बुधवार, 5 अप्रैल 2017

क्या दरगाह दीवान को उनके भाई पद से हटा सकते हैं?

महान सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती के सालाना उर्स के आखिरी दिन दरगाह शरीफ में जो घटनाक्रम हुआ, उससे यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या दरगाह दीवान जेनुल आबेदीन को उनके छोटे भाई अलाउद्दीन अलीमी पद से हटाने का अधिकार रखते हैं? ज्ञातव्य है कि अलीमी ने बयान जारी कर कहा है कि दीवान आबेदीन ने तीन तलाक के संबंध में जो बयान दिया है, उसके संबंध में उन्होंने मुफ्ती साहब से मौखिक संपर्क किया। मुफ्ती ने कहा कि उसके द्वारा दिए गए बयान के आधार पर वह मुरतद हो गया है, अर्थात अब वह हनफी मुसलमान नहीं रहा। इस बारे में 10-12 अन्य मुफ्तियों को पत्र लिख कर फतवा मंगाने की भी राय दी गई। अलीमी ने कहा कि इस फतवे के बाद खानदान की रस्मों के अनुसार परिवार की एक बैठक आयोजित कर तय किया गया है जो व्यक्ति हनफी मुसलमान नहीं रह गया, वह गद्दी के लिए अयोग्य हो गया है। वह ख्वाजा साहब का सज्जादा नशीन दरगाह दीवान कैसे रह सकता है।
दरअसल दरगाह दीवान जेनुल आबेदीन उच्चतम न्यायालय के आदेश से इस पर काबिज हैं। सवाल उठता है कि क्या मुफ्ती को यह कानूनी अधिकार है कि वह तीन तलाक के बारे में निजी राय जारी करने वाले को हनफी मुसलमान न होने का फतवा दे सकते हैं? क्या हनफी मुसलमान न होने की स्थिति में उनके छोटे भाई को यह अधिकार है कि वे स्वयं जेनुल आबेदीन को हटा कर खुद को दीवान घोषित करें? क्या अलीमी के ऐलान को वैध मान कर उस पर प्रशासन व सरकार अमल करेंगे?
जानकारी के अनुसार दरगाह दीवान व उनके भाई के बीच विवाद पहले से चला आ रहा है। उर्स के दौरान ही दो दिन पहले विवाद हुआ था। तीन तलाक पर बयान तो बाद में आया। यानि कि इस बयान के बाद ही मामले ने तूल पकड़ा। दीवान ने अपने छोटे भाई को सचिव पद हटा दिया और उनके स्थान पर अपने बेटे नसीरुद्दीन को नियुक्त किया, उसकी प्रतिक्रिया में अलीमी ने जेनुल आबेदीन को दीवान पद से हटाने का ऐलान कर दिया।
एक नजर दीवान के बयान पर:-
दरगाह दीवान ने इस्लामी शरीयत के हवाले से कहा कि इस्लाम में शादी दो व्यक्तियों के बीच एक सामाजिक करार माना गया है। इस करार की साफ-साफ शर्तें निकाहनामा में दर्ज होनी चाहिए। कुरान में तलाक को अति अवांछनीय बताया गया है। उस संवेदनशील मसले पर उनका तर्क है कि एक बार में तीन तलाक का तरीका आज के समय में अप्रासंगिक ही नहीं, खुद पवित्र कुरान की भावनाओं के विपरीत भी है। क्षणिक भावावेश से बचने के लिए तीन तलाक के बीच समय का थोड़ा-थोड़ा अंतराल जरूर होना चाहिए। यह भी देखना होगा कि जब निकाह लड़के और लड़की दोनों की रजामंदी से होता है, तो तलाक मामले में कम से कम स्त्री के साथ विस्तृत संवाद भी निश्चित तौर पर शामिल किया जाना चाहिए। यह भी कि निकाह जब दोनों के परिवारों की उपस्थिति में होता है तो तलाक एकांत में क्यों ?
उन्होने कहा कि पैगंबर हजरत मुहम्मद ने कहा था कि अल्लाह को तलाक सख्त नापसंद है। कुरान की आयतों में साफ दर्शाया गया है कि अगर तलाक होना ही हो तो उसका तरीका हमेशा न्यायिक एवं शरअी हो। कुरान की आयतों में कहा गया है कि अगर पति-पत्नी में क्लेश हो तो उसे बातचीत के द्वारा सुलझाने की कोशिश करें। जरूरत पडऩे पर समाधान के लिए दोनों परिवारों से एक-एक मध्यस्थ भी नियुक्त करें। समाधान की यह कोशिश कम से कम 90 दिनों तक होनी चाहिए।
दरगाह दीवान ने कहा कि कुरान ने समाज में स्त्रियों की गरिमा, सम्मान और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बहुत सारे प्रावधान किए हैं। तलाक के मामले में भी इतनी बंदिशें लगाईं गई हैं कि अपनी बीवी को तलाक देने के पहले मर्दों को सौ बार सोचना पड़े। कुरान में तलाक को न करने लायक काम बताते हुए इसकी प्रक्रिया को कठिन बनाया गया है, जिसमें रिश्ते को बचाने की आखिरी दम तक कोशिश, पति-पत्नी के बीच संवाद, दोनों के परिवारों के बीच बातचीत और सुलह की कोशिशें और तलाक की इस पूरी प्रक्रिया को एक समय-सीमा में बांधना शामिल हैं।
उन्होने कहा कि इस विषय पर कुरान के शुरा में एक पूरे अध्याय का जिक्र है जिसे अल तलाक कहते हैं जिसमें 12 छंद हैं। इन छंदों में तलाक के लिए कुरान एक प्रक्रिया पालन करने की बात कहता है। कुरान कहता है कि तीनों तलाक कहने के लिए एक एक महीने का वक्त लिया जाना चाहिए कुरान एक बार में तीन तलाक कहने की परंपरा को जायज नहीं मानता है।
बहरहाल, सवाल ये कि क्या तीन तलाक के मामले में इस प्रकार का मन्तव्य जाहिर करने के आधार पर दीवान को हनफी मुसलमान होने का फतवा जारी किया जा सकता है? ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा कि यह मसला कहां तक जाता है।
-तेजवानी गिरधर
7742067000

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