्याल रखना होता है। मगर आखिर उनका भी नारी मन है। पेरिस में जाने पर अपनी पर आ गया। बहरहाल, जो कुछ भी हो, वे लग बेहद खूबसूरत रही हैं।

गुरुवार, 1 जून 2017

कलैक्टर साहब, क्या ऐसे लोकतंत्र की हत्या नहीं हो जाएगी?

सम्मानीय कलैक्टर साहब,
आपने हाल ही आदेश जारी किए हैं कि सरकारी कर्मचारियों के साथ अभद्रता होने पर पुलिस तुरंत मुकदमा दर्ज करेगी। आपने ऐसा इसलिए किया ताकि कर्मचारी भयमुक्त हो कर कार्य कर सकें। असल में आपने ऐसा राजकार्यों के निवर्हन के दौरान असामाजिक व्यक्तियों द्वारा व्यवधान किए जाने के संदर्भ में कहा है। बेशक आपका आदेश सराहनीय है। ऐसा होना ही चाहिए।
सच तो ये है कि यह व्यवस्था पहले से ही है। बाकायदा कानून बना हुआ है। आपने कोई नया आदेश जारी नहीं किया है। आपने रिपीट मात्र किया है। मगर जितना जोर देकर कहा है, उसके दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं। कहीं ऐसा न हो कि आपका कर्मचारी निरंकुश हो जाए? अव्वल तो यह कैसे तय मान लिया जाए कि हर कर्मचारी ईमानदार है? एक बारगी मान भी लिया जाए, मगर वह जिस पर कार्यवाही कर रहा है, उसकी भी कोई अपेक्षा हो सकती है। क्या हर बार जनता का व्यक्ति गलत ही होता है और कर्मचारी हर बार सही? मान लो किसी व्यक्ति के साथ कोई कर्मचारी ज्यादती कर रहा है, तो उसे कौन तय करेगा कि वह ठीक कर  रहा है? फिर अभद्रता का पैरामीटर क्या है? बेशक कर्मचारी के साथ हाथापाई करना राजकाज में बाधा है, मगर केवल विरोध दर्ज करने मात्र को भी तो कर्मचारी राजकाज में बाधा मान कर पुलिस को शिकायत कर सकता है। हो सकता है कि आपका तर्क ये हो कि मौके पर कर्मचारी जो कर रहा है, उसे करने दिया जाए, अगर शिकायत है तो उच्च अधिकारी से कहा जाए। मगर जिस तरह का आदेश है, उसे देखते तो यही लगता है कि आम आदमी की सुनवाई उच्च अधिकारी भी करने वाला नहीं है, वह अपने कर्मचारी का ही पक्ष लेगा।
उदाहरण के तौर पर कर्मचारी किसी का कथित अतिक्रमण हटा रहा है। अगर दूसरे पक्ष के पास दस्तावेजी सबूत हैं कि वह अतिक्रमण नहीं है, या फिर कोर्ट का स्थगनादेश है, तो क्या वह इस डर से कि अगर विरोध करूंगा तो मेरे खिलाफ मुकदमा दर्ज हो जाएगा, वह चुपचाप रह जाए? कर्मचारी तो तोडफ़ोड़ करके चला जाएगा, यह बाद की बात है कि कोर्ट की अवमानना साबित होने पर कोर्ट कर्मचारी के खिलाफ फैसला करेगा। मगर तब तक तो जो तोडफ़ोड़ हुई है, उसका नुकसान तो आम आदमी ही भुगतेगा ना? ऐसे अनेक मामले सामने आते रहे हैं, जबकि जबरन कार्यवाही के दौरान गेहूं के साथ घुन भी पिस गया, बाद में जा कर कर्मचारी को कोर्ट की फटकार लगी।
ऐसे अनेक प्रकार के मामले हो सकते हैं। कम से कम आमजन को मौके पर अपना पक्ष रखने का अधिकार तो होना ही चाहिए। विरोध जताने का भी अधिकार होना चाहिए। यदि कोई विरोध स्वरूप अपनी बात कह रहा है और आपके कर्मचारी ने उसे अभद्रता मान लिया तो पुलिस तो आम आदमी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लेगी।
काश, आपने जरा इसका भी ख्याल कर लिया होता कि आखिरकार हम लोकतांत्रिक देश में रह रहे हैं, जिसमें जनता व जनहित ही सर्वोपरि है। राजकाज करने वालों को पूरी निष्पक्षता के साथ काम करने की छूट होनी ही चाहिए, मगर वे निरंकुश न हो जाएं, इसको लेकर आपने एक भी शब्द नहीं कहा, जिससे एक बारगी ऐसा आभास होने लगा मानो हम प्रजातंत्र में नहीं बल्कि राजतंत्र में जी रहे हों। अजमेर के कार्यकाल में आपने जो निष्पक्षता, कर्मठता से जनहित के काम में आ रही बाधाओं को तुरंत हटाया है, उससे आपकी छवि एक सख्त अफसर की भी बनी है। कहीं ऐसा न हो कि आपकी इसी छवि की आड़ में भ्रष्ट व बेईमान कर्मचारी आपके आदेश का दुरुपयोग न करने लगें?
-तेजवानी गिरधर
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बुधवार, 31 मई 2017

अपने सचिव तक को नहीं रोक पाए धर्मेश जैन

एक कहावत है कि जब जहाज डूबने लगता है तो उसमें निवास करने वाले चूहे पहले ही कूद-कूद कर भागने लगते हैं। कुछ इसी तरह की एक मारवाड़ी कहावत मैने अजमेर डेयरी अध्यक्ष रामचंद्र चौधरी से कभी सुनी थी कि भांस मरबा लागे, तो चींचड़ा छोड-छोडर भागै, अर्थात भैंस मरने वाली हो तो उसके शरीर से चिपक कर अपना जीवनयापन पीने वाले जीवाणुओं को पहले ही पता लग जाता है और वे छोड़ कर भाग जाते हैं। ये कहावतें कहने-सुनने में तो ठीक हैं, मगर लिखने की बात हो तो मैं यही कहूंगा कि जैसे ही कोई सत्ता विहीन होने लगता है तो उसके साथी उसे छोड़ कर भाग जाते हैं। यही संभ्रांत तरीका है। बात चूंकि संभ्रांत महानुभावों की है, लिहाजा संभ्रांत ढ़ंग से ही कहा जाए तो ठीक है।
आपको ख्याल होगा कि हाल ही जब महाराणा प्रताप जयंती समारोह का विवाद मीडिया में सुर्खियों में रहा। तत्कालीन नगर सुधार न्यास के सदर धर्मेश जैन को मलाल रहा कि कई साल से वे स्मारक स्थल पर जंयती मनाते रहे, मगर इस बार मौजूदा अजमेर विकास प्राधिकरण अध्यक्ष शिवशंकर हेडा ने कार्यक्रम हथिया लिया। कार्यक्रम क्या, पूर्व में गठित समिति के अधिसंख्य सदस्य भी उन्होंने तोड़ लिए। दिलचस्प बात देखिए कि जैन की समिति के सचिव रहे शिक्षाविद् व इतिहासज्ञ डॉ. नवल किशोर उपाध्याय ने भी पाला बदलने में देर नहीं लगाई। जब हेडा ने अभी सोचा भी नहीं होगा कि जयंती कैसे मनाई जाए, उससे पहले ही जैन व उपाध्याय के हस्ताक्षर से युक्त  पत्र एडीए सचिव को लिख भेजा गया था कि वे हर बार ही तरह इस बार भी जयंती मनाना चाहते हैं, लिहाजा एडीए का सहयोग अपेक्षित है। खैर, उस पत्र पर न कोई कार्यवाही होनी थी, न ही हुई, इस बात का अंदाजा उपाध्याय को हो गया था, लिहाजा जैसे ही हेडा ने एडीए स्तर पर जयंती मनाने कर निर्णय किया तो वे पाला बदल कर उनके पास चले गए। उन्होंने बाकायदा पहले दिन हुए व्याख्यान कार्यक्रम का संयोजन किया। असल में वे ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर वाले शख्स हैं। विद्वान हैं, अच्छे धाराप्रवाह वक्ता हैं, इतिहास के जानकार हैं। जैन ने साथ बुलाया तो उनके साथ हो लिए और हेडा ने बुलाया तो जैन को छोड़ कर उनके साथ हो लिए। उन्हें तो उचित मंच चाहिए होता है। उन्हें इससे क्या मतलब कि इससे जैन नाराज होंगे। नाराज हो भी गए तो क्या, अब सत्ता में तो हेडा जी हैं। खैर, उनकी सदाशयता उनके साथ है, मगर उनके इस पाला बदल से ऊपर लिखी संभ्रांत कहावत तो चरितार्थ होती ही है।

मंगलवार, 30 मई 2017

महाराणा प्रताप जयंती पर एक नहीं, तीन कार्यक्रम हुए

कहां तो पुष्कर घाटी पर नौसर माता मंदिर के पास स्थित महाराणा प्रताप स्मारक पर शिलान्यास से लेकर पिछले साल तक अकेले यूआईटी के पूर्व अध्यक्ष धर्मेश जैन जैसे-तैसे साधन-संसाधन जुटा कर जयंती कार्यक्रम करते थे, मगर अब मूर्ति स्थापना के बाद एक नहीं तीन-तीन कार्यक्रम हुए। मुख्य कार्यक्रम तो अजमेर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष शिव शंकर हेडा ने जैन से छीन ही लिया और उसे तीन दिन का कर दिया। साथ ही दो अन्य कार्यक्रम भी हुए। दिलचस्प बात ये है कि अन्य दो कार्यक्रमों में से एक सीधे तौर पर संघ विचारधारा के संगठन हिंदू जागरण मंच, चित्तौड़ प्रांत की ओर से किया गया। समझा जा सकता है कि वह संघ की उस मुहिम की पूर्ति कर रहा है, जिसके तहत अकबर की बजाय महाराणा प्रताप को हीरो बनाने की कोशिश की जा रही है। इसी प्रकार तीसरा कार्यक्रम अखिल भारतीय घुमंतू गाडिय़ा लुहार समाज का था, जिसके विशिष्ट अतिथि शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी थे। अगर प्रयास किए जाते तो अन्य दो संस्थाओं को भी मुख्य कार्यक्रम में समाहित किया जा सकता था, मगर ऐसा हो नहीं पाया। यहां गौरतलब है कि हेडा से जब पूछा गया था कि जैन को नजरअंदाज क्यों किया जा रहा है तो हेड़ा ने गोलमोल जवाब देते हुए कहा था कि उनके कार्यक्रम में पूरे शहर व कई संस्थाओं को जोड़ा गया है तो सवाल उठता है कि इन दो संस्थाओं को अलग से कार्यक्रम करने की जरूरत क्यों पड़ी?
ज्ञातव्य है प्राधिकरण की ओर से 28 मई को शाम 4.30 बजे सम्राट पृथ्वीराज महाविद्यालय से महाराणा प्रताप स्मारक तक चैतक वाहन रैली निकाली गई। ये रैली महाविद्यालय से होते हुए महाराणा प्रताप स्मारक पर सम्पन्न हुई।
इसी प्रकार हिन्दू जागरण मंच, चित्तौड़ प्रांत द्वारा 27 मई को वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप जयंती पर राष्ट्र गौरव वाहन रैली का आयोजन किया गया। रैली राजकीय महाविद्यालय से प्रारंभ होकर महाराणा प्रताप स्मारक नौसर घाटी पर समाप्त हुई।
इसी प्रकार अखिल भारतीय घुमंतू गाडिय़ा लुहार समाज के तत्वावधान में 28 मई को महाराणा प्रताप जयंती पर शोभायात्रा निकाली गई।
उल्लेखनीय है कि जैन के कार्यकाल में 17 जून 2007 को महाराणा प्रताप स्मारक का शिलान्यास किया गया था। बाद में कांग्रेस सरकार आ गई। उसने इस पर मूर्ति स्थापना में रुचि नहीं दिखाई, हालांकि मूर्ति का ऑर्डर हो चुका था। चूंकि इस स्मारक का सपना जैन ने देखा था, इस कारण उनकी इसमें रुचि थी और स्मारक का वजूद कायम रखने के लिए वे हर साल यहां जयंती कार्यक्रम करते रहे। इसके लिए उन्हें अपने स्तर ही खासी मशक्कत करनी पड़ती थी। अब जब कि हेडा के कार्यकाल में स्मारक पर मूर्ति स्थापना हो चुकी है, तो उस मुख्य कार्यक्रम को हेडा ने हथिया लिया है। इतना ही नहीं दो अन्य संस्थाएं भी जाग गईं। मगर अफसोसनाक बात ये है कि जिसने इस स्मारक का सपना देखा, वह आज पूरी तरह से नैपथ्य में चला गया है। हालांकि यह सही है कि जैन को निमंत्रण पत्र देने स्वयं हेडा उनके निवास पर गए थे, और इसी नाते वे कार्यक्रम में गए भी, समुचित सम्मान भी मिला, मगर दिखे बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना की माफिक। शिक्षा राज्य मंत्री देवनानी ने उन्हें ठीकठाक तवज्जो दी।
-तेजवानी गिरधर
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गुरुवार, 25 मई 2017

विजय जैन के लिए कठिन है बूथ लेवल तक संगठन को मजबूत करना

आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस कमर कसने जा रही है। इसके लिए संगठन को बूथ लेवल तक मजबूत किया जाएगा, मगर अजमेर शहर कांग्रेस अध्यक्ष विजय जैन के लिए यह टास्क कठिन है। उनके पास अपनी कार्यकारिणी नहीं है, जिसके माध्यम से कार्यकर्ताओं को मोबलाइज कर सकें। पूर्व अध्यक्ष महेन्द्र सिंह रलावता के समय की कार्यकारिणी से काम लेना उनकी मजबूरी है। इस कारण अपेक्षित परिणाम आने की उम्मीद कम ही है।
असल में जब रलावता को हटा कर जैन को अध्यक्ष बनाया गया तो यकायक कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार हुआ। चाहे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट के डर से या नई कार्यकारिणी में स्थान पाने की लालच में कार्यकर्ता सक्रिय हो गए। जैन के नेतृत्व में आयोजित कार्यक्रमों में रलावता की तुलना में अधिक उत्साह नजर आने लगा। ऐसा लगा कि कांग्रेस आगामी विधानसभा चुनाव के लिए अंगड़ाई लेेने जा रही है। मगर यह उत्साह शनै: शनै: धीमा पड़ता जा रहा है। जैन को अध्यक्ष बने एक साल से ज्यादा हो गया है, मगर उनकी कार्यकारिणी अब तक नहीं बन पाई है। उधर चुनाव सिर पर हैं और संगठन को मजबूत करने की महती जिम्मेदारी उन पर है, मगर अपनी टीम के अभाव में उन्हें काम करने में दिक्कत आ रही है।
इस परेशानी का इजहार उन्होंने विधानसभा चुनावों के मद्देनजर कांग्रेस की जिलेवार फीडबैक बैठक में भी किया। उन्होंने ब्लॉक अध्यक्षों के रिक्त पदों पर नामों की घोषणा भी जल्दी करने की बात कही। उनका दर्द था कि अग्रिम संगठनों पदाधिकारी पुराने ही हैं, वे भी पार्टी बैठकों में भाग नहीं लेते।
इस सिलसिले में उनके चंद विरोधियों का कहना है कि असल में वे नाकामयाब अध्यक्ष हैं और अपनी कमी छिपाने के लिए कार्यकारिणी न होने का बहान बना रहे हैं। उनका तर्क है कि नई कार्यकारिणी नहीं है तो क्या हुआ, पुरानी के सभी लोग सक्रिय हैं। अगर कोई सहयोग नहीं कर रहा तो उसके बारे में उन्हें जानकारी देनी चाहिए। उन पर आरोप ये भी है कि वे सभी को तालमेल के साथ लेकर नहीं चल रहे। दूसरी ओर धरातल का सच ये है कि खुद की कार्यकारिणी न होने के कारण पुराने पदाधिकारियों को हैंडल करना उनके लिए वाकई कठिन काम है। कुछ तो जैन से भी सीनियर हैं। उनसे भला वे कैसे काम ले सकते हैं। सच तो ये है कि जैन के कार्यकाल की समीक्षा इसलिए नहीं हो सकती क्योंकि उन्हें फ्रीहैंड मिला ही नहीं। बावजूद इसके उनके नेतृत्व में अच्छे कार्यक्रम हुए, उसका श्रेय भले ही अकेले उनके खाते में नहीं जाता।
जो कुछ भी हो, अगर कार्यकारिणी एक साल पहले बन जाती तो आज संगठन का ढ़ांचा कुछ और ही होता। हो सकता है कि उसमें विवाद होते या कुछ कमियां रहतीं, मगर चुनाव से पहले उन्हें दुरुस्त किया जा सकता था। कम से कम कमियां सामने तो आतीं।
खैर, अब जबकि 30 जून तक बूथ लेवल तक की इकाइयों का गठन कर लेने के निर्देश दिए गए हैं, तो उम्मीद की जा रही है कि शहर की कार्यकारिणी व रिक्त ब्लॉक अध्यक्षों की घोषणा भी जल्दी हो जाएगी।
-तेजवानी गिरधर
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बुधवार, 24 मई 2017

धर्मेश जैन की सारी क्रेडिट छीनना चाहते हैं शिवशंकर हेडा

धर्मेश जैन
राजनीति में किए गए काम की क्रेडिट मिले या मिले, कुछ कहा नहीं जा सकता। अजमेर नगर सुधार न्यास के अध्यक्ष धर्मेश जैन के साथ ऐसा ही हुआ है। उन्होंने पुष्कर घाटी पर नौसर माता मंदिर के पास महाराणा प्रताप स्मारक बनाने का सपना देखा, शिलान्यास करवाया और मूर्ति बनवाने का आदेश भी दिया, मगर कार्यकाल बीच में ही छूट गया। बाद में अजमेर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष शिव शंकर हेडा बने और उनके कार्यकाल में मूर्ति स्थापना हुई तो उसकी सारी क्रेडिट वे ही लेना चाह रहे हैं। हालत ये है कि शिलान्यास से लेकर अब तक हर साल जैन वहां महाराणा प्रताप जयंती पर कार्यक्रम करते रहे हैं, मगर इस बार मूर्ति स्थापना के बाद हो रहे कार्यक्रम से जैन को पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया गया है। हालांकि उन्होंने इस बार भी कार्यक्रम करने की अनुमति का पत्र बहुत पहले एडीए को दे दिया, मगर हेडा के कहने पर उसे रद्दी की टोकरी दिखा दी गई। अब हेडा खुद एडीए के स्तर पर जयंती का कार्यक्रम करने जा रहे हैं।
गत दिवस जयंती समारोह की जानकारी देने के लिए हेडा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने कहा कि महाराणा प्रताप स्मारक एडीए ने मात्र साढ़े तीन महीने में तैयार किया गया। इसके निर्माण में जिला कलेक्टर गौरव गोयल व सेवानिवृत्त अधीक्षण अभियंता सुनील सिंघल का विशेष सहयोग रहने की बात भी कही, मगर जैन की भूमिका को लेकर एक भी शब्द नहीं कहा। इससे भी ज्यादा अफसोसनाक बात ये है कि जंयती समारोह में शहर के अधिसंख्य बड़े भाजपा नेताओं को अतिथि के रूप में बुलाया जा रहा है, मगर उस सूची में पूर्व न्यास अध्यक्ष जैन, जो कि इस स्मारक के स्वप्रदृष्टा हैं, का नाम कहीं पर भी नहीं है। हेडा इतने ढ़ीठ हैं कि इस मुद्दे पर उनकी खूब छीछालेदर हो रही है, फिर भी वे उसकी परवाह नहीं कर रहे। उन्हें इसकी भी चिंता नहीं कि इससे आम जनता में उनकी छवि कैसी बन रही है। उनकी इस जिद की वजह से भाजपा की गुटबाजी भी सड़क पर आ रही है, मगर उन्हें पार्टी की किरकिरी होने का कोई अहसास ही नहीं। जानकारी के अनुसार जैन ने इसकी शिकायत शहर भाजपा अध्यक्ष अरविंद यादव से की है और यादव ने भी एक पत्र हेडा को लिखा है, फिर भी उनके कान पर जूं तक नहीं रेंगी। सत्ता व संगठन के तालमेल का यह ताजा उदाहरण है।
स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठ रहा है कि जब जयंती समारोह जैन मनाते रहे हैं तो हेड़ा ने क्यों नई समिति बनाई? अगर पूर्व की समिति कांग्रेस डोमिनेटेड होती तो उसके स्थान पर भाजपानीत समिति बनाना समझ में आता, मगर अपनी ही पार्टी के नेता की अध्यक्षता में बनी समिति का उड़ा  देना उनकी संकीर्णतम मानसिकता का द्योतक है।
-तेजवानी गिरधर
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हेडा के अड़ंगे के बावजूद एलिवेटेड रोड बनेगा

लीजिए, अजमेर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष शिवशंकर हेडा के अड़ंगे के बावजूद अजमेर में एलिवेटेड रोड का रास्ता साफ हो गया है। स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में शहरी विकास मंत्रालय एवं राज्य सरकार ने अजमेर शहर में 162 करोड़ की लागत से एलिवेटेड रोड बनाने की सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। जानकारी के अनुसार अजमेर स्मार्ट सिटी लिमिटेड को इसके लिए जल्दी ही फोरलेन सड़क का चयन कर डीपीआर तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। अर्थात अब यह काम स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत होगा, जिसमें अजमेर विकास प्राधिकरण की कोई बाधा नहीं रहेगी।
ज्ञातव्य है कि पिछले दिनों स्वायत्त शासन मंत्री श्रीचंद कृपलानी अजमेर आए तो एक समारोह के दौरान शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी ने अजमेर में एलिवेटेड रोड की जरूरत पर जोर दिया, मगर हेडा ने उसका विरोध करते हुए उसकी संभावना पर पानी फेरने की कोशिश की और कह दिया कि इस बारे में मुख्यमंत्री से बात हो चुकी है। हालांकि देवनानी ने भी कहा कि उनकी मुख्यमंत्री से बात हुई है, मगर मतभिन्नता के चलते बात वहीं खत्म हो गई, मगर कृपलानी ने इस मामले को प्रसंज्ञान में ले लिया।  जानकारी के अनुसार इस बारे में अजमेर नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष धर्मेश जैन ने भी देवनानी पर दबाव बनाया। वे इससे पहले भी कई बार मुख्यमंत्री को आग्रह कर चुके थे। देवनानी ने भी मुख्यमंत्री से बात कर बात को आगे बढ़ाया और अंतत: शहरी विकास मंत्रालय एवं राज्य सरकार इसके लिए सैद्धांतिक रूप से सहमत हो गए।
हुआ यूं कि जिला कलेक्टर गौरव गोयल जयपुर में केंद्रीय शहरी विकास मंत्री वैंकेया नायडू एवं सीएम वसुंधरा राजे द्वारा सीएमओ में आयोजित बैठक में शहरी विकास योजनाओं तथा स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत कराए जा रहे कामों की जानकारी देने गए थे। वहीं उन्होंने इस मामले को रखा। इस पर मुख्यमंत्री ने अजमेर शहर में बढ़ते यातायात के दबाव के मद्देनजर 162 करोड़ की लागत से एलिवेटेड रोड बनाने की सैद्धांतिक स्वीकृति दे दी।
महत्वपूर्ण बात ये है कि अब एडीए का कोई लेना देना नहीं है। न तो हेडा अब बजट का रोना रो सकते हैं और न ही मुख्यमंत्री की मर्जी के खिलाफ कुछ बोल सकते हैं। असल में उनकी रुचि इस कारण नहीं बताई जाती है कि यह प्रोजेक्ट बड़ा होने के कारण उनके कार्यकाल में पूरा नहीं हो पाता और क्रेडिट भी कोई और लेता। मगर सवाल उठता है कि शहर का हित सर्वोपरि है या किस व्यक्ति की जिद। यह एक बेहद अफसोसनाक बात है कि जिस यातायात समस्या को पूरा शहर भोग रहा है, उसके समाधान में रुचि लेने की बजाय हेडा ने व्यक्ति नजरिये को तवज्जो दी। खैर, अब उनकी अनिच्छा व अड़ंगे का कोई लेना देना नहीं है। शहर वासियों को दुआ करनी चाहिए कि ऊर्जावान जिला कलेक्टर गोयल यहां रहते इस काम को शुरू करवा जाएं।
जहां तक सत्तारूढ़ भाजपा संगठन का सवाल है, वह इस एलिवेटेड रोड के प्रति कितना आतुर था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने एलिवेटेड रोड की मंजूरी की जानकारी आते ही मुख्यमंत्री का आभार जताया और उसकी उपयोगिता का बखान किया। मजे की बात ये है कि शहर भाजपा अध्यक्ष अरविंद यादव की ओर से जारी विज्ञप्ति में आभार के साथ जिन अधिसंख्य नेताओं के नाम जोड़े हैं, उनमें हेडा का भी नाम है। समझा जा सकता है कि यादव ने वह नाम औपचारिकता वश जोड़ा है। उन्होंने इसके लिए विशेष रूप से शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी  का आभार इस नाते व्यक्त किया है कि उन्होंने मुख्यमंत्री के समक्ष अजमेर की इस जरूरत पर ध्यान आकर्षित किया। साथ ही अजमेर में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी गौरव गोयल एवं अजमेर नगर निगम महापौर धर्मेंद्र गहलोत का आभार इसलिए कि उन्होंने इसके प्रथम चरण में डीपीआर बनवाई, कंसल्टेंट से फिजिबिलिटी के आधार पर तकनीकी रिपोर्ट तैयार करवाई।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

सोमवार, 22 मई 2017

पुलिस अफसरों में ही तालमेल नहीं, कैसे सुधरेंगे हालात?

राजेन्द्र सिंह
अजमेर के निवनियुक्त जिला पुलिस अधीक्षक राजेन्द्र सिंह ने हाल ही जब नियम तोड़ कर वाहन चलाने वाले पुलिसकर्मियों के भी चालान कटवाए तो ऐसा लगा कि वे नई ऊर्जा व उत्साह के साथ आए हैं और पुलिस महकमे में आमूलचूल सुधार करने वाले हैं, मगर चंद दिन बाद ही राज खुल गया कि उनके अधीनस्थ पुलिस अधिकारियों में ही तालमेल नहीं है।
ज्ञातव्य है कि अजमेर पुलिस की कमान संभालने के तुरंत बाद उन्होंने  आमजन को सुधारने से पहले पुलिसकर्मियों को भी सुधारने के आदेश दिए। और उसी अनुरूप जिला पुलिस लाइन के बाहर यातायात के उपनिरीक्षक वी डी शर्मा और उनके सहयोगियों को तैनात किया। उन्होंने पुलिस लाइन में आने और जाने वाले पुलिसकर्मियों द्वारा हेलमेट नहीं लगाने, कार पर काली फिल्म चढ़ी होने सहित अन्य नियमों का उल्लंघन करने पर कार्रवाई की। ऐसा होता देख मीडिया को सुखद अहसास हुआ कि पिछले पुलिस अधीक्षक नितिन दीप ब्लग्गन के कार्यकाल में चरमरा चुकी कानून व्यवस्था लाइन पर आ जाएगी। मगर चंद दिन बाद ही पुलिस महकमे की पोल खुल गई है कि खुद उनके बीच ही तालमेल नाम की कोई चीज नहीं है। ऐसे में नए एसपी से कानून व्यवस्था में सुधार की क्या उम्मीद की जा सकती है?
हुआ यूं कि धार्मिक नगरी में नशे के सौदागरों और शराब माफियाओं के अवैध धंधों की शिकायत सीधे एसपी राजेंद्र सिंह को मिली थीं। समझा जा सकता है कि उन्हें ये समझ में आ गया होगा कि पुष्कर में बड़े पैमाने पर नशे का कारोबार फल फूल रहा है, मगर  पुष्कर थाना पुलिस ने कार्रवाई नहीं की है। अर्थात उसकी शराब तस्करों को पकडऩे में जरा भी रुचि नहीं है, जो कि सांठगांठ की ओर इशारा करता है। इस पर एसपी ने खुद एएसपी मोनिका सेन व उनकी टीम को पुष्कर में शराब के ठिकानों पर रेड के लिए भेजा। रेड के दौरान 9 ठिकानों पर कार्रवाई कर 9 लोगों को शराब बेचते रंगे हाथों पकड़ा गया। यूपी के दो चरस तस्कर भी पकड़े गए।
मगर यह बेहद अफसोसनाक बात रही कि आईपीएस मोनिका सेन ने पुष्कर सीआई दुलीचंद को कार्रवाई में मौके पर बुलाया, मगर वे नहीं गए। बाद में आला कमान के आदेशों पर जिला पुलिस कंट्रोल रूम से सीआई को मौके पर पहुंचने के लिए कहा गया, लेकिन फिर भी वे नहीं पहुंचे और थाने की जीप भिजवा दी। उनकी धौंस देखिए कि जब टीम कार्यवाही कर लौटी तो उस पर ही गुस्सा उतारने लगे। उनका ये व्यवहार पुष्कर में हो रहे नशे के बेखौफ कारोबार की पूरी कहानी बयां करने के लिए काफी है।
एक ओर सरकार तीर्थराज की महत्ता और पर्यटन के मद्देनजर विभिन्न योजनाओं में बजट आवंटित कर रही है, दूसरी और वहीं की पुलिस को इस तीर्थ की पवित्रता से कोई लेना देना नहीं है। उसकी का परिणाम है कि परचून की दुकान हो या फिर हाई-वे के ढाबे, रेस्त्रां, टेंट हाउस और शराब की आवंटित दुकानों की अवैध ब्रांच, सभी जगह खुलेआम देशी-अंग्रेजी शराब बिक रही है।
हालांकि एसपी का कहना है कि अगर छापामार कार्यवाही के मामले में पुष्कर थाना पुलिस की कोई लापरवाही सामने आती है तो कार्रवाई की जाएगी, मगर जिस तरह का सीआई का रवैया है, संदेह ही होता है कि कोई गंभीर कार्यवाही होगी। वे तो कह रहे हैं कि उन्हें तो टीम के आने का कुछ भी पता नहीं। बहरहाल, पुलिस अधिकारियों के बीच संवाद की जो भी कमी रही हो, मगर इतना तय है कि उनके बीच तालमेल कत्तई नहीं है। ऐसे में देखते हैं नए एसपी कैसे सुधार पाते हैं कि जिले की कानून व्यवस्था?
-तेजवानी गिरधर
7742067000

शनिवार, 20 मई 2017

क्या यकायक खतरनाक हो गए इतने सारे समारोह स्थल?

भरतपुर में कुछ दिन पूर्व तेज अंधड़ से एक समारोह स्थल की दीवार गिरने से हुई मौतों के बाद राज्य सरकार ने अचानक आदेश जारी कर दिए कि बिना लाइसेंस वाले समारोह स्थल सीज कर दिए जाएं। इसकी अनुपालना में अजमेर में भी धड़ाधड़ समारोह स्थल सीज कर दिए गए। नतीजा ये है कि तकरीबन तीन सौ आयोजक परेशानी में आ गए हैं कि वे अचानक नया समारोह स्थल कहां जा कर ढूंढ़े? दुविधा ये है कि अगर कोई और समारोह स्थल बुक करवाते हैं, वह भी अगर ऐन वक्त पर सीज हो गया तो वे क्या करेंगे? जो लोग कार्ड बांट चुके हैं, उनके लिए परेशानी ये भी है कि नए स्थान व नई तारीख की सूचना कम समय में कैसे भेजें? दैनिक भास्कर ने मीडिया का फर्ज निभाते हुए पड़ताल कर ऐसे मामलों को उजागर किया है। ऐसे और भी मामले होंगे ही। मगर सवाल ये उठता है कि क्या केवल मीडिया ही अपना फर्ज निभाएगा, सरकार व प्रशासन की कोई भी जिम्मेदारी नहीं है कि वह यकायक की गई कार्यवाही से हुई परेशानी का निराकरण करे?
कैसी विडंबना है कि सरकार व प्रशासन तब जा कर जागे, जबकि एक समारोह स्थल पर हादसा हो गया। क्या एक ही दिन में सारे समारोह स्थल खतरनाक हो गए? सैकड़ों-हजारों समारोह स्थल बिना लाइसेंस के चल रहे थे तो वह किसकी गलती है? वहां सुरक्षा के इंतजाम नहीं थे, तो उसके लिए कौन जिम्मेदार है? जिन अधिकारियों व कर्मचारियों पर समारोह स्थलों की निगरानी का जिम्मा था, क्या पूरी तरह से निर्दोष हैं। अगर वे गलत हैं तो उसके लिए सजा का क्या प्रावधान है? माना कि समारोह स्थल मालिकों ने गलती की तो उन्हें दंड मिलना ही चाहिए, मगर जिसकी लापरवाही से समारोह स्थल चल रहे थे, क्या उनका कुछ भी नहीं बिगड़ेगा? समारोह स्थल मालिकों से अवैध वसूलियां करने वाले अधिकारी-कर्मचारी छुट्टे घूमते रहेंगे? ये कैसा कानून है? और उससे भी बड़ी बात ये है कि जिन लोगों ने समारोह स्थल बुक करवाए, उनका क्या दोष? वे किस बात की सजा भोग रहे हैं? उनको जो आर्थिक व मानसिक हानि होगी, उसकी भरपाई कौन करेगा? माना कि सरकार ने जनहित में त्वरित कार्यवाही करते हुए बड़ा अच्छा काम किया, मगर क्या यह नहीं देखा जाना चाहिए था कि यकायक ऐसा करने से  जनता को परेशानी तो नहीं हो जाएगी? सरकार चाहती तो तुरंत जांच करवा कर ऐसे समारोह स्थलों को, जो वाकई खतरनाक हैं, उनको सीज करती, बाकी को फिलहाल छूट दे देती, जिनमें समारोह आयोजित करने पर अभी कोई खतरा नहीं है। लाइसेंस की औपचारिकता तो एक माह की अवधि में बाद में भी पूरी की जा सकती थी। मगर ऐसा हुआ नहीं, होना भी नहीं है, क्योंकि कानून अंधा है, सरकार व प्रशासन संवेदनहीन। ऊपर बैठे राजनेताओं को अपनी राजनीति का चिंता है, आदेश जारी करने वाले एसी चैंबर में बैठ कर एक ही लाठी से सबको हांकते हैं और निचले आधिकारियों तो केवल लकीर पीटनी है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

बुधवार, 17 मई 2017

एकजुट नहीं हुए तो देवनानी व अनिता, दोनों के टिकट काटने होंगे

हालांकि लगातार तीन बार जीतने की वजह से शिक्षा राज्य मंत्री प्रो. वासुदेव देवनानी व महिला व बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती अनिता भदेल काफी मजबूत माने जाते हैं, इसके अतिरिक्त दोनों मंत्री भी हैं, इस कारण उनके टिकट आगामी विधानसभा चुनाव में काटना निहायत कठिन काम है, मगर दोनों के बीच जिस तरह की खींचतान मची हुई है, उसे देखते हुए लगता यही है कि दोनों सीटें जीतने के लिए भाजपा हाईकमान को उन्हें टिकट देने से पहले सौ बार सोचना पड़ेगा। जमीन पर कार्यकर्ता इतना बंट चुका है कि उसे एकजुट करना अब बेहद मुश्किल है।
असल में दोनों नेताओं के बीच पहली बार जीतने के साथ ही छत्तीस का आंकड़ा हो गया था। अनुसूचित जाति की महिला विधायक होने के नाते श्रीमती भदेल का मंत्री बनना तय माना जा रहा था, मगर देवनानी सिंधी कोटे में मंत्री बन गए। तभी से दोनों के बीच नाइत्तफाकी आरंभ हुई। देवनानी के मंत्री बनने से अजमेर भाजपा के भीष्मपितामह औंकार सिंह लखावत को भी तकलीफ हुई। शनै: शनै: वह गुटबाजी में तब्दील हो गई। भाजपा का एक बड़ा गुट लखावत व अनिता के साथ हो गया, मगर संघ के दम पर देवनानी मजबूत बने रहे। पिछले चुनाव में तो हालत ये थी कि चाहे गैर सिंधीवाद के नाम से, चाहे गुटबाजी व व्यक्तिगत कारणों से, भाजपा के अधिसंख्य नेता देवनानी के खिलाफ थे। टिकट कटने की नौबत तक आ गई, संघ के वीटो से टिकट ले आए। धरातल पर हालत ये थी कि उन्हें हराने के लिए पूरी ताकत झोंक दी गई। उधर श्रीमती भदेल के दाहिने हाथ रहे उद्योगपति हेमंत भाटी को कांग्रेस का टिकट मिल गया और वे अनिता के सामने ही खड़े हो गए। जाहिर तौर पर वे भी कमजोर थीं। कुल मिला कर देवनानी व अनिता दोनों ही पिछले चुनाव में हार के करीब थे, मगर मोदी लहर ऐसी चली कि दोनों अच्छे वोटों से जीत गए। ऐसे में उन्हें यह भ्रम है कि वे अजेय हो गए हैं। तीसरी बार जीतने पर संघ के दबाव में देवनानी तो मंत्री बनाना जरूरी था तो वसुंधरा ने बैलेंस करने के लिए अनिता को भी मंत्री बना दिया। अब दोनों के बीच आए दिन भिड़ंत होती रहती है। प्रशासन भी परेशान है।
दो साल पहले नगर निगम चुनाव में भाटी ने अपनी हार का बदला ले लिया और दिखा दिया कि अनिता जमीन पर कमजोर हो गई हैं। मेयर चुनाव में उनके दूसरे सिपहसालार सुरेन्द्र सिंह शेखावत भी छिटक गए। ऐसे में उनके पास चुनाव जीतने के काबिज ताकत नहीं रह गई है। हालांकि सिंधी व माली वोट बैंक अब भी उनकी ताकत बना हुआ है, मगर देवनानी गुट के लोगों के भीतरघात करने व एंटी इंकंबेंसी के चलते उनको दिक्कत पेश आएगी। यद्यपि हाल ही उन्होंने अजमेर दक्षिण क्षेत्र के सभी वार्डों की क्रिकेट प्रतियोगिता करवा कर जमीन पर पकड़ बनाई है, मगर यह आयोजन भी संगठन के स्तर पर विवाद का शिकार हो गया है।
बात अगर देवनानी की करें तो हालांकि उन्होंने निगम चुनाव में अपनी ताकत दिखा दी है, आज भी उनकी टीम मजबूत है, मगर जमीन पर हालात बहुत अच्छे नहीं रहे हैं। चलते रस्ते ब्राह्मणों को भी नाराज कर बैठे हैं। लखावत-अनिता खेमा भी उन्हें हराने को तैयार बैठा है। इस बार तो अजमेर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष शिव शंकर हेडा उनकी टिकट में बड़ी बाधा बन कर आ सकते हैं। उन्होंने भी अपनी सेना सजाना शुरू कर दिया है। इस प्रकार शहर भाजपा में तीन गुट हो गए हैं। खींचतान इतनी है कि शहर भाजपा अध्यक्ष बदलने तक का फैसला अटका हुआ है। कुल मिला कर गुटबाजी इतनी चरम पर पहुंच गई है कि सुलह होना नामुमकिन है। भाजपा हाईकमान इस बात से बेखबर नहीं है। हाल ही स्वायत्त शासन मंत्री श्रीचंद कृपलानी भी हालात देख कर गए हैं। ऐसे में भाजपा को यह अच्छी तरह से समझ आ गई होगी कि अगर दोनों सीटें जीतनी हैं तो दोनों मौजूदा विधायकों के टिकट काटने ही होंगे। चुनाव अभी दूर हैं। इस बीच अगर कोई सुलह हो पाती है तो ठीक, वरना इन दोनों को टिकट देने से पहले हाईकमान को गंभीरता से विचार करना होगा। ऐसा नहीं है कि भाजपा संगठन या कार्यकर्ता कमजोर हुआ है, आज भी भाजपा अजमेर में मजबूत स्थिति में है, जातीय समीकरण के लिहाज से और मोदी फोबिया के कारण, मगर केवल गुटबाजी पार्टी को लेकर बैठ सकती है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000